ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
अर्थस्वरूप परमात्माका निरन्तर चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार इस ध्यानरूप मन्थनके अभ्याससे साधकको काष्ठमें छिपी हुई अग्निकी भाँति अपने हृदयमें छिपे हुए परमदेव परमेश्वरको देख लेना—प्रत्यक्ष कर लेना चाहिये ॥ १४ ॥
तिलेषु तैलं दधनीव सर्पि- रापः स्नोतःस्वरणीषु चाग्निः ।
एवमात्माऽऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्यैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥ १५ ॥
तिलेषु=तिलोंमें; तैलम्=तेल; दधनि=दहीमें; सर्पिः=घी; स्नोतः=सु=स्नोतोंमें; आपः=जल; च=और; अरणीषु=अरणियोंमें; अग्निः=अग्नि; इव=जिस प्रकार छिपे रहते हैं; एवम्=उसी प्रकार; असौ=वह; आत्मा=परमात्मा; आत्मनि=अपने हृदयमें छिपा हुआ है; यः=जो कोई साधक; एनम्=इसको; सत्येन=सत्यके द्वारा; (और) तपसा=संयमरूप तपसे; अनुपश्यति=देखता रहता है—चिन्तन करता रहता है; [ तेन ]=उसके द्वारा; गृह्यते=वह ग्रहण किया जाता है ॥ १५ ॥
व्याख्या—जिस प्रकार तिलोंमें तेल, दहीमें घी, ऊपरसे सूखी हुई नदीके भीतरी स्नोतोंमें जल तथा अरणियोंमें अग्नि छिपी रहती है, उसी प्रकार परमात्मा हमारे हृदयरूप गुफामें छिपे हैं। जिस प्रकार अपने-अपने स्थानमें छिपे हुए तेल आदि उनके लिये बताये हुए उपायोंसे उपलब्ध किये जा सकते हैं, उसी प्रकार जो कोई साधक विषयोंसे विरक्त होकर सदाचार, सत्यभाषण तथा संयमरूप तपस्याके द्वारा साधन करता हुआ पूर्वोक्त प्रकारसे उनका निरन्तर ध्यान करता रहता है, उनके द्वारा वे परब्रह्म परमात्मा भी प्राप्त किये जा सकते हैं ॥ १५ ॥
सर्वव्यापिणमात्मानं क्षीरे सर्पिरिर्वार्पितम् । आत्मविद्यातपोमूलं तद् ब्रह्मोपनिषत् परम् ॥ तद् ब्रह्मोपनिषत् परम् ॥ १६ ॥
क्षीरे=दूधमें; अर्पितम्=स्थित; सर्पिः इव=घीकी भाँति; सर्वव्यापिणम्=
अध्याय २ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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सर्वत्र परिपूर्ण; आत्मविद्यातपोमूलम्=आत्मविद्या तथा तपसे प्राप्त होनेवाले; आत्मानम्=परमात्माको (वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है); तत्=वह; उपनिषत्=उपनिषदोंमें बताया हुआ; परम्=परमतत्त्व; ब्रह्म=ब्रह्म है; तत्=वह; उपनिषत्=उपनिषदोंमें बताया हुआ; परम्=परमतत्त्व; ब्रह्म=ब्रह्म है ॥ १६ ॥
व्याख्या —आत्मविद्या और तप जिनकी प्राप्ति के मूलभूत साधन हैं तथा जो दूधमें स्थित घीकी भाँति सर्वत्र परिपूर्ण हैं, उन सर्वोत्तरीयों परमात्माको वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है। वे ही उपनिषदोंमें वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म हैं। वे ही उपनिषदोंमें वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म हैं। अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ १६ ॥
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय अध्याय
सम्बन्ध —पहले अध्यायमें परमदेव परमात्माके साक्षात्कारका प्रधान उपाय ध्यानको बताया गया। उस ध्यानकी प्रक्रिया बतानेके लिये दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले ध्यानकी सिद्धिके लिये पाँच मन्त्रोंमें परमेश्वरसे प्रार्थना करनेका प्रकार बताया जाता है—
युज्ञानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः।
अग्रेज्यौतिर्निचाव्य पृथिव्या अध्याभरत ॥ १ ॥*
सविता=सबको उत्पन्न करनेवाला परमात्मा; प्रथमम्=पहले; मनः=हमारे मन; (और) धियः=बुद्धियोंको; तत्त्वाय=तत्त्वकी प्राप्तिके लिये; युज्ञानः=अपने स्वरूपमें लगते हुए; अग्रे=अग्रि (आदि इन्द्रियाभिानी देवताओं)की; ज्योतिः=ज्योति (प्रकाशन-सामर्थ्य) को; निचाव्य=अवलोकन करके; पृथिव्याः=पार्थिव पदार्थोंसे; अधि=ऊपर उठाकर; आभरत=हमारी इन्द्रियोंमें स्थापित करे ॥ १ ॥
- यजुर्वेद अध्याय ११ मन्त्र १ इसी प्रकार है।
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[ अध्याय २ ]
व्याख्या —सबको उत्पन्न करनेवाले परमात्मा पहले हमारे मन और बुद्धि की वृत्तियोंको तत्वकी प्राप्तिके लिये अपने दिव्य स्वरूपमें लगायें और अग्नि आदि इन्द्रियाभिमानी देवताओंकी जो विषयोंको प्रकाशित करनेकी सामर्थ्य है, उसे दृष्टिमें रखते हुए बाह्य विषयोंसे लौटाकर हमारी इन्द्रियोंमें स्थिरतापूर्वक स्थापित कर दें, जिससे हमारी इन्द्रियोंका प्रकाश बाहर न जाकर बुद्धि और मनकी स्थिरतामें सहायक हो ॥ १ ॥
युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे। सुवर्गेयाय शक्त्या ॥ २ ॥*
वयम् =हमलोग; सवितुः =सबको उत्पन्न करनेवाले; देवस्य =परमदेव परमेश्वरकी; सवे =आराधनारूप यज्ञमें; युक्तेन मनसा =लगे हुए मनके द्वारा; सुवर्गेयाय =स्वर्गीय सुख (भगवत्-प्राप्ति-जनित आनन्द)की प्राप्तिके लिये; शक्त्या =पूरी शक्तिसे; [ प्रयतामहै ]=प्रयत्न करें ॥ २ ॥
