ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
विद्वान्=बुद्धिमान् मनुष्य (को चाहिये कि); त्रिरुत्रतम्=सिर, गला और छाती—ये तीनों अङ्ग ऊँचे उठाये हुए; शरीरम्=शरीरको; समम्=सीधा; (और) स्थाप्य=स्थिर करके; (तथा) इन्द्रियाणि=समस्त इन्द्रियोंको; मनसा=मनके द्वारा; हृदि=हृदयमें; सनिवेश्य=निरुद्ध करके; ब्रह्मोदुपेन=ॐकाररूप नौकाद्वारा; सर्वाणि=सम्पूर्ण; भयावहनि=भयंकर; स्रोतांसि=स्रोतों (प्रवाहों) को; प्रतरेत=पार कर जाय ॥ ८ ॥
व्याख्या —जो ध्यानयोगका साधन करे, उस बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि सिर, गले और छातीको ऊँचा उठाये रखे, इधर-उधर न झुकने दे तथा शरीरको सीधा और स्थिर रखे; क्योंकि शरीरको सीधा और स्थिर रखे बिना तथा सिर, गला और वक्षःस्थल ऊँचा किये बिना आलस्य, निद्रा और विश्लेषरूप विघ्न आ जाते हैं। अतः इन विघ्नोंसे बचनेके लिये उपर्युक्त प्रकारसे ही बैठना चाहिये। इसके बाद समस्त इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर उनका मनके द्वारा हृदयमें निरोध कर लेना चाहिये। फिर ॐकाररूप नौकाका आश्रय लेकर अर्थात् ॐकारका जप और उसके वाच्य परब्रह्म परमात्माका ध्यान करके समस्त भयानक प्रवाहोंको पार कर लेना चाहिये (गीता ६।१२, १३, १४)। भाव यह है कि नाना योनियोंमें ले जानेवाली जितनी वासनाएँ हैं, वे सब जन्म-मृत्युरूप भय देनेवाले स्रोत (प्रवाह) हैं। इन सबका त्याग करके सदाके लिये अमरपदको प्राप्त कर लेना चाहिये ॥ ८ ॥
प्राणान् प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छसीत। दुष्टाश्चयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान् मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ९ ॥
विद्वान्=बुद्धिमान् साधक (को चाहिये कि); इह=उपर्युक्त योगसाधनामें; संयुक्तचेष्टः=आहार-विहार आदि समस्त चेष्टाओंको यथायोग्य करते हुए; प्राणान् प्रपीड्य=विधिवत् प्राणायाम करके; प्राणे क्षीणे=प्राणके सूक्ष्म हो जानेपर; नासिकया=नासिकाद्वारा; उच्छसीत=उनको बाहर निकाल दे; दुष्टाश्चयुक्तम्=(इसके
अध्याय २ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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बाद) दुष्ट घोड़ोंसे युक्त; वाहम् इव =रथको जिस प्रकार सारथि सावधानतापूर्वक गन्तव्य मार्गमें ले जाता है, उसी प्रकार; एनम् =इस; मनः =मनको; अप्रमत्तः =सावधान होकर; धारयेत=वशमें किये रहे ॥१॥
व्याख्या —बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि वह इस योग-साधनाके लिये आहार-विहार आदि समस्त चेष्टाओंको यथायोग्य करता रहे, उन्हें ध्यानयोगके लिये उपयोगी बना ले (गीता ६।१७)। योगशास्त्रकी विधिके अनुसार प्राणायाम करते-करते जब प्राण अत्यन्त सूक्ष्म हो जाय, तब नासिकाद्वारा उसे बाहर निकाल दे।* इसके बाद जैसे दुष्ट घोड़ोंसे जुते हुए रथको अच्छा सारथि बड़ी सावधानीसे चलाकर अपने गन्तव्य स्थानपर ले जाता है, उसी प्रकार साधकको चाहिये कि बड़ी सावधानीके साथ अपने मनको वशमें रखे, जिससे योगसाधनमें किसी प्रकारका विघ्न न आये और वह परमात्माकी प्रसिरूप लक्ष्यपर पहुँच जाय। ॥१॥
सम्बन्ध —परब्रह्म परमात्मामें मन लगानेके लिये कैसे स्थानमें कैसी भूमिपर बैठकर साधन करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—
समे शुचौ शर्करावह्निवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥
समे=समतल; शुचौ=सब प्रकारसे शुद्ध; शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते=कंकड़, अग्नि और बालूसे रहित; (तथा) शब्दजलाश्रयादिभिः=शब्द, जल और आश्रय आदिकी दूषित; अनुकूले=सर्वथा अनुकूल; तु=और; न चक्षुपीडने=नेत्रोंको पीड़ा न देनेवाले; गुहानिवाताश्रयणे=गुहा आदि वायुयुक्त स्थानमें; मनः=मनको; प्रयोजयेत्=ध्यानमें लगानेका अभ्यास करना चाहिये ॥१०॥
