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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

पुरुषमें अर्थात् मनुष्योंमें और सूर्यमें एक ही हैं। अभिप्राय यह है कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान एक ही परमात्मा है। नाना रूपोंमें उन्हींकी अभिव्यक्ति हो रही है। जो मनुष्य इस तत्त्वको जान लेता है, वह वर्तमान शरीरसे अलग होनेपर उन परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है जिनका वर्णन अत्रमय आत्मा, प्राणमय आत्मा, मनोमय आत्मा, विज्ञानमय आत्मा और आनन्दमय आत्माके नामसे पहले किया गया है। इन सबको पाकर अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म भेदसे जो एककी अपेक्षा एकके अन्तरात्मा होकर नाना रूपोंमें स्थित हैं और सबके अन्तर्यामी परमानन्दस्वरूप हैं, उनको प्राप्त करके मनुष्य पर्याप्त भोग-सामग्रीसे युक्त और इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। साथ ही वह इन लोकोंमें विचरता हुआ आगे बताये जानेवाले साम (समतायुक्त भावों)का गान करता रहता है।

सम्बन्ध— उसके आनन्दमय मनमें जो समता और सर्वरूपताके भाव उठा करते हैं, उनका वर्णन करते हैं—

हा३वु हा३वु हा३वु। अहम॒त्रम॑हम॒त्रम॑हम॒त्रम्। अहम॒त्रादो॑३- ऽहम॒त्रादो॑३ॽहम॒त्रादः। अह॒ः श्लोक॑क॒कृदह॒ः श्लोक॑क॒कृदह॒ः श्लोक॑क॒कृत्। अहम॑स्मि प्रथम॒जा ऋता॑ऽस्य। पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना३भाधि। यो मा ददाति स इदेव मा३ वाः। अहम॒त्रम॑त्रम॒दन्तमा॑ऽचि। अहं विश्वं भुवनम॑भ्य॒भवा॑३म्। सुवर्णं ज्योतीः। य एवं वेद। इत्युपनिषत्।

हावु हावु हावु=आश्चर्य! आश्चर्य!! आश्चर्य!!!; अहम्=मैं, अत्रम्=अत्र हूँ; अहम्=मैं, अत्रम्=अत्र हूँ; अहम्=मैं, अत्रम्=अत्र हूँ; अहम्=मैं ही; अत्रादः=अत्रका भोक्ता हूँ; अहम्=मैं ही; अत्रादः=अत्रका भोक्ता हूँ; अहम्=मैं ही; अत्रादः=अत्रका भोक्ता हूँ; अहम्=मैं; श्लोककृत्=इनका संयोग करनेवाला हूँ; अहम्=मैं; श्लोककृत्= इनका संयोग करनेवाला हूँ; अहम्=मैं; श्लोककृत्=इनका संयोग करनेवाला हूँ; अहम्=मैं; ऋतस्य=सत्यका अर्थात् प्रत्यक्ष दीखनेवाले जगत्की अपेक्षासे; प्रथम॒जा=सबमें प्रधान होकर उत्पन्न होनेवाला (हिरण्यगर्भ); [ च ]=और;

अनु० १० ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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देवेभ्यः=देवताओंसे भी; पूर्वम्=पहले विद्यमान; अमृतस्य=अमृतका; नाभाधि (नाभि)=केन्द्र; अस्मि=हूँ; यः=जो कोई; मा=मुझे; ददाति=देता है; सः=वह; इत्=इस कार्यसे; एव=ही; मा आवाः=मेरी रक्षा करता है; अहम्=मैं; अन्नम्=अन्नस्वरूप होकर; अन्नम्=अन्न; अदन्तम्=खानेवालेको; अच्चि=निगल जाता हूँ; अहम्=मैं; विश्वम्=समस्त; भुवनम् अभ्यभवाम्=ब्रह्माण्डका तिरस्कार करता हूँ; सुवः न ज्योतिः=मेरे प्रकाशकी एक झलक सूर्यके समान है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=जानता है (उसे भी यही स्थिति प्राप्त होती है); इति=इस प्रकार; उपनिषत्=यह उपनिषद्—ब्रह्मविद्या समाप्त हुई।

व्याख्या —उस महापुरुषकी स्थिति शरीरमें नहीं रहती। वह शरीरसे सर्वथा ऊपर उठकर परमात्माको प्राप्त हो जाता है। यह बात पहले कहकर उसके बाद इस साम-गानका वर्णन किया गया है। इससे यह प्रकट होता है कि परमात्माके साथ एकताकी प्राप्ति कर लेनेवाले महापुरुषके ये पावन उद्धार उसके विशुद्ध अन्तःकरणसे निकले हैं और उसकी अलौकिक महिमा सूचित करते हैं। 'हावु' पद आश्चर्यबोधक अव्यय है। वह महापुरुष कहता है—बड़े आश्चर्यकी बात है! वे सम्पूर्ण भोग-वस्तुएँ, इनको भोगनेवाला जीवात्मा और इन दोनोंका संयोग करानेवाला परमेश्वर एक मैं ही हूँ। मैं ही इस प्रत्यक्ष दीखनेवाले जगत्में समस्त देवताओंसे पहले सबमें प्रधान होकर प्रकट होनेवाला ब्रह्म हूँ; और परमानन्दरूप अमृतके केन्द्र परब्रह्म परमेश्वर भी मुझसे अभिन्न हैं, अतः वे भी मैं ही हूँ। जो कोई मनुष्य किसी भी वस्तुके रूपमें मुझे किसीको प्रदान करता है, वह मानो मुझे देकर मेरी रक्षा करता है। अर्थात् योग्य पात्रमें भोग्य पदार्थोंका दान ही उनकी रक्षाका सर्वोत्तम उपाय है। इसके विपरीत जो अपने ही लिये अन्नरूप समस्त भोगोंका उपभोग करता है, उस खानेवालेको मैं अन्नरूप होकर निगल जाता हूँ। अर्थात् उसका विनाश हो जाता है—उसकी भोग-सामग्री टिकती नहीं। मैं समस्त ब्रह्माण्डका तिरस्कार करनेवाला हूँ। मेरी महिमाकी तुलनामें यह सब तुच्छ है। मेरे प्रकाशकी एक झलक भी सूर्यके समान है। अर्थात् जगत्में जितने भी प्रकाशयुक्त पदार्थ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

हैं, वे सब मेरे ही तेजके अंश हैं। जो कोई इस प्रकार परमात्माके तत्त्वको जानता है, वह भी इसी स्थितिको प्राप्त कर लेता है। उपर्युक्त कथन परमात्मामें एकीभावसे स्थित होकर परमात्माकी दृष्टिसे है, यह समझना चाहिये।

