ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 430, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
पुरुषमें अर्थात् मनुष्योंमें और सूर्यमें एक ही हैं। अभिप्राय यह है कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान एक ही परमात्मा है। नाना रूपोंमें उन्हींकी अभिव्यक्ति हो रही है। जो मनुष्य इस तत्त्वको जान लेता है, वह वर्तमान शरीरसे अलग होनेपर उन परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है जिनका वर्णन अत्रमय आत्मा, प्राणमय आत्मा, मनोमय आत्मा, विज्ञानमय आत्मा और आनन्दमय आत्माके नामसे पहले किया गया है। इन सबको पाकर अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म भेदसे जो एककी अपेक्षा एकके अन्तरात्मा होकर नाना रूपोंमें स्थित हैं और सबके अन्तर्यामी परमानन्दस्वरूप हैं, उनको प्राप्त करके मनुष्य पर्याप्त भोग-सामग्रीसे युक्त और इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। साथ ही वह इन लोकोंमें विचरता हुआ आगे बताये जानेवाले साम (समतायुक्त भावों)का गान करता रहता है।
सम्बन्ध— उसके आनन्दमय मनमें जो समता और सर्वरूपताके भाव उठा करते हैं, उनका वर्णन करते हैं—
हा३वु हा३वु हा३वु। अहम॒त्रम॑हम॒त्रम॑हम॒त्रम्। अहम॒त्रादो॑३- ऽहम॒त्रादो॑३ॽहम॒त्रादः। अह॒ः श्लोक॑क॒कृदह॒ः श्लोक॑क॒कृदह॒ः श्लोक॑क॒कृत्। अहम॑स्मि प्रथम॒जा ऋता॑ऽस्य। पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना३भाधि। यो मा ददाति स इदेव मा३ वाः। अहम॒त्रम॑त्रम॒दन्तमा॑ऽचि। अहं विश्वं भुवनम॑भ्य॒भवा॑३म्। सुवर्णं ज्योतीः। य एवं वेद। इत्युपनिषत्।
हावु हावु हावु=आश्चर्य! आश्चर्य!! आश्चर्य!!!; अहम्=मैं, अत्रम्=अत्र हूँ; अहम्=मैं, अत्रम्=अत्र हूँ; अहम्=मैं, अत्रम्=अत्र हूँ; अहम्=मैं ही; अत्रादः=अत्रका भोक्ता हूँ; अहम्=मैं ही; अत्रादः=अत्रका भोक्ता हूँ; अहम्=मैं ही; अत्रादः=अत्रका भोक्ता हूँ; अहम्=मैं; श्लोककृत्=इनका संयोग करनेवाला हूँ; अहम्=मैं; श्लोककृत्= इनका संयोग करनेवाला हूँ; अहम्=मैं; श्लोककृत्=इनका संयोग करनेवाला हूँ; अहम्=मैं; ऋतस्य=सत्यका अर्थात् प्रत्यक्ष दीखनेवाले जगत्की अपेक्षासे; प्रथम॒जा=सबमें प्रधान होकर उत्पन्न होनेवाला (हिरण्यगर्भ); [ च ]=और;