- आठवें और नवें मन्त्रोंमें जो ध्यानके लिये बैठनेकी और साधन करनेकी विधि बतायी गयी है, उसका बड़े सुन्दर ढंगसे सुस्पष्ट वर्णन भगवान्ने गीता अध्याय ६ श्लोक ११से १७ तक किया है।
† कठोपनिषद्में (१।३।२ से ८ तक) रथके रूपकका विस्तृत वर्णन है।
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[ अध्याय २ ]
व्याख्या —इस मन्त्रमें ध्यानयोगके उपयुक्त स्थानका वर्णन है। भाव यह है कि ध्यानयोगका साधन करनेवाले साधकको ऐसे स्थानमें अपना आसन लगाना चाहिये, जहाँकी भूमि समतल हो—ऊँची-नीची, टेढ़ी-मेढ़ी न हो, जो सब प्रकारसे शुद्ध हो—जहाँपर कूड़ा-करकट, मैला आदि न हो, झाड़-बुहारकर साफ किया हुआ हो और स्वभावसे भी पवित्र हो—जैसे कोई देवालय, तीर्थस्थान आदि; जहाँ कंकड़, बालू न हो और अग्नि या धूपकी गर्मी भी न हो; जहाँ कोई मनमें विशेष करनेवाला शब्द न होता हो—कोलाहलका सर्वथा अभाव हो; यथावश्यक जल प्राप्त हो सके; किंतु ऐसा जलाशय न हो, जहाँ बहुत लोग आते-जाते हों एवं जहाँ शरीर-रक्षाके लिये उपयुक्त आश्रय हो, परंतु ऐसा न हो, जहाँ धर्मशाला आदिकी भाँति बहुत लोग ठहरते हों; तात्पर्य यह कि इन सब विचारोंके अनुसार जो सर्वथा अनुकूल हो और जहाँका दृश्य नेत्रोंको पीड़ा पहुँचानेवाला—भयानक न हो, ऐसे गुफा आदि वायुशून्य एकांत स्थानमें पहले बताये हुए प्रकारसे आसन लगाकर अपने मनको परमात्मामें लगानेका अभ्यास करना चाहिये (गीता ६।११) ॥१०॥
सम्बन्ध —योगाभ्यास करनेवाले साधकका साधन ठीक हो रहा है या नहीं, इसकी पहचान बतायी जाती है—
नीहारधूमाकर्निलानलानां
खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।
एतानि रूपाणि पुरःसराणि
ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥ ११ ॥
ब्रह्मणि योगे =परमात्माकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले योगमें; (पहले) नीहारधूमाकर्निलानलानाम् =कुहरा, धूआँ, सूर्य, वायु और अग्निके सद्गुण; (तथा) खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् =जुगनू, बिजली, स्फटिक-मणि और चन्द्रमाके सद्गुण; रूपाणि =बहुत-से दृश्य; पुरःसराणि [ भवन्ति ]=योगीके सामने प्रकट होते हैं; एतानि =ये सब; अभिव्यक्तिकराणि =योगकी सफलताको स्पष्टरूपसे सूचित करनेवाले हैं ॥ ११ ॥
अध्याय २ ]
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व्याख्या —जब साधक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ध्यानयोगका साधन आरम्भ करता है, तब उसको अपने सामने कभी कुहरेके सदृश रूप दीखता है, कभी धूआँ-सा दिखायी देता है, कभी सूर्यके समान प्रकाश सर्वत्र परिपूर्ण दीखता है, कभी निश्चल वायुकी भाँति निराकार रूप अनुभवमें आता है, कभी अग्निके सदृश तेज दीख पड़ता है, कभी जुगनूके सदृश टिमटिमाहट-सी प्रतीत होती है, कभी बिजलीकी-सी चकाचौंध पैदा करनेवाली दीसि दृष्टिगोचर होती है, कभी स्फटिक-मणिके सदृश उज्ज्वल रूप देखनेमें आता है और कभी चन्द्रमाकी भाँति शीतल प्रकाश सर्वत्र फैला हुआ दिखायी देता है। ये सब तथा और भी अनेक दृश्य योग-साधनकी उन्नतिके द्योतक हैं। इनसे यह बात समझमें आती है कि साधकका ध्यान ठीक हो रहा है ॥ ११ ॥
पृथ्व्यसेजोऽनिलखे
समुत्थिते
पञ्चात्मके
योगगुणे
प्रवृत्ते ।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः
प्रासस्य
योगाग्रिमयं
शरीरम् ॥ १२ ॥
पृथ्व्यसेजोऽनिलखे समुत्थिते =पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँचों महाभूतोंका सम्यक् प्रकारसे उत्थान होनेपर; (तथा) पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते =इनसे सम्बन्ध रखनेवाले पाँच प्रकारके योगसम्बन्धी गुणोंकी सिद्धि हो जानेपर; योगाग्रिमयम् =योगाग्रिमय; शरीरम् =शरीरको; प्रासस्य =प्रास कर लेनेवाले; तस्य =उस साधकको; न =न तो; रोगः =रोग होता है; न =न; जरा =बुढ़ापा आता है; न =और न; मृत्युः =उसकी मृत्यु ही होती है ॥ १२ ॥