॥ दशम अनुवाक समाप्त ॥ १० ॥

॥ भृगुवल्ली समाप्त ॥ ३ ॥

॥ कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयोपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्यर्चमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः।* नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम्। ऋतमवादिषम्। सत्यमवादिषम्। तन्मामावीत्। तद्वक्तारमावीत्। आवीन्माम्। आवीद्वक्तारम्॥

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

इसका अर्थ शीक्षावल्लीके द्वादश अनुवाकमें दिया गया है।

  • यह मन्त्र ऋग्वेद १।१०।९, यजुर्वेद ३६।९ में आया है।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्वेताश्वतरोपनिषद्

शान्तिपाठ

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै।

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

ॐ=पूर्णब्रह्म परमात्मन्; (आप) नौ=हम दोनों (गुरु-शिष्य) की; सह=साथ-साथ; अवतु=रक्षा करें; नौ=हम दोनोंका; सह=साथ-साथ; भुनक्तु=पालन करें; सह=(हम दोनों) साथ-साथ ही; वीर्यम्=शक्ति; करवावहै=प्राप्त करें; नौ=हम दोनोंकी; अधीतम्=पढ़ी हुई विद्या; तेजस्वि=तेजोमयी; अस्तु=हो; मा विद्विषावहै=हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।

व्याख्या—हे परमात्मन्! आप हम गुरु-शिष्य दोनोंकी साथ-साथ सब प्रकारसे रक्षा करें, हम दोनोंका आप साथ-साथ समुचितरूपसे पालन-पोषण करें, हम दोनों साथ-ही-साथ सब प्रकारसे बल प्राप्त करें, हम दोनोंकी अध्ययन की हुई विद्या तेजपूर्ण हो—कहीं किसीसे हम विद्यामें परास्त न हों और हम दोनों जीवनभर परस्पर स्नेह-सूत्रसे बँधे रहें, हमारे अन्दर परस्पर या अन्य किसीसे कभी द्वेष न हो। हे परमात्मन्! तीनों तापोंकी निवृत्ति हो।

प्रथम अध्याय

हरिः ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति—

किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता

जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः।

अधिष्ठिताः केन सुखेतेषु

वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ १ ॥

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

‘हरिः ओम्’ इस प्रकार परमात्माके नामका उच्चारण करके उस परब्रह्म परमेश्वरका स्मरण करते हुए यह उपनिषद् आरम्भ की जाती है—

ब्रह्मवादिनः=ब्रह्मविषयक चर्चा करनेवाले कुछ जिज्ञासु; वदन्ति=आपसमें कहते हैं; ब्रह्मविदः=हे वेदज्ञ महर्षियो!; कारणम्=इस जगत्का मुख्य कारण; ब्रह्म=ब्रह्म; किम्=कौन है; कृतः=(हमलोग) किससे; जाताः स्म=उत्पन्न हुए हैं; केन=किससे; जीवाम=जी रहे हैं; च=और; वक्=किसमें; सम्प्रतिष्ठाः=हमारी सम्यक् प्रकारसे स्थिति है; (तथा) केन अधिष्ठिताः=किसके अधीन रहकर; [ वयम् ]=हमलोग; सुखेतरेषु=सुख और दुःखोंमें; व्यवस्थाम्=निश्चित व्यवस्थाके अनुसार; वर्तामहे=बर्त रहे हैं ॥ १ ॥

व्याख्या—परब्रह्म परमात्माको जानने और प्राप्त करनेके लिये उनकी चर्चा करनेवाले कुछ जिज्ञासु पुरुष आपसमें कहने लगे—‘हे वेदज्ञ महर्षिगण! हमने वेदोंमें पढ़ा है कि इस समस्त जगत्के कारण ब्रह्म हैं; सो वे ब्रह्म कौन हैं! हम सब लोग किससे उत्पन्न हुए हैं—हमारा मूल क्या है? किसके प्रभावसे हम जी रहे हैं—हमारे जीवनका आधार कौन है? और हमारी पूर्णतया स्थिति किसमें है? अर्थात् हम उत्पन्न होनेसे पहले—भूतकालमें उत्पन्न होनेके बाद—वर्तमानकालमें और इसके पश्चात्—प्रलयकालमें किसमें स्थित रहते हैं? हमारा परम आश्रय कौन है? तथा हमारा अधिष्ठता—हमलोगोंकी व्यवस्था करनेवाला कौन है? जिसकी रची हुई व्यवस्थाके अनुसार हमलोग सुख-दुःख दोनों भोग रहे हैं, वह इस सम्पूर्ण जगत्की सृज्यवस्था करनेवाला इसका संचालक स्वामी कौन है?’* ॥ १ ॥

कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या ।

  • इस प्रकार परब्रह्म परमात्माकी खोज करना; उन्हें जानने और पानेके लिये उत्कट अभिलाषाके साथ उत्साहपूर्वक आपसमें विचार करना, परमात्माके सत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंसे उनके विषयमें विनयभाव और श्रद्धापूर्वक पूछना, उनकी बतायी हुई बातोंको ध्यानपूर्वक सुनकर काममें लाना—इसीका नाम ‘सत्सङ्ग’ है। इस उपनिषद्के प्रथम मन्त्रमें सत्सङ्गका ही वर्णन है। इससे सत्सङ्गकी अनादिता और अलौकिक महत्ता सूचित होती है।

अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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संयोग एषां न त्वात्मभावा- दात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २ ॥

(क्या) कालः=काल; स्वभावः=स्वभाव; नियतिः=निश्चित फल देनेवाला कर्म; यदृच्छा=आकस्मिक घटना; भूतानि=पाँचों महाभूत; (या) पुरुषः=जीवात्मा; योनिः=कारण है; इति चिन्त्या=इसपर विचार करना चाहिये; एषाम्=इन काल आदिका; संयोगः=समुदाय; तु-भी; न=इस जगत्का कारण नहीं हो सकता; आत्मभावात्=क्योंकि वे चेतन आत्माके अधीन हैं (जड़ होनेके कारण स्वतन्त्र नहीं हैं); आत्मा=जीवात्मा; अपि=भी; [ न ]=इस जगत्का कारण नहीं हो सकता; सुखदुःखहेतोः=(क्योंकि वह) सुख-दुःखोंके हेतुभूत प्रारब्धके; अनीशः=अधीन है, स्वतन्त्र नहीं है ॥ २ ॥