व्याख्या —हमलोग सबको उत्पन्न करनेवाले, परमदेव परमेश्वरकी आराधनारूप यज्ञमें लगे हुए मनके द्वारा परमानन्दप्राप्तिके लिये पूर्णशक्तिसे प्रयत्न करें। अर्थात् हमारा मन निरन्तर भगवान्की आराधनामें लगा रहे और हम भगवत्-प्राप्ति-जनित परमानन्दकी अनुभूतिके लिये पूर्ण शक्तिसे प्रयत्नशील रहें ॥ २ ॥
युक्त्वाय मनसा देवान् सुवर्त्यतो धिया दिवम्।
बृहन्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान् ॥ ३ ॥†
सविता =सबको उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर; सुवः =स्वर्गादि लोकोंमें; (और) दिवम् =आकाशमें; यतः =गमन करनेवाले; (तथा) बृहत् =बड़ा भारी; ज्योतिः =प्रकाश; करिष्यतः =फैलानेवाले; तान् =उन; (मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) देवान् =देवताओंको; मनसा =हमारे मन; (और) धिया =बुद्धिसे; युक्त्वाय =संयुक्त करके; (प्रकाश दान करनेके लिये) प्रसुवाति =प्रेरणा करता है अर्थात् करे ॥ ३ ॥
व्याख्या —वे सबको उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवताओंको, जो स्वर्ग आदि लोकोंमें और आकाशमें विचरनेवाले तथा
- † ये दोनों मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ११ के २ और ३ हैं।
अध्याय २ ]
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बड़ा भारी प्रकाश फैलानेवाले हैं, हमारे मन और बुद्धिसे संयुक्त करके हमें प्रकाश प्रदान करनेके लिये प्रेरणा करें; ताकि हम उन परमेश्वरका साक्षात् करनेके लिये ध्यान करनेमें समर्थ हों। हमारे मन, बुद्धि और इन्द्रियोंमें प्रकाश फैला रहे। निद्रा, आलस्य और अकर्मण्यता आदि दोष हमारे ध्यानमें विघ्न न कर सकें ॥ ३ ॥
युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपक्षितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्णुतिः ॥ ४ ॥*
(जिसमें) विप्राः=ब्राह्मण आदि; मनः=मनको; युञ्जते=लगाते हैं; उत=और; धियः=बुद्धिकी वृत्तियोंको भी; युञ्जते=लगाते हैं; (जिसने समस्त) होत्राः वि दधे=अग्निहोत्र आदि शुभ कर्मोंका विधान किया है; (तथा जो) वयुनावित्=समस्त जगत्के विचारोंको जाननेवाला; (और) एकः=एक है; (उस) बृहतः=सबसे महान्; विप्रस्य=सर्वत्र व्यापक; विपक्षितः=सर्वज्ञ; (एवं) सवितुः=सबके उत्पादक; देवस्य=परमदेव परमेश्वरकी; इत्=निश्चय ही; (हमें) मही=महती; परिष्णुतिः=स्तुति (करनी चाहिये) ॥ ४ ॥
व्याख्या —जिन परब्रह्म परमात्मामें श्रेष्ठ बुद्धिवाले ब्राह्मणादि अधिकारी मनुष्य अपने मनको लगाते हैं तथा अपनी सब प्रकारकी बुद्धि-वृत्तियोंको भी नियुक्त करते हैं, जिन्होंने अग्निहोत्र आदि समस्त शुभ कर्मोंका विधान किया है, जो समस्त जगत्के विचारोंको जाननेवाले और एक—अद्वितीय हैं, उन सबसे महान्, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सबके उत्पादक परमदेव परमेश्वरकी अवश्य ही हमें भूरि-भूरि स्तुति करनी चाहिये ॥ ४ ॥
युजे वां ब्रह्म पूर्वं नमोभि- र्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरैः ।
- यह यजुर्वेद अध्याय ११का चौथा और अध्याय ५ का १४ वां मन्त्र है तथा ऋग्वेद (५।८१।१) में भी है।
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[ अध्याय २ ]
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥ ५ ॥*
(हे मन और बुद्धि! मैं) वाम्=तुम दोनोंके (स्वामी); पूर्वम्=सबके आदि; ब्रह्म=पूर्णब्रह्म परमात्मासे; नमोभिः=बार-बार नमस्कारके द्वारा; युजे=संयुक्त होता हूँ; श्लोकः=मेरा वह स्तुति-पाठ; सुरेः=श्रेष्ठ विद्वान्की; पथ्या इव=कीर्तिकी भाँति; व्येतु (वि+एतु)=सर्वत्र फैल जाय; (जिससे) अमृतस्य=अविनाशी परमात्माके; विश्वे=समस्त; पुत्राः=पुत्र; ये=जो; दिव्यानि=दिव्य; धामानि=लोकोंमें; आतस्थुः=निवास करते हैं; शृण्वन्तु=सुनें ॥ ५ ॥
व्याख्या—हे मन और बुद्धि! मैं तुम दोनोंके स्वामी और समस्त जगत्के आदिकारण परब्रह्म परमात्माको बार-बार नमस्कार करके विनयपूर्वक उनकी शरणमें जाकर उनमें संलग्न होता हूँ। मेरे द्वारा जो उन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन किया गया है, वह विद्वान् पुरुषकी कीर्तिके समान समस्त जगत्में व्याप्त हो जाय। उसे अविनाशी परमात्माके वे सभी पुत्र, जो दिव्य लोकोंमें निवास करते हैं, भलीभाँति सुनें ॥ ५ ॥
सम्बन्ध—ध्यानके लिये परमात्मासे स्तुति करनेका प्रकार बतलानेके अनन्तर अब छठे मन्त्रमें उस ध्यानकी स्थितिका वर्णन करके सातवेंमें मनुष्यको उस ध्यानमें लग जानेके लिये आदेश दिया जाता है—
अग्निर्वत्राभिमध्यते वायुर्वत्राधिरुध्यते ।
सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥ ६ ॥
यत्र=जिस स्थितिमें; अग्निः=परमात्मारूप अग्निको; (प्राप्त करनेके उद्देश्यसे) अभिमध्यते=(ऊँकारके जप और ध्यानद्वारा) मन्थन किया जाता है; यत्र=जहाँ; वायुः अधिरुध्यते=प्राणवायुका भलीभाँति विधिपूर्वक निरोध किया जाता है; (तथा) यत्र=जहाँ; सोमः=आनन्दरूप सोमरस; अतिरिच्यते=अधिकतासे प्रकट होता है; तत्र=वहाँ (उस स्थितिमें); मनः=मन; संजायते=सर्वथा विशुद्ध हो जाता है ॥ ६ ॥
- यह मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ११का पाँचवाँ है और ऋग्वेद (१०।१३।१) में भी है।