व्याख्या —ध्यानयोगका साधन करते-करते जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच महाभूतोंका उत्थान हो जाता है, अर्थात् जब साधकका इन पाँचों महाभूतोंपर अधिकार हो जाता है और इन पाँचों महाभूतोंसे सम्बन्ध रखनेवाली योगविषयक पाँचों सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं, उस समय योगाग्रिमय शरीरको प्रास कर लेनेवाले उस योगीके शरीरमें न तो रोग होता है, न बुढ़ापा
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[ अध्याय २ ]
आता है और न उसकी मृत्यु ही होती है। अभिप्राय यह कि उसकी इच्छाके बिना उसका शरीर नष्ट नहीं हो सकता (योगद० ३। ४६, ४७) ॥ १२ ॥
लघुत्वमारोग्यमलोलुप्तत्वं
| वर्णप्रसादं | स्वरसौष्ठवं | च। ---|---|---|--- गन्धः | शुभो | मूत्रपुरीषमल्पं | | योगप्रवृत्तिं | प्रथमां | वदन्ति ॥ १३ ॥
लघुत्वम्=शरीरका हल्कापन; आरोग्यम्=किसी प्रकारके रोगका न होना; अलोलुप्तत्वम्=विषयासक्तिकी निवृत्ति; वर्णप्रसादम्=शारीरिक वर्णकी उज्ज्वलता; स्वरसौष्ठवम्=स्वरकी मधुरता; शुभः गन्धः=(शरीरमें) अच्छी गन्ध; च=और; मूत्रपुरीषम्=मल-मूत्र; अल्पम्=कम हो जाना; (इन सबको) प्रथमाम् योगप्रवृत्तिम्=योगकी पहली सिद्धि; वदन्ति=कहते हैं ॥ १३ ॥
व्याख्या—भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेनेवाले ध्यानयोगीमें पूर्वोक्त शक्तियोंके सिवा और भी शक्तियाँ आ जाती हैं। उदाहरणतः उसका शरीर हल्का हो जाता है, शरीरमें भारीपन या आलस्यका भाव नहीं रहता। वह सदा ही नीरोग रहता है, उसे कभी कोई रोग नहीं होता। भौतिक पदार्थोंमें उसकी आसक्ति नष्ट हो जाती है। कोई भी भौतिक पदार्थ सामने आनेपर उसके मन और इन्द्रियोंका उसकी ओर आकर्षण नहीं होता। उसके शरीरका वर्ण उज्ज्वल हो जाता है। स्वर अत्यन्त मधुर और स्पष्ट हो जाता है। शरीरमेंसे बहुत अच्छी गन्ध निकलकर सब ओर फैल जाती है। मल और मूत्र बहुत ही स्वल्प मात्रामें होने लगते हैं। ये सब योगमार्गकी प्रारम्भिक सिद्धियाँ हैं—ऐसा योगीलोग कहते हैं ॥ १३ ॥
यथैव | विम्बं | मृदयोपलिप्तं | ---|---|---|--- | तेजोमयं | भ्राजते | तत् सुधान्तम्। तद्वाऽऽत्मतत्त्वं | प्रसमीक्ष्य | देही | | एकः | कृतार्थो भवते | वीतशोकः ॥ १४ ॥
यथा=जिस प्रकार; मृदया=मिट्टीसे; उपलिप्तम्=लिस होकर मलिन हुआ;
अध्याय २ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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[ यत् ]=जो; तेजोमयम्=प्रकाशयुक्त; विम्बम्=रत्न है; तत् एव=वही; सुधान्तम्=भलीभाँति धूल जानेपर; भाजते=चमकने लगता है; तत् वा=उसी प्रकार; देही=शरीरधारी (जीवात्मा); आत्मतत्त्वम्=(मल आदिसे रहित) आत्मतत्त्वको; प्रसमीक्ष्य=(योगके द्वारा) भलीभाँति प्रत्यक्ष करके; एकः=अकेला कैवल्य अवस्थाको प्राप्त; वीतशोकः=सब प्रकारके दुःखोंसे रहित; (तथा) कृतार्थः=कृतकृत्य; भवते=हो जाता है ॥ १४ ॥
व्याख्या —जिस प्रकार कोई तेजोमय रत्न मिट्टीसे लिस रहनेके कारण छिपा रहता है, अपने असली रूपमें प्रकट नहीं होता, परंतु वही जब मिट्टी आदिको हटाकर धो-पोंछकर साफ कर लिया जाता है, तब अपने असली रूपमें चमकने लगता है, उसी प्रकार इस जीवात्माका वास्तविक स्वरूप अत्यन्त स्वच्छ होनेपर भी अनन्त जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके संस्कारोंसे मलिन हो जानेके कारण प्रत्यक्ष प्रकट नहीं होता; परंतु जब मनुष्य ध्यानयोगके साधनद्वारा समस्त मलोंको धोकर आत्माके यथार्थ स्वरूपको भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह असङ्ग हो जाता है। अर्थात् उसका जो जड़ पदार्थोंके साथ संयोग हो रहा था, उसका नाश होकर वह कैवल्य अवस्थाको प्राप्त हो जाता है तथा उसके सब प्रकारके दुःखोंका अन्त होकर वह सर्वथा कृतकृत्य हो जाता है। उसका मनुष्य-जन्म सार्थक हो जाता है (योग० ४। ३४) ॥ १४ ॥
