सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 457

अध्याय २ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४५५

व्याख्या —जब साधक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ध्यानयोगका साधन आरम्भ करता है, तब उसको अपने सामने कभी कुहरेके सदृश रूप दीखता है, कभी धूआँ-सा दिखायी देता है, कभी सूर्यके समान प्रकाश सर्वत्र परिपूर्ण दीखता है, कभी निश्चल वायुकी भाँति निराकार रूप अनुभवमें आता है, कभी अग्निके सदृश तेज दीख पड़ता है, कभी जुगनूके सदृश टिमटिमाहट-सी प्रतीत होती है, कभी बिजलीकी-सी चकाचौंध पैदा करनेवाली दीसि दृष्टिगोचर होती है, कभी स्फटिक-मणिके सदृश उज्ज्वल रूप देखनेमें आता है और कभी चन्द्रमाकी भाँति शीतल प्रकाश सर्वत्र फैला हुआ दिखायी देता है। ये सब तथा और भी अनेक दृश्य योग-साधनकी उन्नतिके द्योतक हैं। इनसे यह बात समझमें आती है कि साधकका ध्यान ठीक हो रहा है ॥ ११ ॥

पृथ्व्यसेजोऽनिलखे

समुत्थिते

पञ्चात्मके

योगगुणे

प्रवृत्ते ।

न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः

प्रासस्य

योगाग्रिमयं

शरीरम् ॥ १२ ॥

पृथ्व्यसेजोऽनिलखे समुत्थिते =पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँचों महाभूतोंका सम्यक् प्रकारसे उत्थान होनेपर; (तथा) पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते =इनसे सम्बन्ध रखनेवाले पाँच प्रकारके योगसम्बन्धी गुणोंकी सिद्धि हो जानेपर; योगाग्रिमयम् =योगाग्रिमय; शरीरम् =शरीरको; प्रासस्य =प्रास कर लेनेवाले; तस्य =उस साधकको; =न तो; रोगः =रोग होता है; =न; जरा =बुढ़ापा आता है; =और न; मृत्युः =उसकी मृत्यु ही होती है ॥ १२ ॥

व्याख्या —ध्यानयोगका साधन करते-करते जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच महाभूतोंका उत्थान हो जाता है, अर्थात् जब साधकका इन पाँचों महाभूतोंपर अधिकार हो जाता है और इन पाँचों महाभूतोंसे सम्बन्ध रखनेवाली योगविषयक पाँचों सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं, उस समय योगाग्रिमय शरीरको प्रास कर लेनेवाले उस योगीके शरीरमें न तो रोग होता है, न बुढ़ापा