अध्याय २ ]
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व्याख्या —जिस स्थितिमें अग्नि प्रकट करनेके लिये अरणियोंद्वारा मन्थन करनेकी भाँति अग्निस्थानीय परमात्माको प्राप्त करनेके लिये पहले अध्याय (१३,१४ मन्त्र)में कहे हुए प्रकारसे शरीरको नीचेकी अरणि और ऊँकारको ऊपरकी अरणि बनाकर उसका जप और उसके अर्थरूप परमात्माका निरन्तर चिन्तनरूप मन्थन किया जाता है, जहाँ प्राणवायुका विधिपूर्वक भलीभाँति निरोध किया जाता है, जहाँ आनन्दरूप सोमरस अधिकतासे प्रकट होता है, उस ध्यानावस्थामें मनुष्यका मन सर्वथा विशुद्ध हो जाता है ॥६॥
सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम्। तत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्वमक्षिपत् ॥७॥
सवित्रा =सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमात्माके द्वारा; प्रसवेन =प्राप्त हुई प्रेरणासे; पूर्व्यम् =सबके आदिकारण; ब्रह्म जुषेत =उस परब्रह्म परमेश्वरकी ही सेवा (आराधना) करनी चाहिये; (तू) तत्र =उस परमात्मामें ही; योनिम् =आश्रय; कृणवसे =प्राप्त कर; हि =क्योंकि; (यों करनेसे) ते =तेरे; पूर्व्यम् =पूर्वसंचित कर्म; न अक्षिपत् =विघ्नकारक नहीं होंगे ॥७॥
व्याख्या —हे साधक! सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक सर्वान्तर््यामी परमेश्वरकी प्रेरणासे अर्थात् ऊपर बताये हुए प्रकारसे परमात्माकी स्तुति करके उनसे अनुमति प्राप्त कर तुम्हें उन सबके आदि परब्रह्म परमात्माकी ही सेवा (समाराधना) करनी चाहिये, उन परमेश्वरमें ही आश्रय प्राप्त करना चाहिये—उन्हींकी शरण ग्रहण करके उन्हींमें अपने-आपको विलीन कर देना चाहिये। यों करनेसे तुम्हारे पहले किये हुए समस्त संचित कर्म विघ्नकारक नहीं होंगे—बन्धनरूप नहीं होंगे ॥७॥
सम्बन्ध —ध्यानयोगका साधन करनेवालेको किस प्रकार बैठकर कैसे ध्यान करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य। ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्वोत्तंसि सर्वाणि भयावहानि ॥८॥
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[ अध्याय २ ]
विद्वान्=बुद्धिमान् मनुष्य (को चाहिये कि); त्रिरुत्रतम्=सिर, गला और छाती—ये तीनों अङ्ग ऊँचे उठाये हुए; शरीरम्=शरीरको; समम्=सीधा; (और) स्थाप्य=स्थिर करके; (तथा) इन्द्रियाणि=समस्त इन्द्रियोंको; मनसा=मनके द्वारा; हृदि=हृदयमें; सनिवेश्य=निरुद्ध करके; ब्रह्मोदुपेन=ॐकाररूप नौकाद्वारा; सर्वाणि=सम्पूर्ण; भयावहनि=भयंकर; स्रोतांसि=स्रोतों (प्रवाहों) को; प्रतरेत=पार कर जाय ॥ ८ ॥
व्याख्या —जो ध्यानयोगका साधन करे, उस बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि सिर, गले और छातीको ऊँचा उठाये रखे, इधर-उधर न झुकने दे तथा शरीरको सीधा और स्थिर रखे; क्योंकि शरीरको सीधा और स्थिर रखे बिना तथा सिर, गला और वक्षःस्थल ऊँचा किये बिना आलस्य, निद्रा और विश्लेषरूप विघ्न आ जाते हैं। अतः इन विघ्नोंसे बचनेके लिये उपर्युक्त प्रकारसे ही बैठना चाहिये। इसके बाद समस्त इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर उनका मनके द्वारा हृदयमें निरोध कर लेना चाहिये। फिर ॐकाररूप नौकाका आश्रय लेकर अर्थात् ॐकारका जप और उसके वाच्य परब्रह्म परमात्माका ध्यान करके समस्त भयानक प्रवाहोंको पार कर लेना चाहिये (गीता ६।१२, १३, १४)। भाव यह है कि नाना योनियोंमें ले जानेवाली जितनी वासनाएँ हैं, वे सब जन्म-मृत्युरूप भय देनेवाले स्रोत (प्रवाह) हैं। इन सबका त्याग करके सदाके लिये अमरपदको प्राप्त कर लेना चाहिये ॥ ८ ॥
प्राणान् प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छसीत। दुष्टाश्चयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान् मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ९ ॥
विद्वान्=बुद्धिमान् साधक (को चाहिये कि); इह=उपर्युक्त योगसाधनामें; संयुक्तचेष्टः=आहार-विहार आदि समस्त चेष्टाओंको यथायोग्य करते हुए; प्राणान् प्रपीड्य=विधिवत् प्राणायाम करके; प्राणे क्षीणे=प्राणके सूक्ष्म हो जानेपर; नासिकया=नासिकाद्वारा; उच्छसीत=उनको बाहर निकाल दे; दुष्टाश्चयुक्तम्=(इसके
अध्याय २ ]
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बाद) दुष्ट घोड़ोंसे युक्त; वाहम् इव =रथको जिस प्रकार सारथि सावधानतापूर्वक गन्तव्य मार्गमें ले जाता है, उसी प्रकार; एनम् =इस; मनः =मनको; अप्रमत्तः =सावधान होकर; धारयेत=वशमें किये रहे ॥१॥
व्याख्या —बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि वह इस योग-साधनाके लिये आहार-विहार आदि समस्त चेष्टाओंको यथायोग्य करता रहे, उन्हें ध्यानयोगके लिये उपयोगी बना ले (गीता ६।१७)। योगशास्त्रकी विधिके अनुसार प्राणायाम करते-करते जब प्राण अत्यन्त सूक्ष्म हो जाय, तब नासिकाद्वारा उसे बाहर निकाल दे।* इसके बाद जैसे दुष्ट घोड़ोंसे जुते हुए रथको अच्छा सारथि बड़ी सावधानीसे चलाकर अपने गन्तव्य स्थानपर ले जाता है, उसी प्रकार साधकको चाहिये कि बड़ी सावधानीके साथ अपने मनको वशमें रखे, जिससे योगसाधनमें किसी प्रकारका विघ्न न आये और वह परमात्माकी प्रसिरूप लक्ष्यपर पहुँच जाय। ॥१॥