व्याख्या—वे कहने लगे कि वेद-शास्त्रोंमें अनेक कारणोंका वर्णन आता है। कहीं तो कालको कारण बताया है; क्योंकि किसी-न-किसी समयपर ही वस्तुओंकी उत्पत्ति देखी जाती है, जगत्की रचना और प्रलय भी कालके ही अधीन सुने जाते हैं। कहीं स्वभावको कारण बताया जाता है; क्योंकि बीजके अनुरूप ही वृक्षकी उत्पत्ति होती है—जिस वस्तुमें जो स्वाभाविक शक्ति है, उसीसे उसका कार्य उत्पन्न होता देखा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि वस्तुगत शक्तिरूप जो स्वभाव है, वह कारण है। कहीं कर्मको कारण बताया है; क्योंकि कर्मानुसार ही जीव भिन्न-भिन्न योनियोंमें भिन्न-भिन्न स्वभाव आदिसे युक्त होकर उत्पन्न होते हैं। कहीं आकस्मिक घटनाको अर्थात् होनहार (भवितव्यता)-को कारण बताया है। कहीं पाँचों महाभूतोंको और कहीं जीवात्माको जगत्का कारण बताया गया है। अतः हमलोगोंको विचार करना चाहिये कि वास्तवमें कारण कौन है। विचार करनेसे समझमें आता है कि कालसे लेकर पञ्चमहाभूतोंतक बताये हुए जड़ पदार्थोंमेंसे कोई भी जगत्का कारण नहीं है। वे अलग-अलग तो क्या, सब मिलकर भी जगत्के कारण नहीं हो सकते; क्योंकि ये सब जड़ होनेके कारण चेतनके अधीन हैं, इसमें स्वतन्त्र कार्य करनेकी शक्ति नहीं है। जिन जड़ वस्तुओंके मेलसे कोई नयी चीज उत्पन्न

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

होती है, वह उसके संचालक चेतन आत्माके ही अधीन और उसीके भोगार्थ होती है। इनके सिवा पुरुष अर्थात् जीवात्मा भी जगत्का कारण नहीं हो सकता; क्योंकि वह सुख-दुःखके हेतुभूत प्रारब्धके अधीन है, वह भी स्वतन्त्ररूपसे कुछ नहीं कर सकता। अतः कारण-तत्त्व कुछ और ही है ॥ २ ॥

सम्बन्ध —इस प्रकार विचार करके उन्होंने क्या निर्णय किया, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—

तेध्यानयोगानुगताअपश्यन्
देवात्मशक्तिंस्वगुणैर्निगूढाम् ।
यःकारणानि निखिलानि तानि
कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः॥ ३ ॥

ते=उन्होंने; ध्यानयोगानुगता:=ध्यानयोगमें स्थित होकर; स्वगुणैः=अपने गुणोंसे; निगूढाम्=ढकी हुई; देवात्मशक्तिम् अपश्यन्=(उन) परमात्मदेवकी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिका साक्षात्कार किया; यः=जो (परमात्मदेव); एकः=अकेला ही; तानि=उन; कालात्मयुक्तानि=कालसे लेकर आत्मातक (पहले बताये हुए); निखिलानि=सम्पूर्ण; कारणानि अधितिष्ठति=कारणोंपर शासन करता है ॥ ३ ॥

व्याख्या —इस प्रकार आपसमें विचार करनेपर जब युक्तियोंद्वारा और अनुमानसे वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके, तब वे सब ध्यानयोगमें स्थित हो गये अर्थात् अपने मन और इन्द्रियोंको बाहरके विषयोंसे हटाकर परब्रह्मको जाननेके लिये उन्हींका चिन्तन करनेमें तत्पर हो गये। ध्यान करते-करते उन्हें परमात्माकी महिमाका अनुभव हुआ। उन्होंने उन परमदेव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी स्वरूपभूत अचिन्त्य दिव्य शक्तिका साक्षात्कार किया, जो अपने ही गुणोंसे—सत्त्व, रज, तमसे ढकी है, अर्थात् जो देखनेमें त्रिगुणमयी प्रतीत होती है, परंतु वास्तवमें तीनों गुणोंसे परे है। तब वे इस निर्णयपर पहुँचे कि कालसे लेकर आत्मातक जितने कारण पहले बताये गये हैं, उन समस्त कारणोंके जो अधिष्ठाता—स्वामी हैं, अर्थात् वे सब जिनकी आज्ञा और प्रेरणा पाकर, जिनकी

अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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उस शक्तिके किसी एक अंशको लेकर अपने-अपने कार्यकि करनेमें समर्थ होते हैं, वे एक सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ही इस जगत्के वास्तविक कारण हैं, दूसरा कोई नहीं है ॥ ३ ॥

तमेकनेमिंत्रिवृत्तंषोडशान्तं
शताधारंविंशतिप्रत्यराभिः ।
अष्टकैःषड्भिर्विश्वरूपैकपाशं
त्रिमार्गभेदंद्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥

तम्=उस; एकनेमिम्=एक नेमिवाले; त्रिवृत्तम्=तीन घेरोंवाले; षोडशान्तम्=सोलह सिरोंवाले; शताधारम्=पचास अरोंवाले; विंशतिप्रत्यराभिः=बीस सहायक अरोंसे; (तथा) षड्भिः अष्टकैः=छः अष्टकोंसे; [ युक्तम् ]=युक्त; विश्वरूपैकपाशम्=अनेक रूपोंवाले एक ही पाशसे युक्त; त्रिमार्गभेदम्=मार्गके तीन भेदोंवाले; (तथा) द्विनिमित्तैकमोहम्=दो निमित्त और मोहरूपी एक नाभिवाले (चक्रको); [ अपश्यन् ]=उन्होंने देखा ॥ ४ ॥