यदाऽऽत्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत्। अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १५ ॥
तु=उसके बाद; यदा=जब; युक्तः=वह योगी; इह=यहाँ; दीपोपमेन=दीपकके सदृश (प्रकाशमय); आत्मतत्त्वेन=आत्मतत्त्वके द्वारा; ब्रह्मतत्त्वम्=ब्रह्मतत्त्वको; प्रपश्येत्=भलीभाँति प्रत्यक्ष देख लेता है; [ तदा सः ]=उस समय वह; अजम्=(उस) अजन्मा; ध्रुवम्=निश्चल; सर्वतत्त्वैः=समस्त तत्त्वोंसे; विशुद्धम्=विशुद्ध; देवम्=परमदेव परमात्माको; ज्ञात्वा=जानकर; सर्वपाशैः=सब बन्धनोंसे; मुच्यते=सदाके लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥
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[ अध्याय २ ]
व्याख्या —फिर जब वह योगी इसी स्थितिमें दीपकके सद्गुरु निर्मल प्रकाशमय पूर्वोक्त आत्मतत्त्वके द्वारा ब्रह्मतत्त्वको भलीभाँति देख लेता है—अर्थात् उन परब्रह्म परमात्माको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब उन जन्मादि समस्त विकारोंसे रहित, अचल और निश्चित तथा समस्त तत्त्वोंसे असङ्ग— सर्वथा विशुद्ध परमदेव परमात्माको तत्त्वसे जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे सदाके लिये छूट जाता है।
इस मन्त्रमें आत्मतत्त्वसे ब्रह्मतत्त्वको जाननेकी बात कहकर यह भाव दिखाया गया है कि परमात्माका साक्षात्कार मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा नहीं हो सकता। इन सबकी वहाँ पहुँच नहीं है, वे एकमात्र आत्मतत्त्वके द्वारा ही प्रत्यक्ष होते हैं ॥ १५ ॥
एष ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः
पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः।
स एव जातः स जनिष्यमाणः
प्रत्यङ् जनान्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥ १६ ॥*
ह=निश्चय ही; एष =यह (ऊपर बताया हुआ); देव =परमदेव परमात्मा; सर्वाः =समस्त; प्रदिशः अनु=दिशाओं और अवान्तर दिशाओंमें अनुगत (व्याप्त) है; [ सः ] ह=वही प्रसिद्ध परमात्मा; पूर्वः =सबसे पहले; जातः =हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुआ था; (और) सः उ=वही; गर्भे =समस्त ब्रह्माण्डरूप गर्भमें; अन्तः =अन्तर््यामीरूपसे स्थित है; सः एव=वही; जातः =इस समय जगत्के रूपमें प्रकट है; सः =और वही; जनिष्यमाणः =भविष्यमें भी प्रकट होनेवाला है; [ सः ]=वह; जनान् प्रत्यङ् =सब जीवोंके भीतर; (अन्तर््यामीरूपसे) तिष्ठति=स्थित है; (और) सर्वतोमुखः =सब ओर मुखवाला है ॥ १६ ॥
व्याख्या —निश्चय ही ये ऊपर बताये हुए परमदेव ब्रह्म समस्त दिशा और अवान्तर दिशाओंमें व्याप्त हैं अर्थात् सर्वत्र परिपूर्ण हैं। जगत्में कोई भी ऐसा
- यह मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ३२ का चौथा है।
अध्याय ३ ]
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स्थान नहीं है, जहाँ वे न हों। वे ही प्रसिद्ध परब्रह्म परमात्मा सबसे पहले हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुए थे। वे ही इस ब्रह्माण्डरूप गर्भमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। वे ही इस समय जगत्के रूपमें प्रकट हैं और भविष्यमें अर्थात् प्रलयके बाद सृष्टिकालमें पुनः प्रकट होनेवाले हैं। ये समस्त जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं तथा सब ओर मुखवाले अर्थात् सबको सब ओरसे देखनेवाले हैं ॥ १६ ॥
यो देवो अग्नी यो अप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश ।
य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः ॥ १७ ॥
यः=जो; देवः=परमदेव परमात्मा; अग्नी=अग्निमें है; यः=जो; अप्सु=जलमें है; यः=जो; विश्वम् भुवनम् आविवेश=समस्त लोकोंमें प्रविष्ट हो रहा है; यः=जो; ओषधीषु=ओषधियोंमें है; (तथा) यः=जो; वनस्पतिषु=वनस्पतियोंमें है; तस्मै देवाय=उन परमदेव परमात्माके लिये; नमः=नमस्कार है; नमः=नमस्कार है ॥ १७ ॥