सम्बन्ध —परब्रह्म परमात्मामें मन लगानेके लिये कैसे स्थानमें कैसी भूमिपर बैठकर साधन करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—
समे शुचौ शर्करावह्निवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥
समे=समतल; शुचौ=सब प्रकारसे शुद्ध; शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते=कंकड़, अग्नि और बालूसे रहित; (तथा) शब्दजलाश्रयादिभिः=शब्द, जल और आश्रय आदिकी दूषित; अनुकूले=सर्वथा अनुकूल; तु=और; न चक्षुपीडने=नेत्रोंको पीड़ा न देनेवाले; गुहानिवाताश्रयणे=गुहा आदि वायुयुक्त स्थानमें; मनः=मनको; प्रयोजयेत्=ध्यानमें लगानेका अभ्यास करना चाहिये ॥१०॥
- आठवें और नवें मन्त्रोंमें जो ध्यानके लिये बैठनेकी और साधन करनेकी विधि बतायी गयी है, उसका बड़े सुन्दर ढंगसे सुस्पष्ट वर्णन भगवान्ने गीता अध्याय ६ श्लोक ११से १७ तक किया है।
† कठोपनिषद्में (१।३।२ से ८ तक) रथके रूपकका विस्तृत वर्णन है।
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[ अध्याय २ ]
व्याख्या —इस मन्त्रमें ध्यानयोगके उपयुक्त स्थानका वर्णन है। भाव यह है कि ध्यानयोगका साधन करनेवाले साधकको ऐसे स्थानमें अपना आसन लगाना चाहिये, जहाँकी भूमि समतल हो—ऊँची-नीची, टेढ़ी-मेढ़ी न हो, जो सब प्रकारसे शुद्ध हो—जहाँपर कूड़ा-करकट, मैला आदि न हो, झाड़-बुहारकर साफ किया हुआ हो और स्वभावसे भी पवित्र हो—जैसे कोई देवालय, तीर्थस्थान आदि; जहाँ कंकड़, बालू न हो और अग्नि या धूपकी गर्मी भी न हो; जहाँ कोई मनमें विशेष करनेवाला शब्द न होता हो—कोलाहलका सर्वथा अभाव हो; यथावश्यक जल प्राप्त हो सके; किंतु ऐसा जलाशय न हो, जहाँ बहुत लोग आते-जाते हों एवं जहाँ शरीर-रक्षाके लिये उपयुक्त आश्रय हो, परंतु ऐसा न हो, जहाँ धर्मशाला आदिकी भाँति बहुत लोग ठहरते हों; तात्पर्य यह कि इन सब विचारोंके अनुसार जो सर्वथा अनुकूल हो और जहाँका दृश्य नेत्रोंको पीड़ा पहुँचानेवाला—भयानक न हो, ऐसे गुफा आदि वायुशून्य एकांत स्थानमें पहले बताये हुए प्रकारसे आसन लगाकर अपने मनको परमात्मामें लगानेका अभ्यास करना चाहिये (गीता ६।११) ॥१०॥
सम्बन्ध —योगाभ्यास करनेवाले साधकका साधन ठीक हो रहा है या नहीं, इसकी पहचान बतायी जाती है—
नीहारधूमाकर्निलानलानां
खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।
एतानि रूपाणि पुरःसराणि
ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥ ११ ॥
ब्रह्मणि योगे =परमात्माकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले योगमें; (पहले) नीहारधूमाकर्निलानलानाम् =कुहरा, धूआँ, सूर्य, वायु और अग्निके सद्गुण; (तथा) खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् =जुगनू, बिजली, स्फटिक-मणि और चन्द्रमाके सद्गुण; रूपाणि =बहुत-से दृश्य; पुरःसराणि [ भवन्ति ]=योगीके सामने प्रकट होते हैं; एतानि =ये सब; अभिव्यक्तिकराणि =योगकी सफलताको स्पष्टरूपसे सूचित करनेवाले हैं ॥ ११ ॥
अध्याय २ ]
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व्याख्या —जब साधक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ध्यानयोगका साधन आरम्भ करता है, तब उसको अपने सामने कभी कुहरेके सदृश रूप दीखता है, कभी धूआँ-सा दिखायी देता है, कभी सूर्यके समान प्रकाश सर्वत्र परिपूर्ण दीखता है, कभी निश्चल वायुकी भाँति निराकार रूप अनुभवमें आता है, कभी अग्निके सदृश तेज दीख पड़ता है, कभी जुगनूके सदृश टिमटिमाहट-सी प्रतीत होती है, कभी बिजलीकी-सी चकाचौंध पैदा करनेवाली दीसि दृष्टिगोचर होती है, कभी स्फटिक-मणिके सदृश उज्ज्वल रूप देखनेमें आता है और कभी चन्द्रमाकी भाँति शीतल प्रकाश सर्वत्र फैला हुआ दिखायी देता है। ये सब तथा और भी अनेक दृश्य योग-साधनकी उन्नतिके द्योतक हैं। इनसे यह बात समझमें आती है कि साधकका ध्यान ठीक हो रहा है ॥ ११ ॥
पृथ्व्यसेजोऽनिलखे
समुत्थिते
पञ्चात्मके
योगगुणे
प्रवृत्ते ।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः
प्रासस्य
योगाग्रिमयं
शरीरम् ॥ १२ ॥
पृथ्व्यसेजोऽनिलखे समुत्थिते =पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँचों महाभूतोंका सम्यक् प्रकारसे उत्थान होनेपर; (तथा) पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते =इनसे सम्बन्ध रखनेवाले पाँच प्रकारके योगसम्बन्धी गुणोंकी सिद्धि हो जानेपर; योगाग्रिमयम् =योगाग्रिमय; शरीरम् =शरीरको; प्रासस्य =प्रास कर लेनेवाले; तस्य =उस साधकको; न =न तो; रोगः =रोग होता है; न =न; जरा =बुढ़ापा आता है; न =और न; मृत्युः =उसकी मृत्यु ही होती है ॥ १२ ॥
व्याख्या —ध्यानयोगका साधन करते-करते जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच महाभूतोंका उत्थान हो जाता है, अर्थात् जब साधकका इन पाँचों महाभूतोंपर अधिकार हो जाता है और इन पाँचों महाभूतोंसे सम्बन्ध रखनेवाली योगविषयक पाँचों सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं, उस समय योगाग्रिमय शरीरको प्रास कर लेनेवाले उस योगीके शरीरमें न तो रोग होता है, न बुढ़ापा