व्याख्या—इस मन्त्रमें विश्वका चक्रके रूपमें वर्णन किया गया है। भाव यह कि परमदेव परमेश्वरकी स्वरूपभूता अचिन्त्यशक्तिका दर्शन करनेवाले वे ऋषिलोग कहते हैं—हमने एक ऐसे चक्रको देखा है, जिसमें एक नेमि है। नेमि उस गोल घेरेको कहते हैं, जो चक्रके अरों और नाभि आदि सब अवयवोंको वेष्टित किये रहती है तथा यथास्थान बनाये रखती है। यहाँ अव्याकृत प्रकृतिको ही 'नेमि' कहा गया है; क्योंकि वही इस व्यक्त जगत्का मूल अथवा आधार है। जिस प्रकार चक्केकी रक्षाके लिये उस नेमिके ऊपर लोहेका घेरा (हाल) चढ़ा रहता है, उसी प्रकार इस संसारचक्रकी अव्याकृत-प्रकृतिरूप नेमिके ऊपर सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही तीन घेरे हैं। यह पहले ही कह आये हैं कि भगवान्की वह अचिन्त्यशक्ति तीन गुणोंसे ढकी है। जिस प्रकार चक्केकी नेमि अलग-अलग सिरोंके जोड़से बनती है, उसी प्रकार संसाररूप चक्रकी प्रकृतिरूप नेमिके मन, बुद्धि और अहंकार तथा आकाश, वायु, तेज, जल और

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

पृथ्वी—ये आठ सूक्ष्म तत्त्व और इनके ही आठ स्थूल रूप—इस प्रकार सोलह सिर हैं। जिस प्रकार चक्रमें अरे लगे रहते हैं, जो एक ओरसे नेमिके टुकड़ोंमें जुड़े रहते हैं और दूसरी ओरसे चक्केकी नाभिमें जुड़े होते हैं, उसी प्रकार इस संसारचक्रमें अन्तःकरणकी वृत्तियोंके पचास भेद तो पचास अरोंकी जगह हैं और पाँच महाभूतोंके कार्य—दस इन्द्रियाँ, पाँच विषय और पाँच प्राण—ये बीस सहायक अरोंकी जगह हैं। इस चक्केमें आठ-आठ चीजोंके* छः समूह अङ्गरूपमें विद्यमान हैं। इन्हींको छः अष्टकोंके नामसे कहा गया है। जीवोंको इस चक्रमें बाँधकर रखनेवाली अनेक रूपोंमें प्रकट आसक्तिरूप एक फाँसी है। देवयान, पितृयान और इसी लोकमें एक योनिसे दूसरी योनिमें जानेका मार्ग—इस प्रकार ये तीन मार्ग हैं। पुण्यकर्म और पापकर्म—ये दो इस जीवको इस चक्रके साथ-साथ घुमानेमें निमित्त हैं और जिसमें अरे टेंगि रहते हैं, उस

  • यहाँ ‘अष्टक’ शब्दसे क्या अभिप्राय है, ठीक-ठीक पता नहीं चलता। चक्रोंमें भी ‘अष्टक’ नामका कोई अङ्ग होता है या नहीं और यदि होता है तो उसका क्या स्वरूप होता है तथा उसे अष्टक क्यों कहते हैं—इसका भी कोई पता नहीं चलता। शाङ्करभाष्यमें भी ‘अष्टक’ किसे कहते हैं—यह खोलकर नहीं बताया गया। इसीलिये छः अष्टकोंकी व्याख्या नहीं की जा सकती। शाङ्करभाष्यके अनुसार छः अष्टक इस प्रकार हैं—

    1. (१) गीता (७।४) में उल्लिखित आठ प्रकारकी प्रकृति अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार;
    2. (२) शरीरगत आठ धातुएँ अर्थात् त्वचा, चमड़ी, मांस, रक्त, मेद, हड्डी, मज्जा और वीर्य;
    3. (३) अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाग्न्य, ईशित्व और वशित्व—ये आठ प्रकारके ऐश्वर्य;
    4. (४) धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य (राग) और अनेश्वर्य—ये आठ भाव;
    5. (५) ब्रह्मा, प्रजापति, देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितर और पिशाच—ये आठ प्रकारकी देवयोनियाँ;

(६) समस्त प्राणियोंके प्रति दया, क्षमा, अनसूया (निन्दा न करना) शौच (बाहर भीतरकी पवित्रता), अनायास, मङ्गल, अकृपणता (उदारता) और अस्मृता—ये आत्माके आठ गुण;

अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४३७

नाभिके स्थानमें अज्ञान है। जिस प्रकार नाभि ही चक्केका केन्द्र है, उसी प्रकार अज्ञान इस जगत्का केन्द्र है ॥ ४ ॥

पञ्चस्रोतोऽम्बुं

पञ्चप्राणोर्मिम्

पञ्चावर्ता

पञ्चाशद्भेदां

पञ्चयोऽन्युगवक्रां

पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम्

पञ्चदुःखौघवेगां

पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥

पञ्चस्रोतोऽम्बुम्=पाँच स्रोतोंसे आनेवाले विषयरूप जलसे युक्त; पञ्चयोऽन्युगवक्राम्=पाँच स्थानोंसे उत्पन्न होकर भयानक और टेढ़ी-मेढ़ी चालसे चलनेवाली; पञ्चप्राणोर्मिम्=पाँच प्राणरूप तरङ्गोंवाली; पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम्=पाँच प्रकारके ज्ञानका आदि कारण मन ही है मूल जिसका; पञ्चावर्ताम्=पाँच भँवरोंवाली; पञ्चदुःखौघवेगाम्=पाँच दुःखरूप प्रवाहके वेगसे युक्त; पञ्चपर्वाम्=पाँच पर्वोंवाली; (और) पञ्चाशद्भेदाम्=पचास भेदोंवाली (नदीको); अधीमः=हमलोग जानते हैं ॥ ५ ॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें संसारका नदीके रूपमें वर्णन किया गया है। वे ब्रह्मज्ञ ऋषि कहते हैं—हम एक ऐसी नदीको देख रहे हैं, जिसमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ही पाँच स्रोत हैं। संसारका ज्ञान हमें पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा ही होता है, इन्हींमेंसे होकर संसारका प्रवाह बहता है। इसीलिये इन्द्रियोंको यहाँ स्रोत कहा गया है। ये इन्द्रियाँ पञ्च सूक्ष्मभूतों (तन्मात्रों)से उत्पन्न हुई हैं, इसीलिये इस नदीके पाँच उद्गम-स्थान माने गये हैं। इस नदीका प्रवाह बड़ा ही भयंकर है। इसमें गिर जानेसे बार-बार जन्म-मृत्युका क्लेश उठाना पड़ता है। संसारकी चाल बड़ी टेढ़ी है, कपटसे भरी है। इसमेंसे निकलना कठिन है। इसीलिये इस संसाररूप नदीको वक्र कहा गया है। जगत्के जीवोंमें जो कुछ भी चेष्टा—हलचल होती है, वह प्राणोंके द्वारा ही होती है। इसीलिये प्राणोंको इस भव-सरिताकी तरङ्गमाला कहा गया है। नदीमें हलचल तरङ्गोंसे ही होती है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा होनेवाले चाक्षुष आदि पाँच प्रकारके ज्ञानोंका आदि कारण मन है, जितने