व्याख्या —जो सर्वशक्तिमान् पूर्णब्रह्म परमदेव अग्निमें हैं, जो जलमें हैं, जो समस्त लोकोंमें अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हो रहे हैं, जो ओषधियोंमें हैं और जो वनस्पतियोंमें हैं—अर्थात् जो सर्वत्र परिपूर्ण हैं जिनका अनेक प्रकारसे पहले वर्णन कर आये हैं, उन परमदेव परमात्माको नमस्कार है। नमस्कार है। ‘नमः’ शब्दको दुहरानेका अभिप्राय अध्यायकी समाप्तिको सूचित करना है ॥ १७ ॥
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय अध्याय
य एको जालवानीशत ईशनीभिः
सर्वाः लोकानीशत ईशनीभिः ।
य एवैक उद्भव सम्भवे च
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १ ॥
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[ अध्याय ३ ]
यः=जो; एकः=एक; जालवान्=जगरूप जालका अधिपति; ईशनीभिः=अपनी स्वरूपभूत शासनशक्तियोंद्वारा; ईशते=शासन करता है; ईशनीभिः=उन विविध शासन-शक्तियोंद्वारा; सर्वान्=सम्पूर्ण; लोकान् ईशते=लोकोंपर शासन करता है; यः=(तथा) जो; एकः=अकेला; एव=ही; सम्भवे च उद्भवे=सृष्टि और उसके विस्तारमें (सर्वथा समर्थ है); एतत्=इस ब्रह्मको; ये=जो महापुरुष; विद्=जान लेते हैं; ते=वे; अमृताः=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं ॥ १ ॥
व्याख्या —जो एक—अद्वितीय परमात्मा जगत्-रूप जालकी रचना करके अपनी स्वरूपभूत शासन-शक्तियोंद्वारा उसपर शासन कर रहे हैं तथा उन विविध शासन-शक्तियोंद्वारा समस्त लोकों और लोकपालोंका यथायोग्य संचालन कर रहे हैं—जिनके शासनमें ये सब अपने-अपने कर्तव्योंका नियमपूर्वक पालन कर रहे हैं तथा जो अकेले ही बिना किसी दूसरेकी सहायता लिये समस्त जगत्की उत्पत्ति और उसका विस्तार करनेमें सर्वथा समर्थ हैं, उन परब्रह्म परमेश्वरको जो महापुरुष तत्त्वसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं—जन्म-मृत्युके जालसे सदाके लिये छूट जाते हैं ॥ १ ॥
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु-
यं इमाल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
प्रत्यङ् जनान्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले
संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥ २ ॥
यः=जो; ईशनीभिः=अपनी स्वरूपभूत विविध शासन-शक्तियोंद्वारा; इमान्=इन सब; लोकान् ईशते=लोकोंपर शासन करता है; [ सः ] रुद्रः=वह रुद्र; एकः=हि=एक ही है; (इसीलिये विद्वान् पुरुषोंने जगत्के कारणका निश्चय करते समय) द्वितीयाय न तस्थुः=दूसरेका आश्रय नहीं लिया; [ सः ]=वह परमात्मा; जनान् प्रत्यङ्=समस्त जीवोंके भीतर; तिष्ठति=स्थित हो रहा है; विश्वा=सम्पूर्ण; भुवनानि संसृज्य=लोकोंकी रचना करके; गोपाः=उनकी रक्षा करनेवाला परमेश्वर; अन्तकाले=प्रलयकालमें; संचुकोच=इन सबको समेट लेता है ॥ २ ॥
व्याख्या —जो अपनी स्वरूपभूत विविध शासन-शक्तियोंद्वारा इन सब
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श्वेताश्वतरोपनिषद्
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लोकोंपर शासन करते हैं—उनका नियमानुसार संचालन करते हैं, वे रूद्ररूप परमेश्वर एक ही हैं। अर्थात् इस विश्वका नियमन करनेवाली शक्तियाँ अनेक होनेपर भी वे सब एक ही परमेश्वरकी हैं और उनसे अभिन्न हैं। इसी कारण, ज्ञानीजनोंने जगत्के कारणका निश्चय करते समय किसी भी दूसरे तत्त्वका आश्रय नहीं लिया। सबने एक स्वरसे यही निश्चय किया कि एक परब्रह्म ही इस जगत्के कारण हैं। वे परमात्मा सब जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। इन समस्त लोकोंकी रचना करके उनकी रक्षा करनेवाले परमेश्वर प्रलयकालमें स्वयं ही इन सबको समेट लेते हैं, अर्थात् अपनेमें विलीन कर लेते हैं। उस समय इनकी भिन्न-भिन्न रूपोंमें अभिव्यक्ति नहीं रहती ॥ २ ॥
विश्वतश्चक्षुरुत
विश्वतोमुखो
विश्वतोबाहुरुत
विश्वतस्यात् ।
सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रै-
र्घावाभूमी जनयन् देव एकः ॥ ३ ॥ *
विश्वतश्चक्षुः=सब जगह आँखवाला; उत=तथा; विश्वतोमुखः=सब जगह मुखवाला; विश्वतोबाहुः=सब जगह हाथवाला; उत=और; विश्वतस्यात्=सब जगह पैरवाला; घावाभूमी जनयन्=आकाश और पृथ्वीकी सृष्टि करनेवाला; [ सः ]=वह; एकः=एकमात्र; देवः=देव (परमात्मा); बाहुभ्याम्=मनुष्य आदि जीवोंको दो-दो हाथोंसे; संधमति=युक्त करता है (तथा); पतत्रैः=(पक्षी-पतंग आदिको) पाँखोंसे; सं [ धमति ]=युक्त करता है ॥ ३ ॥
व्याख्या—वे परमेश्वर एक हैं; फिर भी उनकी सब जगह आँखें हैं, सब जगह मुख हैं, सब जगह हाथ हैं और सब जगह पैर हैं। भाव यह कि वे सम्पूर्ण लोकोंमें स्थित समस्त जीवोंके कर्म और विचारोंको तथा समस्त घटनाओंको अपनी दिव्य शक्तिद्वारा निरन्तर देखते रहते हैं, कोई भी बात उनसे छिपी नहीं रहती। उनका भक्त उनको जहाँ कहीं भोजनके योग्य वस्तु समर्पित करता है,
- यजुर्वेद अध्याय १७का उत्तरीसवों और (अथर्व० १३।२६) मन्त्र इसी प्रकार है तथा ऋ० १०।८१।३ भी इसी प्रकार है।
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[ अध्याय ३ ]
उसे वे वहीँ भोग लगा सकते हैं। वे सब जगह प्रत्येक वस्तुको एक साथ ग्रहण करनेमें और अपने आश्रित जनोंके संकटका नाश करके उनकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं तथा जहाँ कहीं उनके भक्त उन्हें बुलाना चाहें, वहाँ वे एक साथ पहुँच सकते हैं। संसारमें ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ उनकी ये शक्तियाँ विद्यमान न हों। आकाशसे लेकर पृथ्वीतक समस्त लोकोंकी रचना करनेवाले एक ही परमदेव परमेश्वर मनुष्य आदि प्राणियोंको दो-दो भुजाओंसे और पक्षियोंको पाँखोंसे युक्त करते हैं। भाव यह कि वे समस्त प्राणियोंको आवश्यकतानुसार भिन्न-भिन्न शक्तियों एवं साधनोंसे सम्पन्न करते हैं। यहाँ भुजा और पाँखोंका कथन उपलक्षणमात्र है। इससे यह समझ लेना चाहिये कि समस्त प्राणियोंमें जो कुछ भी शक्ति है, वह सब परमात्माकी ही दी हुई है॥ ३ ॥
यो देवानां प्रभवश्चोद्धवश्च विश्वधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्व स नो बुद्ध्या शुभया संयुक्तु ॥ ४ ॥
यः=जो; रुद्रः=रुद्र; देवानाम्=इन्द्रादि देवताओंकी; प्रभवः=उत्पत्तिका हेतु; च=और; उद्धवः=वृद्धिका हेतु है; च=तथा; (जो) विश्वधिपः=सबका अधिपति; (और) महर्षिः=महान् ज्ञानी (सर्वज्ञ) है; पूर्वम्=(जिसने) पहले; हिरण्यगर्भम्=हिरण्यगर्भको; जनयामास=उत्पन्न किया था; सः=वह परमदेव परमेश्वर; नः=हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या=शुभ बुद्धिसे; संयुक्तु=संयुक्त करें ॥ ४ ॥
व्याख्या—सबको अपने शासनमें रखनेवाले जो रुद्ररूप परमेश्वर इन्द्रादि समस्त देवताओंको उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं तथा जो सबके अधिपति और महान् ज्ञानी—सर्वज्ञ हैं, जिन्होंने सृष्टिके आदिमें हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया था, वे परमदेव परमात्मा हमलोगोंको शुभ बुद्धिसे संयुक्त करें ॥ ४ ॥
या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी । तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥ ५ ॥ *
- यह यजुर्वेद अध्याय १६का दूसरा मन्त्र है।
अध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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रुद्र=हे रुद्रदेव!; ते=तेरी; या=जो; अघोरा=भयानकतासे शून्य (सौम्य); अपापकाशिनी=पुण्यसे प्रकाशित होनेवाली; (तथा) शिवा=कल्याणमयी; तनू=: मूर्ति है; गिरिशन्त=हे पर्वतपर रहकर सुखका विस्तार करनेवाले शिव!; तया=उस; शन्तमया तनुवा=परम शान्त मूर्तिसे; (तू कृपा करके) न: अभिचाकशीहि=हमलोगोंको देख ॥ ५ ॥
