ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 461, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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स्थान नहीं है, जहाँ वे न हों। वे ही प्रसिद्ध परब्रह्म परमात्मा सबसे पहले हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुए थे। वे ही इस ब्रह्माण्डरूप गर्भमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। वे ही इस समय जगत्के रूपमें प्रकट हैं और भविष्यमें अर्थात् प्रलयके बाद सृष्टिकालमें पुनः प्रकट होनेवाले हैं। ये समस्त जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं तथा सब ओर मुखवाले अर्थात् सबको सब ओरसे देखनेवाले हैं ॥ १६ ॥
यो देवो अग्नी यो अप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश ।
य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः ॥ १७ ॥
यः=जो; देवः=परमदेव परमात्मा; अग्नी=अग्निमें है; यः=जो; अप्सु=जलमें है; यः=जो; विश्वम् भुवनम् आविवेश=समस्त लोकोंमें प्रविष्ट हो रहा है; यः=जो; ओषधीषु=ओषधियोंमें है; (तथा) यः=जो; वनस्पतिषु=वनस्पतियोंमें है; तस्मै देवाय=उन परमदेव परमात्माके लिये; नमः=नमस्कार है; नमः=नमस्कार है ॥ १७ ॥
व्याख्या —जो सर्वशक्तिमान् पूर्णब्रह्म परमदेव अग्निमें हैं, जो जलमें हैं, जो समस्त लोकोंमें अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हो रहे हैं, जो ओषधियोंमें हैं और जो वनस्पतियोंमें हैं—अर्थात् जो सर्वत्र परिपूर्ण हैं जिनका अनेक प्रकारसे पहले वर्णन कर आये हैं, उन परमदेव परमात्माको नमस्कार है। नमस्कार है। ‘नमः’ शब्दको दुहरानेका अभिप्राय अध्यायकी समाप्तिको सूचित करना है ॥ १७ ॥
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय अध्याय
य एको जालवानीशत ईशनीभिः
सर्वाः लोकानीशत ईशनीभिः ।
य एवैक उद्भव सम्भवे च
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १ ॥