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

भी ज्ञान हैं, सब मनकी ही तो वृत्तियाँ हैं। मन न हो तो इन्द्रियोंके सचेष्ट रहनेपर भी किसी प्रकारका ज्ञान नहीं होता। यह मन ही संसाररूप नदीका मूल है। मनसे ही संसारकी सृष्टि होती है। सारा जगत् मनकी ही कल्पना है। मनके अमन हो जानेपर—नाश हो जानेपर जगत्का अस्तित्व इस रूपमें नहीं रहता। जबतक मन है, तभीतक संसारचक्र है। इन्द्रियोंके शब्द, स्पर्श आदि पाँच विषय ही इस संसाररूप नदीमें आवर्त अर्थात् भँवर हैं। इन्हींमें फँसकर जीव जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़ जाता है। गर्भका दुःख, जन्मका दुःख, बुढ़ापेका दुःख, रोगका दुःख और मृत्युका दुःख—ये पाँच प्रकारके दुःख ही इस नदीके प्रवाहमें वेगरूप हैं। इन्हींके थपेड़ोंसे जीव व्याकुल रहता है और इस योनिसे उस योनिमें भटकता रहता है। अविद्या (अज्ञान), अस्मिता (अहंकार), राग (प्रिय-बुद्धि), द्वेष (अप्रियबुद्धि) और अभिनिवेश (मृत्युभय)—ये पञ्चविध क्लेश ही इस संसाररूप नदीके पाँच पर्व अर्थात् विभाग हैं। इन्हीं पाँच विभागोंमें यह जगत् बैठा हुआ है। इन पाँचोंका समुदाय ही संसारका स्वरूप है और अन्तःकरणकी पचास वृत्तियाँ ही इस नदीके पचास भेद अर्थात् भिन्न-भिन्न रूप हैं। अन्तःकरणकी वृत्तियोंको लेकर ही संसारमें भेदकी प्रतीति होती है ॥ ५ ॥

सर्वाजीवेसर्वसंस्थेबृहन्ते
अस्मिन्हंसोभ्राम्यते
पृथगात्मानंप्रेरितारं
जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति॥ ६ ॥

अस्मिन्=इस; सर्वाजीवे=सबके जीविकारूप; सर्वसंस्थे=सबके आश्रयभूत; बृहन्ते=विस्तृत; ब्रह्मचक्रे=ब्रह्मचक्रमें; हंसः=जीवात्मा; भ्राम्यते=घुमाया जाता है; [ सः ]=वह; आत्मानम्=अपने-आपको; च=और; प्रेरितारम्=सबके प्रेरक परमात्माको; पृथक्=अलग-अलग, मत्वा=जानकर; ततः=उसके बाद; तेन=उस परमात्मासे; जुष्टः=स्वीकृत होकर; अमृतत्वम्=अमृतभावको; एति=प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥

व्याख्या—जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है, जो सबके जीवन-

अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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निर्वाहका हेतु है और जो समस्त प्राणियोंका आश्रय है, ऐसे इस जगत्-रूप ब्रह्मचक्रमें अर्थात् परब्रह्म परमात्माद्वारा संचालित तथा परमात्माके ही विराट् शरीररूप संसारचक्रमें यह जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार उन परमात्माद्वारा घुमाया जाता है। जबतक यह इसके संचालकको जानकर उनका कृपापात्र नहीं बन जाता, अपनेको उनका प्रिय नहीं बना लेता, तबतक इसका इस चक्रसे छूटकारा नहीं हो सकता। जब यह अपनेको और सबके प्रेरक परमात्माको भलीभाँति पृथक्-पृथक् समझ लेता है कि उन्हींके घुमानेसे मैं इस संसारचक्रमें घूम रहा हूँ और उन्हींकी कृपासे छूट सकता हूँ, तब वह उन परमेश्वरका प्रिय बनकर उनके द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है (क० १।२।२३; मुण्डक० ३।२।३)। फिर तो वह अमृतभावको प्राप्त हो जाता है, जन्म-मरणरूप संसारचक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। परम शान्ति एवं सनातन दिव्य परमधामको प्राप्त हो जाता है (गीता १८।६१-६२)॥६॥

उद्गीतमेतत् परमं तु ब्रह्म तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च। अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः॥७॥

एतत्=यह; उद्गीतम्=वेदवर्णित; परमम् ब्रह्म=परब्रह्म; तु=ही; सुप्रतिष्ठा=सर्वश्रेष्ठ आश्रय; च=और; अक्षरम्=अविनाशी है; तस्मिन्=उसमें; त्रयम्=तीनों लोक स्थित हैं; ब्रह्मविदः=वेदके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुष; अत्र=यहाँ (हृदयमें); अन्तरम्=अन्तर्यामीरूपसे स्थित उस ब्रह्मको; विदित्वा=जानकर; तत्परा=उसीके परायण हो; ब्रह्मणि=उस परब्रह्ममें; लीना=लीन होकर; योनिमुक्ताः=सदाके लिये जन्म-मृत्युसे मुक्त हो गये॥७॥

व्याख्या—जिनकी महिमाका वेदोंमें गान किया गया है, जो परब्रह्म परमात्मा सबके सर्वोत्तम आश्रय हैं, उन्हींमें तीनों लोकोंका समुदायरूप समस्त विश्व स्थित है। वे ही ऊपर बताये हुए सबके प्रेरक, कभी नाश न होनेवाले

४४०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

परम अक्षर, परम देव हैं। जिन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमात्माकी दिव्यशक्तिका दर्शन किया था, वे वेदके रहस्यको समझनेवाले ऋषिलोग उन सबके प्रेरक परमात्माको यहाँ—अपने हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान समझकर, उन्हींके परायण होकर अर्थात् सर्वतोभावसे उनकी शरणमें जाकर, उन्हींमें लीन हो गये और सदाके लिये जन्म-मरणरूप योनिसे मुक्त हो गये। उनके मार्गका अनुसरण करके हम सब लोग भी उन्हींकी भाँति जन्म-मरणसे छूटकर परमात्मामें लीन हो सकते हैं ॥७॥

सम्बन्ध— अब उन परमात्माके स्वरूपका वर्णन करके उन्हें जाननेका फल बताया जाता है—

संयुक्तमेतत् क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः । अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावा- ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥८॥

