ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
व्याख्या —सबको उत्पन्न करनेवाले परमात्मा पहले हमारे मन और बुद्धि की वृत्तियोंको तत्वकी प्राप्तिके लिये अपने दिव्य स्वरूपमें लगायें और अग्नि आदि इन्द्रियाभिमानी देवताओंकी जो विषयोंको प्रकाशित करनेकी सामर्थ्य है, उसे दृष्टिमें रखते हुए बाह्य विषयोंसे लौटाकर हमारी इन्द्रियोंमें स्थिरतापूर्वक स्थापित कर दें, जिससे हमारी इन्द्रियोंका प्रकाश बाहर न जाकर बुद्धि और मनकी स्थिरतामें सहायक हो ॥ १ ॥
युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे। सुवर्गेयाय शक्त्या ॥ २ ॥*
वयम् =हमलोग; सवितुः =सबको उत्पन्न करनेवाले; देवस्य =परमदेव परमेश्वरकी; सवे =आराधनारूप यज्ञमें; युक्तेन मनसा =लगे हुए मनके द्वारा; सुवर्गेयाय =स्वर्गीय सुख (भगवत्-प्राप्ति-जनित आनन्द)की प्राप्तिके लिये; शक्त्या =पूरी शक्तिसे; [ प्रयतामहै ]=प्रयत्न करें ॥ २ ॥
व्याख्या —हमलोग सबको उत्पन्न करनेवाले, परमदेव परमेश्वरकी आराधनारूप यज्ञमें लगे हुए मनके द्वारा परमानन्दप्राप्तिके लिये पूर्णशक्तिसे प्रयत्न करें। अर्थात् हमारा मन निरन्तर भगवान्की आराधनामें लगा रहे और हम भगवत्-प्राप्ति-जनित परमानन्दकी अनुभूतिके लिये पूर्ण शक्तिसे प्रयत्नशील रहें ॥ २ ॥
युक्त्वाय मनसा देवान् सुवर्त्यतो धिया दिवम्।
बृहन्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान् ॥ ३ ॥†
सविता =सबको उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर; सुवः =स्वर्गादि लोकोंमें; (और) दिवम् =आकाशमें; यतः =गमन करनेवाले; (तथा) बृहत् =बड़ा भारी; ज्योतिः =प्रकाश; करिष्यतः =फैलानेवाले; तान् =उन; (मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) देवान् =देवताओंको; मनसा =हमारे मन; (और) धिया =बुद्धिसे; युक्त्वाय =संयुक्त करके; (प्रकाश दान करनेके लिये) प्रसुवाति =प्रेरणा करता है अर्थात् करे ॥ ३ ॥
व्याख्या —वे सबको उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवताओंको, जो स्वर्ग आदि लोकोंमें और आकाशमें विचरनेवाले तथा
- † ये दोनों मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ११ के २ और ३ हैं।