ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 454, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
विद्वान्=बुद्धिमान् मनुष्य (को चाहिये कि); त्रिरुत्रतम्=सिर, गला और छाती—ये तीनों अङ्ग ऊँचे उठाये हुए; शरीरम्=शरीरको; समम्=सीधा; (और) स्थाप्य=स्थिर करके; (तथा) इन्द्रियाणि=समस्त इन्द्रियोंको; मनसा=मनके द्वारा; हृदि=हृदयमें; सनिवेश्य=निरुद्ध करके; ब्रह्मोदुपेन=ॐकाररूप नौकाद्वारा; सर्वाणि=सम्पूर्ण; भयावहनि=भयंकर; स्रोतांसि=स्रोतों (प्रवाहों) को; प्रतरेत=पार कर जाय ॥ ८ ॥
व्याख्या —जो ध्यानयोगका साधन करे, उस बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि सिर, गले और छातीको ऊँचा उठाये रखे, इधर-उधर न झुकने दे तथा शरीरको सीधा और स्थिर रखे; क्योंकि शरीरको सीधा और स्थिर रखे बिना तथा सिर, गला और वक्षःस्थल ऊँचा किये बिना आलस्य, निद्रा और विश्लेषरूप विघ्न आ जाते हैं। अतः इन विघ्नोंसे बचनेके लिये उपर्युक्त प्रकारसे ही बैठना चाहिये। इसके बाद समस्त इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर उनका मनके द्वारा हृदयमें निरोध कर लेना चाहिये। फिर ॐकाररूप नौकाका आश्रय लेकर अर्थात् ॐकारका जप और उसके वाच्य परब्रह्म परमात्माका ध्यान करके समस्त भयानक प्रवाहोंको पार कर लेना चाहिये (गीता ६।१२, १३, १४)। भाव यह है कि नाना योनियोंमें ले जानेवाली जितनी वासनाएँ हैं, वे सब जन्म-मृत्युरूप भय देनेवाले स्रोत (प्रवाह) हैं। इन सबका त्याग करके सदाके लिये अमरपदको प्राप्त कर लेना चाहिये ॥ ८ ॥
प्राणान् प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छसीत। दुष्टाश्चयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान् मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ९ ॥
विद्वान्=बुद्धिमान् साधक (को चाहिये कि); इह=उपर्युक्त योगसाधनामें; संयुक्तचेष्टः=आहार-विहार आदि समस्त चेष्टाओंको यथायोग्य करते हुए; प्राणान् प्रपीड्य=विधिवत् प्राणायाम करके; प्राणे क्षीणे=प्राणके सूक्ष्म हो जानेपर; नासिकया=नासिकाद्वारा; उच्छसीत=उनको बाहर निकाल दे; दुष्टाश्चयुक्तम्=(इसके