भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अध्याय २ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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बाद) दुष्ट घोड़ोंसे युक्त; वाहम् इव =रथको जिस प्रकार सारथि सावधानतापूर्वक गन्तव्य मार्गमें ले जाता है, उसी प्रकार; एनम् =इस; मनः =मनको; अप्रमत्तः =सावधान होकर; धारयेत=वशमें किये रहे ॥१॥

व्याख्या —बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि वह इस योग-साधनाके लिये आहार-विहार आदि समस्त चेष्टाओंको यथायोग्य करता रहे, उन्हें ध्यानयोगके लिये उपयोगी बना ले (गीता ६।१७)। योगशास्त्रकी विधिके अनुसार प्राणायाम करते-करते जब प्राण अत्यन्त सूक्ष्म हो जाय, तब नासिकाद्वारा उसे बाहर निकाल दे।* इसके बाद जैसे दुष्ट घोड़ोंसे जुते हुए रथको अच्छा सारथि बड़ी सावधानीसे चलाकर अपने गन्तव्य स्थानपर ले जाता है, उसी प्रकार साधकको चाहिये कि बड़ी सावधानीके साथ अपने मनको वशमें रखे, जिससे योगसाधनमें किसी प्रकारका विघ्न न आये और वह परमात्माकी प्रसिरूप लक्ष्यपर पहुँच जाय। ॥१॥

सम्बन्ध —परब्रह्म परमात्मामें मन लगानेके लिये कैसे स्थानमें कैसी भूमिपर बैठकर साधन करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—

समे शुचौ शर्करावह्निवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥

समे=समतल; शुचौ=सब प्रकारसे शुद्ध; शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते=कंकड़, अग्नि और बालूसे रहित; (तथा) शब्दजलाश्रयादिभिः=शब्द, जल और आश्रय आदिकी दूषित; अनुकूले=सर्वथा अनुकूल; तु=और; न चक्षुपीडने=नेत्रोंको पीड़ा न देनेवाले; गुहानिवाताश्रयणे=गुहा आदि वायुयुक्त स्थानमें; मनः=मनको; प्रयोजयेत्=ध्यानमें लगानेका अभ्यास करना चाहिये ॥१०॥

  • आठवें और नवें मन्त्रोंमें जो ध्यानके लिये बैठनेकी और साधन करनेकी विधि बतायी गयी है, उसका बड़े सुन्दर ढंगसे सुस्पष्ट वर्णन भगवान्ने गीता अध्याय ६ श्लोक ११से १७ तक किया है।

† कठोपनिषद्में (१।३।२ से ८ तक) रथके रूपकका विस्तृत वर्णन है।