ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 449, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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सर्वत्र परिपूर्ण; आत्मविद्यातपोमूलम्=आत्मविद्या तथा तपसे प्राप्त होनेवाले; आत्मानम्=परमात्माको (वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है); तत्=वह; उपनिषत्=उपनिषदोंमें बताया हुआ; परम्=परमतत्त्व; ब्रह्म=ब्रह्म है; तत्=वह; उपनिषत्=उपनिषदोंमें बताया हुआ; परम्=परमतत्त्व; ब्रह्म=ब्रह्म है ॥ १६ ॥
व्याख्या —आत्मविद्या और तप जिनकी प्राप्ति के मूलभूत साधन हैं तथा जो दूधमें स्थित घीकी भाँति सर्वत्र परिपूर्ण हैं, उन सर्वोत्तरीयों परमात्माको वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है। वे ही उपनिषदोंमें वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म हैं। वे ही उपनिषदोंमें वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म हैं। अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ १६ ॥
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय अध्याय
सम्बन्ध —पहले अध्यायमें परमदेव परमात्माके साक्षात्कारका प्रधान उपाय ध्यानको बताया गया। उस ध्यानकी प्रक्रिया बतानेके लिये दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले ध्यानकी सिद्धिके लिये पाँच मन्त्रोंमें परमेश्वरसे प्रार्थना करनेका प्रकार बताया जाता है—
युज्ञानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः।
अग्रेज्यौतिर्निचाव्य पृथिव्या अध्याभरत ॥ १ ॥*
सविता=सबको उत्पन्न करनेवाला परमात्मा; प्रथमम्=पहले; मनः=हमारे मन; (और) धियः=बुद्धियोंको; तत्त्वाय=तत्त्वकी प्राप्तिके लिये; युज्ञानः=अपने स्वरूपमें लगते हुए; अग्रे=अग्रि (आदि इन्द्रियाभिानी देवताओं)की; ज्योतिः=ज्योति (प्रकाशन-सामर्थ्य) को; निचाव्य=अवलोकन करके; पृथिव्याः=पार्थिव पदार्थोंसे; अधि=ऊपर उठाकर; आभरत=हमारी इन्द्रियोंमें स्थापित करे ॥ १ ॥
- यजुर्वेद अध्याय ११ मन्त्र १ इसी प्रकार है।