ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 451, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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बड़ा भारी प्रकाश फैलानेवाले हैं, हमारे मन और बुद्धिसे संयुक्त करके हमें प्रकाश प्रदान करनेके लिये प्रेरणा करें; ताकि हम उन परमेश्वरका साक्षात् करनेके लिये ध्यान करनेमें समर्थ हों। हमारे मन, बुद्धि और इन्द्रियोंमें प्रकाश फैला रहे। निद्रा, आलस्य और अकर्मण्यता आदि दोष हमारे ध्यानमें विघ्न न कर सकें ॥ ३ ॥
युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपक्षितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्णुतिः ॥ ४ ॥*
(जिसमें) विप्राः=ब्राह्मण आदि; मनः=मनको; युञ्जते=लगाते हैं; उत=और; धियः=बुद्धिकी वृत्तियोंको भी; युञ्जते=लगाते हैं; (जिसने समस्त) होत्राः वि दधे=अग्निहोत्र आदि शुभ कर्मोंका विधान किया है; (तथा जो) वयुनावित्=समस्त जगत्के विचारोंको जाननेवाला; (और) एकः=एक है; (उस) बृहतः=सबसे महान्; विप्रस्य=सर्वत्र व्यापक; विपक्षितः=सर्वज्ञ; (एवं) सवितुः=सबके उत्पादक; देवस्य=परमदेव परमेश्वरकी; इत्=निश्चय ही; (हमें) मही=महती; परिष्णुतिः=स्तुति (करनी चाहिये) ॥ ४ ॥
व्याख्या —जिन परब्रह्म परमात्मामें श्रेष्ठ बुद्धिवाले ब्राह्मणादि अधिकारी मनुष्य अपने मनको लगाते हैं तथा अपनी सब प्रकारकी बुद्धि-वृत्तियोंको भी नियुक्त करते हैं, जिन्होंने अग्निहोत्र आदि समस्त शुभ कर्मोंका विधान किया है, जो समस्त जगत्के विचारोंको जाननेवाले और एक—अद्वितीय हैं, उन सबसे महान्, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सबके उत्पादक परमदेव परमेश्वरकी अवश्य ही हमें भूरि-भूरि स्तुति करनी चाहिये ॥ ४ ॥
युजे वां ब्रह्म पूर्वं नमोभि- र्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरैः ।
- यह यजुर्वेद अध्याय ११का चौथा और अध्याय ५ का १४ वां मन्त्र है तथा ऋग्वेद (५।८१।१) में भी है।