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
आता है और न उसकी मृत्यु ही होती है। अभिप्राय यह कि उसकी इच्छाके बिना उसका शरीर नष्ट नहीं हो सकता (योगद० ३। ४६, ४७) ॥ १२ ॥
लघुत्वमारोग्यमलोलुप्तत्वं
| वर्णप्रसादं | स्वरसौष्ठवं | च। ---|---|---|--- गन्धः | शुभो | मूत्रपुरीषमल्पं | | योगप्रवृत्तिं | प्रथमां | वदन्ति ॥ १३ ॥
लघुत्वम्=शरीरका हल्कापन; आरोग्यम्=किसी प्रकारके रोगका न होना; अलोलुप्तत्वम्=विषयासक्तिकी निवृत्ति; वर्णप्रसादम्=शारीरिक वर्णकी उज्ज्वलता; स्वरसौष्ठवम्=स्वरकी मधुरता; शुभः गन्धः=(शरीरमें) अच्छी गन्ध; च=और; मूत्रपुरीषम्=मल-मूत्र; अल्पम्=कम हो जाना; (इन सबको) प्रथमाम् योगप्रवृत्तिम्=योगकी पहली सिद्धि; वदन्ति=कहते हैं ॥ १३ ॥
व्याख्या—भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेनेवाले ध्यानयोगीमें पूर्वोक्त शक्तियोंके सिवा और भी शक्तियाँ आ जाती हैं। उदाहरणतः उसका शरीर हल्का हो जाता है, शरीरमें भारीपन या आलस्यका भाव नहीं रहता। वह सदा ही नीरोग रहता है, उसे कभी कोई रोग नहीं होता। भौतिक पदार्थोंमें उसकी आसक्ति नष्ट हो जाती है। कोई भी भौतिक पदार्थ सामने आनेपर उसके मन और इन्द्रियोंका उसकी ओर आकर्षण नहीं होता। उसके शरीरका वर्ण उज्ज्वल हो जाता है। स्वर अत्यन्त मधुर और स्पष्ट हो जाता है। शरीरमेंसे बहुत अच्छी गन्ध निकलकर सब ओर फैल जाती है। मल और मूत्र बहुत ही स्वल्प मात्रामें होने लगते हैं। ये सब योगमार्गकी प्रारम्भिक सिद्धियाँ हैं—ऐसा योगीलोग कहते हैं ॥ १३ ॥
यथैव | विम्बं | मृदयोपलिप्तं | ---|---|---|--- | तेजोमयं | भ्राजते | तत् सुधान्तम्। तद्वाऽऽत्मतत्त्वं | प्रसमीक्ष्य | देही | | एकः | कृतार्थो भवते | वीतशोकः ॥ १४ ॥
यथा=जिस प्रकार; मृदया=मिट्टीसे; उपलिप्तम्=लिस होकर मलिन हुआ;
अध्याय २ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४५७
[ यत् ]=जो; तेजोमयम्=प्रकाशयुक्त; विम्बम्=रत्न है; तत् एव=वही; सुधान्तम्=भलीभाँति धूल जानेपर; भाजते=चमकने लगता है; तत् वा=उसी प्रकार; देही=शरीरधारी (जीवात्मा); आत्मतत्त्वम्=(मल आदिसे रहित) आत्मतत्त्वको; प्रसमीक्ष्य=(योगके द्वारा) भलीभाँति प्रत्यक्ष करके; एकः=अकेला कैवल्य अवस्थाको प्राप्त; वीतशोकः=सब प्रकारके दुःखोंसे रहित; (तथा) कृतार्थः=कृतकृत्य; भवते=हो जाता है ॥ १४ ॥
व्याख्या —जिस प्रकार कोई तेजोमय रत्न मिट्टीसे लिस रहनेके कारण छिपा रहता है, अपने असली रूपमें प्रकट नहीं होता, परंतु वही जब मिट्टी आदिको हटाकर धो-पोंछकर साफ कर लिया जाता है, तब अपने असली रूपमें चमकने लगता है, उसी प्रकार इस जीवात्माका वास्तविक स्वरूप अत्यन्त स्वच्छ होनेपर भी अनन्त जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके संस्कारोंसे मलिन हो जानेके कारण प्रत्यक्ष प्रकट नहीं होता; परंतु जब मनुष्य ध्यानयोगके साधनद्वारा समस्त मलोंको धोकर आत्माके यथार्थ स्वरूपको भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह असङ्ग हो जाता है। अर्थात् उसका जो जड़ पदार्थोंके साथ संयोग हो रहा था, उसका नाश होकर वह कैवल्य अवस्थाको प्राप्त हो जाता है तथा उसके सब प्रकारके दुःखोंका अन्त होकर वह सर्वथा कृतकृत्य हो जाता है। उसका मनुष्य-जन्म सार्थक हो जाता है (योग० ४। ३४) ॥ १४ ॥
यदाऽऽत्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत्। अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १५ ॥
तु=उसके बाद; यदा=जब; युक्तः=वह योगी; इह=यहाँ; दीपोपमेन=दीपकके सदृश (प्रकाशमय); आत्मतत्त्वेन=आत्मतत्त्वके द्वारा; ब्रह्मतत्त्वम्=ब्रह्मतत्त्वको; प्रपश्येत्=भलीभाँति प्रत्यक्ष देख लेता है; [ तदा सः ]=उस समय वह; अजम्=(उस) अजन्मा; ध्रुवम्=निश्चल; सर्वतत्त्वैः=समस्त तत्त्वोंसे; विशुद्धम्=विशुद्ध; देवम्=परमदेव परमात्माको; ज्ञात्वा=जानकर; सर्वपाशैः=सब बन्धनोंसे; मुच्यते=सदाके लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥
४५८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
व्याख्या —फिर जब वह योगी इसी स्थितिमें दीपकके सद्गुरु निर्मल प्रकाशमय पूर्वोक्त आत्मतत्त्वके द्वारा ब्रह्मतत्त्वको भलीभाँति देख लेता है—अर्थात् उन परब्रह्म परमात्माको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब उन जन्मादि समस्त विकारोंसे रहित, अचल और निश्चित तथा समस्त तत्त्वोंसे असङ्ग— सर्वथा विशुद्ध परमदेव परमात्माको तत्त्वसे जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे सदाके लिये छूट जाता है।
इस मन्त्रमें आत्मतत्त्वसे ब्रह्मतत्त्वको जाननेकी बात कहकर यह भाव दिखाया गया है कि परमात्माका साक्षात्कार मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा नहीं हो सकता। इन सबकी वहाँ पहुँच नहीं है, वे एकमात्र आत्मतत्त्वके द्वारा ही प्रत्यक्ष होते हैं ॥ १५ ॥
