ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 458, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
आता है और न उसकी मृत्यु ही होती है। अभिप्राय यह कि उसकी इच्छाके बिना उसका शरीर नष्ट नहीं हो सकता (योगद० ३। ४६, ४७) ॥ १२ ॥
लघुत्वमारोग्यमलोलुप्तत्वं
| वर्णप्रसादं | स्वरसौष्ठवं | च। ---|---|---|--- गन्धः | शुभो | मूत्रपुरीषमल्पं | | योगप्रवृत्तिं | प्रथमां | वदन्ति ॥ १३ ॥
लघुत्वम्=शरीरका हल्कापन; आरोग्यम्=किसी प्रकारके रोगका न होना; अलोलुप्तत्वम्=विषयासक्तिकी निवृत्ति; वर्णप्रसादम्=शारीरिक वर्णकी उज्ज्वलता; स्वरसौष्ठवम्=स्वरकी मधुरता; शुभः गन्धः=(शरीरमें) अच्छी गन्ध; च=और; मूत्रपुरीषम्=मल-मूत्र; अल्पम्=कम हो जाना; (इन सबको) प्रथमाम् योगप्रवृत्तिम्=योगकी पहली सिद्धि; वदन्ति=कहते हैं ॥ १३ ॥
व्याख्या—भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेनेवाले ध्यानयोगीमें पूर्वोक्त शक्तियोंके सिवा और भी शक्तियाँ आ जाती हैं। उदाहरणतः उसका शरीर हल्का हो जाता है, शरीरमें भारीपन या आलस्यका भाव नहीं रहता। वह सदा ही नीरोग रहता है, उसे कभी कोई रोग नहीं होता। भौतिक पदार्थोंमें उसकी आसक्ति नष्ट हो जाती है। कोई भी भौतिक पदार्थ सामने आनेपर उसके मन और इन्द्रियोंका उसकी ओर आकर्षण नहीं होता। उसके शरीरका वर्ण उज्ज्वल हो जाता है। स्वर अत्यन्त मधुर और स्पष्ट हो जाता है। शरीरमेंसे बहुत अच्छी गन्ध निकलकर सब ओर फैल जाती है। मल और मूत्र बहुत ही स्वल्प मात्रामें होने लगते हैं। ये सब योगमार्गकी प्रारम्भिक सिद्धियाँ हैं—ऐसा योगीलोग कहते हैं ॥ १३ ॥
यथैव | विम्बं | मृदयोपलिप्तं | ---|---|---|--- | तेजोमयं | भ्राजते | तत् सुधान्तम्। तद्वाऽऽत्मतत्त्वं | प्रसमीक्ष्य | देही | | एकः | कृतार्थो भवते | वीतशोकः ॥ १४ ॥
यथा=जिस प्रकार; मृदया=मिट्टीसे; उपलिप्तम्=लिस होकर मलिन हुआ;