व्याख्या—हे रुद्रदेव! आपकी जो भयानकतासे शून्य तथा पुण्यकर्मोंसे प्रकाशित होनेवाली कल्याणमयी सौम्यमूर्ति है—जिसका दर्शन करके मनुष्य परम आनन्दमें मग्न हो जाता है—हे गिरिशन्त! अर्थात् पर्वतपर निवास करते हुए समस्त लोकोंको सुख पहुँचानेवाले परमेश्वर! उस परम शान्त मूर्तिसे ही कृपा करके आप हमलोगोंकी ओर देखिये। आपकी कृपादृष्टि पड़ते ही हम सर्वथा पवित्र होकर आपकी प्राप्तिसे योग्य बन जायेंगे ॥ ५ ॥
यामिणुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ध्यस्तवे।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसीः पुरुषं जगत् ॥ ६ ॥*
गिरिशन्त=हे गिरिशन्त!; याम्=जिस; इषुम्=बाणको; अस्तवे=फेंकनेके लिये; (तू) हस्ते=हाथमें; विभर्षि=धारण किये हुए है; गिरित्र=हे गिरिराज हिमालयकी रक्षा करनेवाले देव!; ताम्=उस बाणको; शिवाम्=कल्याणमय; कुरु=बना ले; पुरुषम्=जीवसमुदायरूप; जगत्=जगत्को; मा हिंसीः=नष्ट न कर (कष्ट न दे) ॥ ६ ॥
व्याख्या—हे गिरिशन्त—हे कैलासवासी सुखदायक परमेश्वर! जिस बाणको फेंकनेके लिये आपने हाथमें ले रखा है, हे गिरिराज हिमालयकी रक्षा करनेवाले! आप उस बाणको कल्याणमय बना लें—उसकी क्रूरताको नष्ट करके उसे शान्तिमय बना लें। इस जीवसमुदायरूप जगत्का विनाश न करें—इसको कष्ट न दें ॥ ६ ॥
- यह यजुर्वेद अध्याय १६का तीसरा मन्त्र है।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्नं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितार- मीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥
ततः=पूर्वोक्त जीव-समुदायरूप जगत्के; परम्=परे; (और) ब्रह्मपरम्=हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ; सर्वभूतेषु=समस्त प्राणियोंमें; यथानिकायम्=उनके शरीरोंके अनुरूप होकर; गूढम्=छिपे हुए; (और) विश्वस्य परिवेष्टितारम्=सम्पूर्ण विश्वको सब ओरसे घेरे हुए; तम्=उस; बृहन्नम्=महान्, सर्वत्र व्यापक; एकम्=एकमात्र देव; ईशम्=परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; अमृताः भवन्ति=(ज्ञानीजन) अमर हो जाते हैं ॥ ७ ॥
व्याख्या —जो पहले कहे हुए जीव-समुदायरूप जगत्से और हिरण्यगर्भ नामक ब्रह्मासे भी सर्वथा श्रेष्ठ हैं, समस्त प्राणियोंमें उनके शरीरोंके अनुरूप होकर छिपे हुए हैं; समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे हुए हैं तथा सर्वत्र व्याप्त और महान् हैं, उन एकमात्र परमेश्वरको जानकर ज्ञानीजन सदाके लिये अमर हो जाते हैं; फिर कभी उनका जन्म-मरण नहीं होता ॥ ७ ॥
सम्बन्ध —अब इस मन्त्रमें ज्ञानी महापुरुषके अनुभवकी बात कहकर परमात्मज्ञानके फलकी दृढ़ता दिखलाते हैं—
वेदाहमेतं पुरुषं महान्त- मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ ८ ॥ *
तमसः परस्तात्=अविद्यारूप अन्धकारसे अतीत; (तथा) आदित्यवर्णम्=सूर्यकी भाँति स्वयंप्रकाशस्वरूप; एतम्=इस; महान्तम् पुरुषम्=महान् पुरुष (परमेश्वर) को; अहम् वेद=मैं जानता हूँ; तम्=उसको; विदित्वा=जानकर;
- यह यजुर्वेद अध्याय ३१का अठारहवाँ मन्त्र है।
अध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४६५
एव=ही; (मनुष्य) मृत्युम्=मृत्युको; अत्येति ( अति+एति )=उल्लङ्घन कर जाता है; अयनाय=(परमपदकी) प्राप्तिके लिये; अन्यः=दूसरा; पन्थाः=मार्ग; न=नहीं; विद्यते=है ॥ ८ ॥
व्याख्या —कोई ज्ञानी महापुरुष कहता है—इन महानुसे भी महान् परम पुरुषोत्तमको मैं जानता हूँ। वे अविद्यारूप अन्धकारसे सर्वथा अतीत हैं तथा सूर्यकी भाँति स्वयंप्रकाशस्वरूप हैं। उनको जानकर ही मनुष्य मृत्युका उल्लङ्घन करनेमें—इस जन्म-मृत्युके बन्धनसे सदाके लिये छुटकारा पानेमें समर्थ होता है। परमपदकी प्राप्तिके लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग अर्थात् उपाय नहीं है ॥ ८ ॥
यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चिद् यस्मात्राणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक- स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥ ९ ॥
