ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 446, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें४४४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
एतन्त्रेयं
नित्यमेवात्मसंस्थं
नातः परं वेदितव्यं हि किंचित्।
भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा
सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥ १२ ॥
आत्मसंस्थम्=अपने ही भीतर स्थित; एतत्=इस ब्रह्मको; एव=ही; नित्यम्=सर्वदा; ज्ञेयम्=जानना चाहिये; हि=क्योंकि; अतः परम्=इससे बढ़कर; वेदितव्यम्=जानने योग्य तत्त्व; किञ्चित्=दूसरा कुछ भी; न=नहीं है; भोक्ता=भोक्ता (जीवात्मा); भोग्यम्=भोग्य (जडवर्ग); च=और; प्रेरितारम्=उनके प्रेरक परमेश्वर; मत्वा=(इन तीनोंको) जानकर; (मनुष्य) सर्वम्=सब कुछ (जान लेता है); एतत्=(इस प्रकार) यह; त्रिविधम्=तीन भेदोंमें; प्रोक्तम्=बताया हुआ ही; ब्रह्मम्=ब्रह्म है ॥ १२ ॥
व्याख्या—ये परमदेव परब्रह्म पुरुषोत्तम अपने ही भीतर—हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। इनको जाननेके लिये कहीं बाहर जानेकी आवश्यकता नहीं है। इहाँको सदा जाननेकी चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि इनसे बढ़कर जानने योग्य दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। इन एकको जाननेसे ही सबका ज्ञान हो जाता है, ये ही सबके कारण और परमाधार हैं। मनुष्य भोक्ता (जीवात्मा), भोग्य (जडवर्ग) और इन दोनोंके प्रेरक ईश्वरको जानकर सब कुछ जान लेता है। फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता। जिनके ये तीन भेद बताये गये हैं, वे ही समग्र ब्रह्म हैं अर्थात् जड प्रकृति, चेतन आत्मा और उन दोनोंके आधार तथा नियामक परमात्मा—ये तीनों ब्रह्मके ही रूप हैं ॥ १२ ॥
सम्बन्ध—उक्त ज्ञेयतत्त्वको जाननेका उपाय बताया जाता है—
| वहैर्धृथा | योनिगतस्य | मूर्ति- |
|---|---|---|
| नं | दृश्यते | नैव च लिङ्गनाशः। |
| स | भूय | एवेन्धनयोनिगृह्ण- |
| स्तद्वोभयं | वै | प्रणवेन देहे ॥ १३ ॥ |
यथा=जिस प्रकार; योनिगतस्य=योनि अर्थात् आश्रयभूत काष्ठमें स्थित; वहैः=अग्निका; मूर्तिः=रूप; न दृश्यते=नहीं दीखता; च=और; लिङ्गनाशः=उसके