एष ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः
पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः।
स एव जातः स जनिष्यमाणः
प्रत्यङ् जनान्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥ १६ ॥*
ह=निश्चय ही; एष =यह (ऊपर बताया हुआ); देव =परमदेव परमात्मा; सर्वाः =समस्त; प्रदिशः अनु=दिशाओं और अवान्तर दिशाओंमें अनुगत (व्याप्त) है; [ सः ] ह=वही प्रसिद्ध परमात्मा; पूर्वः =सबसे पहले; जातः =हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुआ था; (और) सः उ=वही; गर्भे =समस्त ब्रह्माण्डरूप गर्भमें; अन्तः =अन्तर््यामीरूपसे स्थित है; सः एव=वही; जातः =इस समय जगत्के रूपमें प्रकट है; सः =और वही; जनिष्यमाणः =भविष्यमें भी प्रकट होनेवाला है; [ सः ]=वह; जनान् प्रत्यङ् =सब जीवोंके भीतर; (अन्तर््यामीरूपसे) तिष्ठति=स्थित है; (और) सर्वतोमुखः =सब ओर मुखवाला है ॥ १६ ॥
व्याख्या —निश्चय ही ये ऊपर बताये हुए परमदेव ब्रह्म समस्त दिशा और अवान्तर दिशाओंमें व्याप्त हैं अर्थात् सर्वत्र परिपूर्ण हैं। जगत्में कोई भी ऐसा
- यह मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ३२ का चौथा है।
अध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४५९
स्थान नहीं है, जहाँ वे न हों। वे ही प्रसिद्ध परब्रह्म परमात्मा सबसे पहले हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुए थे। वे ही इस ब्रह्माण्डरूप गर्भमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। वे ही इस समय जगत्के रूपमें प्रकट हैं और भविष्यमें अर्थात् प्रलयके बाद सृष्टिकालमें पुनः प्रकट होनेवाले हैं। ये समस्त जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं तथा सब ओर मुखवाले अर्थात् सबको सब ओरसे देखनेवाले हैं ॥ १६ ॥
यो देवो अग्नी यो अप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश ।
य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः ॥ १७ ॥
यः=जो; देवः=परमदेव परमात्मा; अग्नी=अग्निमें है; यः=जो; अप्सु=जलमें है; यः=जो; विश्वम् भुवनम् आविवेश=समस्त लोकोंमें प्रविष्ट हो रहा है; यः=जो; ओषधीषु=ओषधियोंमें है; (तथा) यः=जो; वनस्पतिषु=वनस्पतियोंमें है; तस्मै देवाय=उन परमदेव परमात्माके लिये; नमः=नमस्कार है; नमः=नमस्कार है ॥ १७ ॥
व्याख्या —जो सर्वशक्तिमान् पूर्णब्रह्म परमदेव अग्निमें हैं, जो जलमें हैं, जो समस्त लोकोंमें अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हो रहे हैं, जो ओषधियोंमें हैं और जो वनस्पतियोंमें हैं—अर्थात् जो सर्वत्र परिपूर्ण हैं जिनका अनेक प्रकारसे पहले वर्णन कर आये हैं, उन परमदेव परमात्माको नमस्कार है। नमस्कार है। ‘नमः’ शब्दको दुहरानेका अभिप्राय अध्यायकी समाप्तिको सूचित करना है ॥ १७ ॥
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय अध्याय
य एको जालवानीशत ईशनीभिः
सर्वाः लोकानीशत ईशनीभिः ।
य एवैक उद्भव सम्भवे च
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १ ॥
४६०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
यः=जो; एकः=एक; जालवान्=जगरूप जालका अधिपति; ईशनीभिः=अपनी स्वरूपभूत शासनशक्तियोंद्वारा; ईशते=शासन करता है; ईशनीभिः=उन विविध शासन-शक्तियोंद्वारा; सर्वान्=सम्पूर्ण; लोकान् ईशते=लोकोंपर शासन करता है; यः=(तथा) जो; एकः=अकेला; एव=ही; सम्भवे च उद्भवे=सृष्टि और उसके विस्तारमें (सर्वथा समर्थ है); एतत्=इस ब्रह्मको; ये=जो महापुरुष; विद्=जान लेते हैं; ते=वे; अमृताः=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं ॥ १ ॥
व्याख्या —जो एक—अद्वितीय परमात्मा जगत्-रूप जालकी रचना करके अपनी स्वरूपभूत शासन-शक्तियोंद्वारा उसपर शासन कर रहे हैं तथा उन विविध शासन-शक्तियोंद्वारा समस्त लोकों और लोकपालोंका यथायोग्य संचालन कर रहे हैं—जिनके शासनमें ये सब अपने-अपने कर्तव्योंका नियमपूर्वक पालन कर रहे हैं तथा जो अकेले ही बिना किसी दूसरेकी सहायता लिये समस्त जगत्की उत्पत्ति और उसका विस्तार करनेमें सर्वथा समर्थ हैं, उन परब्रह्म परमेश्वरको जो महापुरुष तत्त्वसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं—जन्म-मृत्युके जालसे सदाके लिये छूट जाते हैं ॥ १ ॥
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु-
यं इमाल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
प्रत्यङ् जनान्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले
संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥ २ ॥
यः=जो; ईशनीभिः=अपनी स्वरूपभूत विविध शासन-शक्तियोंद्वारा; इमान्=इन सब; लोकान् ईशते=लोकोंपर शासन करता है; [ सः ] रुद्रः=वह रुद्र; एकः=हि=एक ही है; (इसीलिये विद्वान् पुरुषोंने जगत्के कारणका निश्चय करते समय) द्वितीयाय न तस्थुः=दूसरेका आश्रय नहीं लिया; [ सः ]=वह परमात्मा; जनान् प्रत्यङ्=समस्त जीवोंके भीतर; तिष्ठति=स्थित हो रहा है; विश्वा=सम्पूर्ण; भुवनानि संसृज्य=लोकोंकी रचना करके; गोपाः=उनकी रक्षा करनेवाला परमेश्वर; अन्तकाले=प्रलयकालमें; संचुकोच=इन सबको समेट लेता है ॥ २ ॥
