ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 448, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
अर्थस्वरूप परमात्माका निरन्तर चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार इस ध्यानरूप मन्थनके अभ्याससे साधकको काष्ठमें छिपी हुई अग्निकी भाँति अपने हृदयमें छिपे हुए परमदेव परमेश्वरको देख लेना—प्रत्यक्ष कर लेना चाहिये ॥ १४ ॥
तिलेषु तैलं दधनीव सर्पि- रापः स्नोतःस्वरणीषु चाग्निः ।
एवमात्माऽऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्यैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥ १५ ॥
तिलेषु=तिलोंमें; तैलम्=तेल; दधनि=दहीमें; सर्पिः=घी; स्नोतः=सु=स्नोतोंमें; आपः=जल; च=और; अरणीषु=अरणियोंमें; अग्निः=अग्नि; इव=जिस प्रकार छिपे रहते हैं; एवम्=उसी प्रकार; असौ=वह; आत्मा=परमात्मा; आत्मनि=अपने हृदयमें छिपा हुआ है; यः=जो कोई साधक; एनम्=इसको; सत्येन=सत्यके द्वारा; (और) तपसा=संयमरूप तपसे; अनुपश्यति=देखता रहता है—चिन्तन करता रहता है; [ तेन ]=उसके द्वारा; गृह्यते=वह ग्रहण किया जाता है ॥ १५ ॥
व्याख्या—जिस प्रकार तिलोंमें तेल, दहीमें घी, ऊपरसे सूखी हुई नदीके भीतरी स्नोतोंमें जल तथा अरणियोंमें अग्नि छिपी रहती है, उसी प्रकार परमात्मा हमारे हृदयरूप गुफामें छिपे हैं। जिस प्रकार अपने-अपने स्थानमें छिपे हुए तेल आदि उनके लिये बताये हुए उपायोंसे उपलब्ध किये जा सकते हैं, उसी प्रकार जो कोई साधक विषयोंसे विरक्त होकर सदाचार, सत्यभाषण तथा संयमरूप तपस्याके द्वारा साधन करता हुआ पूर्वोक्त प्रकारसे उनका निरन्तर ध्यान करता रहता है, उनके द्वारा वे परब्रह्म परमात्मा भी प्राप्त किये जा सकते हैं ॥ १५ ॥
सर्वव्यापिणमात्मानं क्षीरे सर्पिरिर्वार्पितम् । आत्मविद्यातपोमूलं तद् ब्रह्मोपनिषत् परम् ॥ तद् ब्रह्मोपनिषत् परम् ॥ १६ ॥
क्षीरे=दूधमें; अर्पितम्=स्थित; सर्पिः इव=घीकी भाँति; सर्वव्यापिणम्=