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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 548 में से

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पृष्ठ 459

अध्याय २ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४५७

[ यत् ]=जो; तेजोमयम्=प्रकाशयुक्त; विम्बम्=रत्न है; तत् एव=वही; सुधान्तम्=भलीभाँति धूल जानेपर; भाजते=चमकने लगता है; तत् वा=उसी प्रकार; देही=शरीरधारी (जीवात्मा); आत्मतत्त्वम्=(मल आदिसे रहित) आत्मतत्त्वको; प्रसमीक्ष्य=(योगके द्वारा) भलीभाँति प्रत्यक्ष करके; एकः=अकेला कैवल्य अवस्थाको प्राप्त; वीतशोकः=सब प्रकारके दुःखोंसे रहित; (तथा) कृतार्थः=कृतकृत्य; भवते=हो जाता है ॥ १४ ॥

व्याख्या —जिस प्रकार कोई तेजोमय रत्न मिट्टीसे लिस रहनेके कारण छिपा रहता है, अपने असली रूपमें प्रकट नहीं होता, परंतु वही जब मिट्टी आदिको हटाकर धो-पोंछकर साफ कर लिया जाता है, तब अपने असली रूपमें चमकने लगता है, उसी प्रकार इस जीवात्माका वास्तविक स्वरूप अत्यन्त स्वच्छ होनेपर भी अनन्त जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके संस्कारोंसे मलिन हो जानेके कारण प्रत्यक्ष प्रकट नहीं होता; परंतु जब मनुष्य ध्यानयोगके साधनद्वारा समस्त मलोंको धोकर आत्माके यथार्थ स्वरूपको भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह असङ्ग हो जाता है। अर्थात् उसका जो जड़ पदार्थोंके साथ संयोग हो रहा था, उसका नाश होकर वह कैवल्य अवस्थाको प्राप्त हो जाता है तथा उसके सब प्रकारके दुःखोंका अन्त होकर वह सर्वथा कृतकृत्य हो जाता है। उसका मनुष्य-जन्म सार्थक हो जाता है (योग० ४। ३४) ॥ १४ ॥

यदाऽऽत्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत्। अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १५ ॥

तु=उसके बाद; यदा=जब; युक्तः=वह योगी; इह=यहाँ; दीपोपमेन=दीपकके सदृश (प्रकाशमय); आत्मतत्त्वेन=आत्मतत्त्वके द्वारा; ब्रह्मतत्त्वम्=ब्रह्मतत्त्वको; प्रपश्येत्=भलीभाँति प्रत्यक्ष देख लेता है; [ तदा सः ]=उस समय वह; अजम्=(उस) अजन्मा; ध्रुवम्=निश्चल; सर्वतत्त्वैः=समस्त तत्त्वोंसे; विशुद्धम्=विशुद्ध; देवम्=परमदेव परमात्माको; ज्ञात्वा=जानकर; सर्वपाशैः=सब बन्धनोंसे; मुच्यते=सदाके लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