ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 460, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
व्याख्या —फिर जब वह योगी इसी स्थितिमें दीपकके सद्गुरु निर्मल प्रकाशमय पूर्वोक्त आत्मतत्त्वके द्वारा ब्रह्मतत्त्वको भलीभाँति देख लेता है—अर्थात् उन परब्रह्म परमात्माको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब उन जन्मादि समस्त विकारोंसे रहित, अचल और निश्चित तथा समस्त तत्त्वोंसे असङ्ग— सर्वथा विशुद्ध परमदेव परमात्माको तत्त्वसे जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे सदाके लिये छूट जाता है।
इस मन्त्रमें आत्मतत्त्वसे ब्रह्मतत्त्वको जाननेकी बात कहकर यह भाव दिखाया गया है कि परमात्माका साक्षात्कार मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा नहीं हो सकता। इन सबकी वहाँ पहुँच नहीं है, वे एकमात्र आत्मतत्त्वके द्वारा ही प्रत्यक्ष होते हैं ॥ १५ ॥
एष ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः
पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः।
स एव जातः स जनिष्यमाणः
प्रत्यङ् जनान्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥ १६ ॥*
ह=निश्चय ही; एष =यह (ऊपर बताया हुआ); देव =परमदेव परमात्मा; सर्वाः =समस्त; प्रदिशः अनु=दिशाओं और अवान्तर दिशाओंमें अनुगत (व्याप्त) है; [ सः ] ह=वही प्रसिद्ध परमात्मा; पूर्वः =सबसे पहले; जातः =हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुआ था; (और) सः उ=वही; गर्भे =समस्त ब्रह्माण्डरूप गर्भमें; अन्तः =अन्तर््यामीरूपसे स्थित है; सः एव=वही; जातः =इस समय जगत्के रूपमें प्रकट है; सः =और वही; जनिष्यमाणः =भविष्यमें भी प्रकट होनेवाला है; [ सः ]=वह; जनान् प्रत्यङ् =सब जीवोंके भीतर; (अन्तर््यामीरूपसे) तिष्ठति=स्थित है; (और) सर्वतोमुखः =सब ओर मुखवाला है ॥ १६ ॥
व्याख्या —निश्चय ही ये ऊपर बताये हुए परमदेव ब्रह्म समस्त दिशा और अवान्तर दिशाओंमें व्याप्त हैं अर्थात् सर्वत्र परिपूर्ण हैं। जगत्में कोई भी ऐसा
- यह मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ३२ का चौथा है।