ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 456, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
व्याख्या —इस मन्त्रमें ध्यानयोगके उपयुक्त स्थानका वर्णन है। भाव यह है कि ध्यानयोगका साधन करनेवाले साधकको ऐसे स्थानमें अपना आसन लगाना चाहिये, जहाँकी भूमि समतल हो—ऊँची-नीची, टेढ़ी-मेढ़ी न हो, जो सब प्रकारसे शुद्ध हो—जहाँपर कूड़ा-करकट, मैला आदि न हो, झाड़-बुहारकर साफ किया हुआ हो और स्वभावसे भी पवित्र हो—जैसे कोई देवालय, तीर्थस्थान आदि; जहाँ कंकड़, बालू न हो और अग्नि या धूपकी गर्मी भी न हो; जहाँ कोई मनमें विशेष करनेवाला शब्द न होता हो—कोलाहलका सर्वथा अभाव हो; यथावश्यक जल प्राप्त हो सके; किंतु ऐसा जलाशय न हो, जहाँ बहुत लोग आते-जाते हों एवं जहाँ शरीर-रक्षाके लिये उपयुक्त आश्रय हो, परंतु ऐसा न हो, जहाँ धर्मशाला आदिकी भाँति बहुत लोग ठहरते हों; तात्पर्य यह कि इन सब विचारोंके अनुसार जो सर्वथा अनुकूल हो और जहाँका दृश्य नेत्रोंको पीड़ा पहुँचानेवाला—भयानक न हो, ऐसे गुफा आदि वायुशून्य एकांत स्थानमें पहले बताये हुए प्रकारसे आसन लगाकर अपने मनको परमात्मामें लगानेका अभ्यास करना चाहिये (गीता ६।११) ॥१०॥
सम्बन्ध —योगाभ्यास करनेवाले साधकका साधन ठीक हो रहा है या नहीं, इसकी पहचान बतायी जाती है—
नीहारधूमाकर्निलानलानां
खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।
एतानि रूपाणि पुरःसराणि
ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥ ११ ॥
ब्रह्मणि योगे =परमात्माकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले योगमें; (पहले) नीहारधूमाकर्निलानलानाम् =कुहरा, धूआँ, सूर्य, वायु और अग्निके सद्गुण; (तथा) खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् =जुगनू, बिजली, स्फटिक-मणि और चन्द्रमाके सद्गुण; रूपाणि =बहुत-से दृश्य; पुरःसराणि [ भवन्ति ]=योगीके सामने प्रकट होते हैं; एतानि =ये सब; अभिव्यक्तिकराणि =योगकी सफलताको स्पष्टरूपसे सूचित करनेवाले हैं ॥ ११ ॥