व्याख्या —जो अपनी स्वरूपभूत विविध शासन-शक्तियोंद्वारा इन सब
अध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४६१
लोकोंपर शासन करते हैं—उनका नियमानुसार संचालन करते हैं, वे रूद्ररूप परमेश्वर एक ही हैं। अर्थात् इस विश्वका नियमन करनेवाली शक्तियाँ अनेक होनेपर भी वे सब एक ही परमेश्वरकी हैं और उनसे अभिन्न हैं। इसी कारण, ज्ञानीजनोंने जगत्के कारणका निश्चय करते समय किसी भी दूसरे तत्त्वका आश्रय नहीं लिया। सबने एक स्वरसे यही निश्चय किया कि एक परब्रह्म ही इस जगत्के कारण हैं। वे परमात्मा सब जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। इन समस्त लोकोंकी रचना करके उनकी रक्षा करनेवाले परमेश्वर प्रलयकालमें स्वयं ही इन सबको समेट लेते हैं, अर्थात् अपनेमें विलीन कर लेते हैं। उस समय इनकी भिन्न-भिन्न रूपोंमें अभिव्यक्ति नहीं रहती ॥ २ ॥
विश्वतश्चक्षुरुत
विश्वतोमुखो
विश्वतोबाहुरुत
विश्वतस्यात् ।
सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रै-
र्घावाभूमी जनयन् देव एकः ॥ ३ ॥ *
विश्वतश्चक्षुः=सब जगह आँखवाला; उत=तथा; विश्वतोमुखः=सब जगह मुखवाला; विश्वतोबाहुः=सब जगह हाथवाला; उत=और; विश्वतस्यात्=सब जगह पैरवाला; घावाभूमी जनयन्=आकाश और पृथ्वीकी सृष्टि करनेवाला; [ सः ]=वह; एकः=एकमात्र; देवः=देव (परमात्मा); बाहुभ्याम्=मनुष्य आदि जीवोंको दो-दो हाथोंसे; संधमति=युक्त करता है (तथा); पतत्रैः=(पक्षी-पतंग आदिको) पाँखोंसे; सं [ धमति ]=युक्त करता है ॥ ३ ॥
व्याख्या—वे परमेश्वर एक हैं; फिर भी उनकी सब जगह आँखें हैं, सब जगह मुख हैं, सब जगह हाथ हैं और सब जगह पैर हैं। भाव यह कि वे सम्पूर्ण लोकोंमें स्थित समस्त जीवोंके कर्म और विचारोंको तथा समस्त घटनाओंको अपनी दिव्य शक्तिद्वारा निरन्तर देखते रहते हैं, कोई भी बात उनसे छिपी नहीं रहती। उनका भक्त उनको जहाँ कहीं भोजनके योग्य वस्तु समर्पित करता है,
- यजुर्वेद अध्याय १७का उत्तरीसवों और (अथर्व० १३।२६) मन्त्र इसी प्रकार है तथा ऋ० १०।८१।३ भी इसी प्रकार है।
४६२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
उसे वे वहीँ भोग लगा सकते हैं। वे सब जगह प्रत्येक वस्तुको एक साथ ग्रहण करनेमें और अपने आश्रित जनोंके संकटका नाश करके उनकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं तथा जहाँ कहीं उनके भक्त उन्हें बुलाना चाहें, वहाँ वे एक साथ पहुँच सकते हैं। संसारमें ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ उनकी ये शक्तियाँ विद्यमान न हों। आकाशसे लेकर पृथ्वीतक समस्त लोकोंकी रचना करनेवाले एक ही परमदेव परमेश्वर मनुष्य आदि प्राणियोंको दो-दो भुजाओंसे और पक्षियोंको पाँखोंसे युक्त करते हैं। भाव यह कि वे समस्त प्राणियोंको आवश्यकतानुसार भिन्न-भिन्न शक्तियों एवं साधनोंसे सम्पन्न करते हैं। यहाँ भुजा और पाँखोंका कथन उपलक्षणमात्र है। इससे यह समझ लेना चाहिये कि समस्त प्राणियोंमें जो कुछ भी शक्ति है, वह सब परमात्माकी ही दी हुई है॥ ३ ॥
यो देवानां प्रभवश्चोद्धवश्च विश्वधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्व स नो बुद्ध्या शुभया संयुक्तु ॥ ४ ॥
यः=जो; रुद्रः=रुद्र; देवानाम्=इन्द्रादि देवताओंकी; प्रभवः=उत्पत्तिका हेतु; च=और; उद्धवः=वृद्धिका हेतु है; च=तथा; (जो) विश्वधिपः=सबका अधिपति; (और) महर्षिः=महान् ज्ञानी (सर्वज्ञ) है; पूर्वम्=(जिसने) पहले; हिरण्यगर्भम्=हिरण्यगर्भको; जनयामास=उत्पन्न किया था; सः=वह परमदेव परमेश्वर; नः=हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या=शुभ बुद्धिसे; संयुक्तु=संयुक्त करें ॥ ४ ॥
व्याख्या—सबको अपने शासनमें रखनेवाले जो रुद्ररूप परमेश्वर इन्द्रादि समस्त देवताओंको उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं तथा जो सबके अधिपति और महान् ज्ञानी—सर्वज्ञ हैं, जिन्होंने सृष्टिके आदिमें हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया था, वे परमदेव परमात्मा हमलोगोंको शुभ बुद्धिसे संयुक्त करें ॥ ४ ॥
या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी । तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥ ५ ॥ *
- यह यजुर्वेद अध्याय १६का दूसरा मन्त्र है।
अध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४६३
रुद्र=हे रुद्रदेव!; ते=तेरी; या=जो; अघोरा=भयानकतासे शून्य (सौम्य); अपापकाशिनी=पुण्यसे प्रकाशित होनेवाली; (तथा) शिवा=कल्याणमयी; तनू=: मूर्ति है; गिरिशन्त=हे पर्वतपर रहकर सुखका विस्तार करनेवाले शिव!; तया=उस; शन्तमया तनुवा=परम शान्त मूर्तिसे; (तू कृपा करके) न: अभिचाकशीहि=हमलोगोंको देख ॥ ५ ॥