क्षरम्=विनाशशील जडवर्ग; च=एवं; अक्षरम्=अविनाशी जीवात्मा; संयुक्तम्=(इन दोनोंके) संयोगसे बने हुए; व्यक्ताव्यक्तम्=व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप; एतत् विश्वम्=इस विश्वको; ईशः=परमेश्वर ही; भरते=धारण और पोषण करता है; च=तथा; आत्मा=जीवात्मा; भोक्तृभावात्=इस जगत्के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण; अनीशः=प्रकृतिके अधीन असमर्थ हो; बध्यते=इसमें बँध जाता है; (और) देवम्=उस परमदेव परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; सर्वपाशैः=सब प्रकारके बन्धनोंसे; मुच्यते=मुक्त हो जाता है ॥८॥

व्याख्या— विनाशशील जडवर्ग जिसे भगवान्की अपरा प्रकृति तथा क्षरतत्त्व कहा गया है और भगवान्की परा प्रकृतिरूप जीवसमुदाय, जो अक्षरतत्त्वके नामसे पुकारा जाता है—इन दोनोंके संयोगसे बने हुए, प्रकट (स्थूल) और अप्रकट (सूक्ष्म) रूपमें स्थित इस समस्त जगत्का वे परमपुरुष पुरुषोत्तम ही धारण-पोषण करते हैं, जो सबके स्वामी, सबके प्रेरक तथा सबका यथायोग्य संचालन और नियमन करनेवाले परमेश्वर हैं। जीवात्मा इस जगत्के

अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४४१

विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण प्रकृतिके अधीन हो इसके मोहजालमें फँसा रहता है, उन परमदेव परमात्माकी ओर दृष्टिपात नहीं करता। जब कभी यह उन सर्वसुहृद परमात्माकी अहेतुकी दयासे महापुरुषोंका सङ्ग पाकर उनको जाननेका अभिलाषी होकर पूर्ण चेष्टा करता है, तब उन परमदेव परमेश्वरको जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥

सम्बन्ध— पुनः जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति—इन तीनोंके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन करके, इस तत्त्वको जानकर उपासना करनेका फल दो मन्त्रोंद्वारा बताया जाता है—

ज्ञाज्ञौद्व्रावजावीशनीशा-
वजाहोका
अनन्तश्चात्माविश्वरूपो
त्रयंयदा

ज्ञाज्ञौ=सर्वज्ञ और अज्ञानी; ईशनीशौ=सर्वसमर्थ और असमर्थ; द्वौ=ये दो; अज्ञौ=अजन्मा आत्मा हैं; हि=तथा इनके सिवा; भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता=भोगनेवाले जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग्य-सामग्रीसे युक्त; अज्ञा=अनादि प्रकृति; एका=एक तीसरी शक्ति है; (इन तीनोंमें जो ईश्वरतत्त्व है, वह शेष दोसे विलक्षण है) हि=क्योंकि; आत्मा=वह परमात्मा; अनन्तः=अनन्त; विश्वरूपः=सम्पूर्ण रूपोंवाला; च=और; अकर्ता=कर्तापनके अभिमानसे रहित है; यदा=जब; (मनुष्य इस प्रकार) एतत् त्रयम्=ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन तीनोंको; ब्रह्मम्=ब्रह्मरूपमें; विन्दते=प्राप्त कर लेता है (तब वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है) ॥ ९ ॥

व्याख्या— ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् हैं, जीव अल्पज्ञ और अल्प शक्तिवाला है; ये दोनों ही अजन्मा हैं। इनके सिवा एक तीसरी शक्ति भी अजन्मा है जिसे प्रकृति कहते हैं; यह भोक्ता जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग-सामग्री प्रस्तुत करती है। यद्यपि ये तीनों ही अजन्मा हैं—अनादि हैं, फिर भी ईश्वर शेष दो तत्त्वोंसे विलक्षण हैं; क्योंकि वे परमात्मा अनन्त हैं।

४४२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

(गीता १५।१६-१७) सम्पूर्ण विश्व उन्हींका स्वरूप—विराट शरीर है। वे सब कुछ करते हुए—सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति, पालन और संहार करते हुए भी वास्तवमें कुछ नहीं करते; क्योंकि वे कर्तापनके अभिमानसे रहित हैं। (गीता ४।१३) मनुष्य जब इस प्रकार इन तीनोंकी विलक्षणता और विभिन्नताको समझते हुए ही इन्हें ब्रह्मरूपमें उपलब्ध कर लेता है अर्थात् प्रकृति और जीव तो उन परमेश्वरकी प्रकृतियाँ हैं और परमेश्वर इनके स्वामी हैं—इस प्रकार प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है॥१॥

सम्बन्ध— पहले, आठवें और नवें मन्त्रमें कहे हुए तीनों तत्त्वोंका स्पष्टीकरण अगले मन्त्रमें किया जाता है—

क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। तस्याभिध्यानाद् योजनात् तत्त्वभावाद् भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः॥१०॥

प्रधानम् =प्रकृति तो; क्षरम् =विनाशशील है; हरः =इनको भोगनेवाला जीवात्मा; अमृताक्षरम् =अमृतस्वरूप अविनाशी है; क्षरात्मानौ =इन विनाशशील जड़-तत्त्व और चेतन आत्मा—दोनोंको; एकः =एक; देवः =ईश्वर; ईशते =अपने शासनमें रखता है; (इस प्रकार जानकर) तस्य =उसका; अभिध्यानात् =निरन्तर ध्यान करनेसे; योजनात् =मनको उसमें लगाये रहनेसे; =तथा; तत्त्वभावात् =तन्मय हो जानेसे; अन्ते =अन्तमें (उसीको प्राप्त हो जाता है); भूयः =फिर; विश्वमायानिवृत्तिः =समस्त मायाकी निवृत्ति हो जाती है॥१०॥

व्याख्या— प्रकृति तो क्षर अर्थात् परिवर्तन होनेवाली, विनाशशील है और इसको भोगनेवाला जीव-समुदाय अविनाशी अक्षरतत्त्व है। (गीता ७।४-५; १५।१६) इन क्षर और अक्षर (जड़प्रकृति और चेतन जीव-समुदाय)—दोनों तत्वोंपर एक परमदेव परमेश्वर शासन करते हैं, (गीता १५।१७) वे ही प्राप्त करनेके और जाननेके योग्य हैं, उन्हें तत्वोंसे जानना चाहिये—इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उन परमदेव परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे, उन्हींमें रात-दिन

अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४४३

संग्रह रहनेसे और उन्हींमें तन्मय हो जानेसे अन्तमें यह उन्हींको पा लेता है। फिर इसके सम्पूर्ण मायाकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है, अर्थात् मायामय जगत्से इसका सम्बन्ध सर्वथा छूट जाता है ॥१०॥

सम्बन्ध— उन परमदेवको जाननेका फल पुनः बताया जाता है—

ज्ञात्वादेवंसर्वपाशापहानिः
क्षीणैःक्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः।
तस्याभिध्यानात्तृतीयंदेहभेदे
विश्वैश्वर्यंकेवलंआसकामः ॥ ११ ॥

तस्य=उस परमदेवका; अभिध्यानात्=निरन्तर ध्यान करनेसे; देवम्=उस प्रकाशमय परमात्माको; ज्ञात्वा=जान लेनेपर; सर्वपाशापहानिः=समस्त बन्धनोंका नाश हो जाता है; (क्योंकि) क्लेशैः क्षीणैः=क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण; जन्ममृत्युप्रहाणिः=जन्म-मृत्युका सर्वथा अभाव हो जाता है; (अतः वह) देहभेदे=शरीरका नाश होनेपर; तृतीयम्=तीसरे लोक (स्वर्ग) तकके; विश्वैश्वर्यम् [ त्यक्त्वा ]=समस्त ऐश्वर्यका त्याग करके; केवलः=सर्वथा विशुद्ध; आसकामः=पूर्णकाम हो जाता है ॥११॥

व्याख्या— परमपुरुष परमात्माका निरन्तर ध्यान करते-करते जब साधक उन परमदेवको जान लेता है, तब इसके समस्त बन्धनोंका सदाके लिये सर्वथा नाश हो जाता है; क्योंकि अविद्या, अस्मिता (अहंकार) राग, द्वेष और मरणभय—इन पाँचों क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण उसके जन्म-मरणका सदाके लिये अभाव हो जाता है। अतः वह फिर कभी बन्धनमें नहीं पड़ सकता। वह इस शरीरका नाश होनेपर तृतीय लोक अर्थात् स्वर्गके सबसे ऊँचे स्तर—ब्रह्मलोकतकके बड़े-से-बड़े समस्त ऐश्वर्योंका त्याग करके प्रकृतिसे वियुक्त, सर्वथा विशुद्ध कैवल्यपदको प्राप्त हो पूर्णकाम हो जाता है—उसे किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती; क्योंकि वह सम्पूर्ण कामनाओंका फल पा लेता है ॥११॥

सम्बन्ध— जानने योग्य तत्त्वका पुनः वर्णन किया जाता है—

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

एतन्त्रेयं

नित्यमेवात्मसंस्थं

नातः परं वेदितव्यं हि किंचित्।

भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा

सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥ १२ ॥

आत्मसंस्थम्=अपने ही भीतर स्थित; एतत्=इस ब्रह्मको; एव=ही; नित्यम्=सर्वदा; ज्ञेयम्=जानना चाहिये; हि=क्योंकि; अतः परम्=इससे बढ़कर; वेदितव्यम्=जानने योग्य तत्त्व; किञ्चित्=दूसरा कुछ भी; न=नहीं है; भोक्ता=भोक्ता (जीवात्मा); भोग्यम्=भोग्य (जडवर्ग); च=और; प्रेरितारम्=उनके प्रेरक परमेश्वर; मत्वा=(इन तीनोंको) जानकर; (मनुष्य) सर्वम्=सब कुछ (जान लेता है); एतत्=(इस प्रकार) यह; त्रिविधम्=तीन भेदोंमें; प्रोक्तम्=बताया हुआ ही; ब्रह्मम्=ब्रह्म है ॥ १२ ॥

व्याख्या—ये परमदेव परब्रह्म पुरुषोत्तम अपने ही भीतर—हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। इनको जाननेके लिये कहीं बाहर जानेकी आवश्यकता नहीं है। इहाँको सदा जाननेकी चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि इनसे बढ़कर जानने योग्य दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। इन एकको जाननेसे ही सबका ज्ञान हो जाता है, ये ही सबके कारण और परमाधार हैं। मनुष्य भोक्ता (जीवात्मा), भोग्य (जडवर्ग) और इन दोनोंके प्रेरक ईश्वरको जानकर सब कुछ जान लेता है। फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता। जिनके ये तीन भेद बताये गये हैं, वे ही समग्र ब्रह्म हैं अर्थात् जड प्रकृति, चेतन आत्मा और उन दोनोंके आधार तथा नियामक परमात्मा—ये तीनों ब्रह्मके ही रूप हैं ॥ १२ ॥

सम्बन्ध—उक्त ज्ञेयतत्त्वको जाननेका उपाय बताया जाता है—

वहैर्धृथायोनिगतस्यमूर्ति-
नंदृश्यतेनैव च लिङ्गनाशः।
भूयएवेन्धनयोनिगृह्ण-
स्तद्वोभयंवैप्रणवेन देहे ॥ १३ ॥

यथा=जिस प्रकार; योनिगतस्य=योनि अर्थात् आश्रयभूत काष्ठमें स्थित; वहैः=अग्निका; मूर्तिः=रूप; न दृश्यते=नहीं दीखता; च=और; लिङ्गनाशः=उसके

अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४४५

चिह्नाका (सत्ताका) नाश; एव=भी; न=नहीं होता; (क्योंकि) सः=वह; भूयः एव=चैष्टा करनेपर फिर भी अवश्य; इन्धनयोनिरगृह्यः=ईंधनरूप अपनी योनिमें ग्रहण किया जा सकता है; वा=उसी प्रकार; तत् उभयम्=वे दोनों (जीवात्मा और परमात्मा); देहे=शरीरमें; वै=ही; प्रणवेन=ॐकारके द्वारा (साधन करनेपर); [गृह्यते]=ग्रहण किये जा सकते हैं ॥ १३ ॥

व्याख्या —जिस प्रकार अपनी योनि अर्थात् प्रकट होनेके स्थानविशेष काष्ठ आदिमें स्थित अग्निका रूप दिखलायी नहीं देता। परंतु इस कारण यह नहीं समझा जाता कि अग्नि नहीं है—उसका होना अवश्य माना जाता है; क्योंकि उसकी सत्ता मानकर अरणियोंका मन्थन करनेपर ईंधनरूप अपने स्थानमेंसे वह फिर भी ग्रहण किया जा सकता है। उसी प्रकार उपर्युक्त जीवात्मा और परमात्मा हृदयरूप अपने स्थानमें छिपे रहकर प्रत्यक्ष नहीं होते, परंतु ॐके जपद्वारा साधन करनेपर इस शरीरमें ही इनका साक्षात्कार किया जा सकता है—इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ॥ १३ ॥

