ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 447, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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चिह्नाका (सत्ताका) नाश; एव=भी; न=नहीं होता; (क्योंकि) सः=वह; भूयः एव=चैष्टा करनेपर फिर भी अवश्य; इन्धनयोनिरगृह्यः=ईंधनरूप अपनी योनिमें ग्रहण किया जा सकता है; वा=उसी प्रकार; तत् उभयम्=वे दोनों (जीवात्मा और परमात्मा); देहे=शरीरमें; वै=ही; प्रणवेन=ॐकारके द्वारा (साधन करनेपर); [गृह्यते]=ग्रहण किये जा सकते हैं ॥ १३ ॥
व्याख्या —जिस प्रकार अपनी योनि अर्थात् प्रकट होनेके स्थानविशेष काष्ठ आदिमें स्थित अग्निका रूप दिखलायी नहीं देता। परंतु इस कारण यह नहीं समझा जाता कि अग्नि नहीं है—उसका होना अवश्य माना जाता है; क्योंकि उसकी सत्ता मानकर अरणियोंका मन्थन करनेपर ईंधनरूप अपने स्थानमेंसे वह फिर भी ग्रहण किया जा सकता है। उसी प्रकार उपर्युक्त जीवात्मा और परमात्मा हृदयरूप अपने स्थानमें छिपे रहकर प्रत्यक्ष नहीं होते, परंतु ॐके जपद्वारा साधन करनेपर इस शरीरमें ही इनका साक्षात्कार किया जा सकता है—इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ॥ १३ ॥
सम्बन्ध —ॐकारके द्वारा साधक किस प्रकार उन परमात्माका साक्षात् करे, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—
स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तररणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासाद् देवं पश्येन्निरगृह्यत् ॥ १४ ॥
स्वदेहम्=अपने शरीरको; अरणिम्=नीचेकी अरणि; च=और; प्रणवम्=प्रणवको; उत्तररणिम्=ऊपरकी अरणि; कृत्वा=बनाकर; ध्याननिर्मथनाभ्यासात्=ध्यानके द्वारा निरन्तर मन्थन करते रहनेसे; (साधक) निगृह्यत्=छिपी हुई अग्निकी भाँति; (हृदयमें स्थित) देवम्=परमदेव परमेश्वरको; पश्येत्=देखे ॥ १४ ॥
व्याख्या —अग्निको प्रकट करनेके लिये जैसे दो अरणियोंका मन्थन किया जाता है, उसी प्रकार अपने शरीरमें परम पुरुष परमात्माको प्राप्त करनेके लिये शरीरको तो नीचेकी अरणि बनाना चाहिये और ॐकारको ऊपरकी अरणि। अर्थात् शरीरको नीचेकी अरणिकी भाँति समभावसे निश्चल स्थित करके ऊपरकी अरणिकी भाँति ॐकारका वाणीद्वारा जप और मनसे उसके