व्याख्या—हे रुद्रदेव! आपकी जो भयानकतासे शून्य तथा पुण्यकर्मोंसे प्रकाशित होनेवाली कल्याणमयी सौम्यमूर्ति है—जिसका दर्शन करके मनुष्य परम आनन्दमें मग्न हो जाता है—हे गिरिशन्त! अर्थात् पर्वतपर निवास करते हुए समस्त लोकोंको सुख पहुँचानेवाले परमेश्वर! उस परम शान्त मूर्तिसे ही कृपा करके आप हमलोगोंकी ओर देखिये। आपकी कृपादृष्टि पड़ते ही हम सर्वथा पवित्र होकर आपकी प्राप्तिसे योग्य बन जायेंगे ॥ ५ ॥
यामिणुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ध्यस्तवे।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसीः पुरुषं जगत् ॥ ६ ॥*
गिरिशन्त=हे गिरिशन्त!; याम्=जिस; इषुम्=बाणको; अस्तवे=फेंकनेके लिये; (तू) हस्ते=हाथमें; विभर्षि=धारण किये हुए है; गिरित्र=हे गिरिराज हिमालयकी रक्षा करनेवाले देव!; ताम्=उस बाणको; शिवाम्=कल्याणमय; कुरु=बना ले; पुरुषम्=जीवसमुदायरूप; जगत्=जगत्को; मा हिंसीः=नष्ट न कर (कष्ट न दे) ॥ ६ ॥
व्याख्या—हे गिरिशन्त—हे कैलासवासी सुखदायक परमेश्वर! जिस बाणको फेंकनेके लिये आपने हाथमें ले रखा है, हे गिरिराज हिमालयकी रक्षा करनेवाले! आप उस बाणको कल्याणमय बना लें—उसकी क्रूरताको नष्ट करके उसे शान्तिमय बना लें। इस जीवसमुदायरूप जगत्का विनाश न करें—इसको कष्ट न दें ॥ ६ ॥
- यह यजुर्वेद अध्याय १६का तीसरा मन्त्र है।
४६४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्नं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितार- मीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥
ततः=पूर्वोक्त जीव-समुदायरूप जगत्के; परम्=परे; (और) ब्रह्मपरम्=हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ; सर्वभूतेषु=समस्त प्राणियोंमें; यथानिकायम्=उनके शरीरोंके अनुरूप होकर; गूढम्=छिपे हुए; (और) विश्वस्य परिवेष्टितारम्=सम्पूर्ण विश्वको सब ओरसे घेरे हुए; तम्=उस; बृहन्नम्=महान्, सर्वत्र व्यापक; एकम्=एकमात्र देव; ईशम्=परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; अमृताः भवन्ति=(ज्ञानीजन) अमर हो जाते हैं ॥ ७ ॥
व्याख्या —जो पहले कहे हुए जीव-समुदायरूप जगत्से और हिरण्यगर्भ नामक ब्रह्मासे भी सर्वथा श्रेष्ठ हैं, समस्त प्राणियोंमें उनके शरीरोंके अनुरूप होकर छिपे हुए हैं; समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे हुए हैं तथा सर्वत्र व्याप्त और महान् हैं, उन एकमात्र परमेश्वरको जानकर ज्ञानीजन सदाके लिये अमर हो जाते हैं; फिर कभी उनका जन्म-मरण नहीं होता ॥ ७ ॥
सम्बन्ध —अब इस मन्त्रमें ज्ञानी महापुरुषके अनुभवकी बात कहकर परमात्मज्ञानके फलकी दृढ़ता दिखलाते हैं—
वेदाहमेतं पुरुषं महान्त- मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ ८ ॥ *
तमसः परस्तात्=अविद्यारूप अन्धकारसे अतीत; (तथा) आदित्यवर्णम्=सूर्यकी भाँति स्वयंप्रकाशस्वरूप; एतम्=इस; महान्तम् पुरुषम्=महान् पुरुष (परमेश्वर) को; अहम् वेद=मैं जानता हूँ; तम्=उसको; विदित्वा=जानकर;
- यह यजुर्वेद अध्याय ३१का अठारहवाँ मन्त्र है।
अध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४६५
एव=ही; (मनुष्य) मृत्युम्=मृत्युको; अत्येति ( अति+एति )=उल्लङ्घन कर जाता है; अयनाय=(परमपदकी) प्राप्तिके लिये; अन्यः=दूसरा; पन्थाः=मार्ग; न=नहीं; विद्यते=है ॥ ८ ॥
व्याख्या —कोई ज्ञानी महापुरुष कहता है—इन महानुसे भी महान् परम पुरुषोत्तमको मैं जानता हूँ। वे अविद्यारूप अन्धकारसे सर्वथा अतीत हैं तथा सूर्यकी भाँति स्वयंप्रकाशस्वरूप हैं। उनको जानकर ही मनुष्य मृत्युका उल्लङ्घन करनेमें—इस जन्म-मृत्युके बन्धनसे सदाके लिये छुटकारा पानेमें समर्थ होता है। परमपदकी प्राप्तिके लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग अर्थात् उपाय नहीं है ॥ ८ ॥
यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चिद् यस्मात्राणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक- स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥ ९ ॥
यस्मात् परम्=जिससे श्रेष्ठ; अपरम्=दूसरा; किञ्चित्=कुछ भी; न=नहीं; अस्ति=है; यस्मात्=जिससे (बढ़कर); कश्चित्=कोई भी; न=न तो; अणीयः=अधिक सूक्ष्म; न=और न; ज्यायः=महान् ही; अस्ति=है; एकः=(जो) अकेला ही; वृक्षः इव=वृक्षकी भाँति; स्तब्धः=निश्चलभावसे; दिवि=प्रकाशमय आकाशमें; तिष्ठति=स्थित है; तेन पुरुषेण=उस परमपुरुष पुरुषोत्तमसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण जगत्; पूर्णम्=परिपूर्ण है ॥ ९ ॥
व्याख्या —उन परमदेव परमेश्वरसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है, वे सर्वश्रेष्ठ हैं। जितने भी सूक्ष्म तत्त्व हैं, उन सबसे अधिक सूक्ष्म वे ही हैं। उनसे अधिक सूक्ष्म कोई भी नहीं है। इसीसे वे छोटे-से-छोटे जीवके शरीरमें प्रविष्ट होकर स्थित हैं। इसी प्रकार जितने भी महान् व्यापक तत्त्व हैं, उन सबसे महान्—अधिक व्यापक वे परब्रह्म हैं; उनसे बड़ा—उनसे अधिक व्यापक कोई भी नहीं है। इसीसे वे प्रलयकालमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपने अंदर लीन कर लेते हैं। जो अकेले ही वृक्षकी भाँति निश्चलभावसे परम-धामरूप प्रकाशमय दिव्य