सम्बन्ध —ॐकारके द्वारा साधक किस प्रकार उन परमात्माका साक्षात् करे, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—

स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तररणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासाद् देवं पश्येन्निरगृह्यत् ॥ १४ ॥

स्वदेहम्=अपने शरीरको; अरणिम्=नीचेकी अरणि; च=और; प्रणवम्=प्रणवको; उत्तररणिम्=ऊपरकी अरणि; कृत्वा=बनाकर; ध्याननिर्मथनाभ्यासात्=ध्यानके द्वारा निरन्तर मन्थन करते रहनेसे; (साधक) निगृह्यत्=छिपी हुई अग्निकी भाँति; (हृदयमें स्थित) देवम्=परमदेव परमेश्वरको; पश्येत्=देखे ॥ १४ ॥

व्याख्या —अग्निको प्रकट करनेके लिये जैसे दो अरणियोंका मन्थन किया जाता है, उसी प्रकार अपने शरीरमें परम पुरुष परमात्माको प्राप्त करनेके लिये शरीरको तो नीचेकी अरणि बनाना चाहिये और ॐकारको ऊपरकी अरणि। अर्थात् शरीरको नीचेकी अरणिकी भाँति समभावसे निश्चल स्थित करके ऊपरकी अरणिकी भाँति ॐकारका वाणीद्वारा जप और मनसे उसके

४४६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

अर्थस्वरूप परमात्माका निरन्तर चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार इस ध्यानरूप मन्थनके अभ्याससे साधकको काष्ठमें छिपी हुई अग्निकी भाँति अपने हृदयमें छिपे हुए परमदेव परमेश्वरको देख लेना—प्रत्यक्ष कर लेना चाहिये ॥ १४ ॥

तिलेषु तैलं दधनीव सर्पि- रापः स्नोतःस्वरणीषु चाग्निः ।

एवमात्माऽऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्यैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥ १५ ॥

तिलेषु=तिलोंमें; तैलम्=तेल; दधनि=दहीमें; सर्पिः=घी; स्नोतः=सु=स्नोतोंमें; आपः=जल; च=और; अरणीषु=अरणियोंमें; अग्निः=अग्नि; इव=जिस प्रकार छिपे रहते हैं; एवम्=उसी प्रकार; असौ=वह; आत्मा=परमात्मा; आत्मनि=अपने हृदयमें छिपा हुआ है; यः=जो कोई साधक; एनम्=इसको; सत्येन=सत्यके द्वारा; (और) तपसा=संयमरूप तपसे; अनुपश्यति=देखता रहता है—चिन्तन करता रहता है; [ तेन ]=उसके द्वारा; गृह्यते=वह ग्रहण किया जाता है ॥ १५ ॥

व्याख्या—जिस प्रकार तिलोंमें तेल, दहीमें घी, ऊपरसे सूखी हुई नदीके भीतरी स्नोतोंमें जल तथा अरणियोंमें अग्नि छिपी रहती है, उसी प्रकार परमात्मा हमारे हृदयरूप गुफामें छिपे हैं। जिस प्रकार अपने-अपने स्थानमें छिपे हुए तेल आदि उनके लिये बताये हुए उपायोंसे उपलब्ध किये जा सकते हैं, उसी प्रकार जो कोई साधक विषयोंसे विरक्त होकर सदाचार, सत्यभाषण तथा संयमरूप तपस्याके द्वारा साधन करता हुआ पूर्वोक्त प्रकारसे उनका निरन्तर ध्यान करता रहता है, उनके द्वारा वे परब्रह्म परमात्मा भी प्राप्त किये जा सकते हैं ॥ १५ ॥

सर्वव्यापिणमात्मानं क्षीरे सर्पिरिर्वार्पितम् । आत्मविद्यातपोमूलं तद् ब्रह्मोपनिषत् परम् ॥ तद् ब्रह्मोपनिषत् परम् ॥ १६ ॥

क्षीरे=दूधमें; अर्पितम्=स्थित; सर्पिः इव=घीकी भाँति; सर्वव्यापिणम्=

अध्याय २ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४४७

सर्वत्र परिपूर्ण; आत्मविद्यातपोमूलम्=आत्मविद्या तथा तपसे प्राप्त होनेवाले; आत्मानम्=परमात्माको (वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है); तत्=वह; उपनिषत्=उपनिषदोंमें बताया हुआ; परम्=परमतत्त्व; ब्रह्म=ब्रह्म है; तत्=वह; उपनिषत्=उपनिषदोंमें बताया हुआ; परम्=परमतत्त्व; ब्रह्म=ब्रह्म है ॥ १६ ॥

व्याख्या —आत्मविद्या और तप जिनकी प्राप्ति के मूलभूत साधन हैं तथा जो दूधमें स्थित घीकी भाँति सर्वत्र परिपूर्ण हैं, उन सर्वोत्तरीयों परमात्माको वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है। वे ही उपनिषदोंमें वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म हैं। वे ही उपनिषदोंमें वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म हैं। अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ १६ ॥

॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय

सम्बन्ध —पहले अध्यायमें परमदेव परमात्माके साक्षात्कारका प्रधान उपाय ध्यानको बताया गया। उस ध्यानकी प्रक्रिया बतानेके लिये दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले ध्यानकी सिद्धिके लिये पाँच मन्त्रोंमें परमेश्वरसे प्रार्थना करनेका प्रकार बताया जाता है—

युज्ञानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः।

अग्रेज्यौतिर्निचाव्य पृथिव्या अध्याभरत ॥ १ ॥*

सविता=सबको उत्पन्न करनेवाला परमात्मा; प्रथमम्=पहले; मनः=हमारे मन; (और) धियः=बुद्धियोंको; तत्त्वाय=तत्त्वकी प्राप्तिके लिये; युज्ञानः=अपने स्वरूपमें लगते हुए; अग्रे=अग्रि (आदि इन्द्रियाभिानी देवताओं)की; ज्योतिः=ज्योति (प्रकाशन-सामर्थ्य) को; निचाव्य=अवलोकन करके; पृथिव्याः=पार्थिव पदार्थोंसे; अधि=ऊपर उठाकर; आभरत=हमारी इन्द्रियोंमें स्थापित करे ॥ १ ॥

  • यजुर्वेद अध्याय ११ मन्त्र १ इसी प्रकार है।