यस्मात् परम्=जिससे श्रेष्ठ; अपरम्=दूसरा; किञ्चित्=कुछ भी; न=नहीं; अस्ति=है; यस्मात्=जिससे (बढ़कर); कश्चित्=कोई भी; न=न तो; अणीयः=अधिक सूक्ष्म; न=और न; ज्यायः=महान् ही; अस्ति=है; एकः=(जो) अकेला ही; वृक्षः इव=वृक्षकी भाँति; स्तब्धः=निश्चलभावसे; दिवि=प्रकाशमय आकाशमें; तिष्ठति=स्थित है; तेन पुरुषेण=उस परमपुरुष पुरुषोत्तमसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण जगत्; पूर्णम्=परिपूर्ण है ॥ ९ ॥
व्याख्या —उन परमदेव परमेश्वरसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है, वे सर्वश्रेष्ठ हैं। जितने भी सूक्ष्म तत्त्व हैं, उन सबसे अधिक सूक्ष्म वे ही हैं। उनसे अधिक सूक्ष्म कोई भी नहीं है। इसीसे वे छोटे-से-छोटे जीवके शरीरमें प्रविष्ट होकर स्थित हैं। इसी प्रकार जितने भी महान् व्यापक तत्त्व हैं, उन सबसे महान्—अधिक व्यापक वे परब्रह्म हैं; उनसे बड़ा—उनसे अधिक व्यापक कोई भी नहीं है। इसीसे वे प्रलयकालमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपने अंदर लीन कर लेते हैं। जो अकेले ही वृक्षकी भाँति निश्चलभावसे परम-धामरूप प्रकाशमय दिव्य
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
आकाशमें स्थित हैं, उन परब्रह्म परमात्मासे यह समस्त जगत् व्याप्त है—वे परम पुरुष परमेश्वर ही निराकाररूपसे सारे जगत्में परिपूर्ण हैं ॥ ९ ॥
ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम् । य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १० ॥
ततः=उस पहले बताये हुए हिरण्यगर्भसे; यत्=जो; उत्तरतरम्=अत्यन्त उत्कृष्ट है; तत्=वह परब्रह्म परमात्मा; अरूपम्=आकाररहित; (और) अनामयम्=सब प्रकारके दोषोंसे शून्य है; ये=जो; एतत्=इस परब्रह्म परमात्माको; विदुः=जानते हैं; ते=वे; अमृताः=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं; अथ=परंतु; इतरे=इस रहस्यको न जानेवाले दूसरे लोग; (बार-बार) दुःखम्=दुःखको; एव=ही; अपियन्ति=प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥
व्याख्या —उस पहले बताये हुए हिरण्यगर्भसे जो सब प्रकारसे अत्यन्त उत्कृष्ट हैं, वे परब्रह्म परमात्मा आकाररहित और सब प्रकारके विकारोंसे सर्वथा शून्य हैं; जो कोई महापुरुष इन परब्रह्म परमात्माको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं—सदाके लिये जन्म-मृत्युके दुःखोंसे छूट जाते हैं। परंतु जो इन्हें नहीं जानते, वे सब लोग निश्चयपूर्वक बार-बार दुःखोंको प्राप्त होते हैं। अतः मनुष्यको सदाके लिये दुःखोंसे छूटने और परमानन्दस्वरूप परमात्माको पानेके लिये उन्हें जानना चाहिये ॥ १० ॥
सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः ।
सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात् सर्वगतः शिवः ॥ ११ ॥
सः=वह; भगवान्=भगवान्; सर्वाननशिरोग्रीवः=सब ओर मुख, सिर और ग्रीवावाला है; सर्वभूतगुहाशयः=समस्त प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें निवास करता है; (और) सर्वव्यापी=सर्वव्यापी है; तस्मात्=इसलिये; [ सः ]=वह; शिवः=कल्याणस्वरूप परमेश्वर; सर्वगतः=सब जगह पहुँचा हुआ है ॥ ११ ॥
व्याख्या —उन सर्वेश्वर भगवान्के सभी जगह मुख हैं, सभी जगह सिर और सभी जगह गला हैं। भाव यह कि वे प्रत्येक स्थानपर प्रत्येक अङ्गद्वारा
अध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४६७
किया जानेवाला कार्य करनेमें समर्थ हैं। वे समस्त प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें निवास करते हैं और सर्वव्यापी हैं, इसलिये वे कल्याणस्वरूप परमेश्वर सभी जगह पहुँचे हुए हैं। अभिप्राय यह कि साधक उनको जिस समय, जहाँ और जिस रूपमें प्रत्यक्ष करना चाहे, उसी समय, उसी जगह और उसी रूपमें वे प्रत्यक्ष हो सकते हैं ॥ ११ ॥
महान् प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः। सुनिर्मलाभिमां प्रासिमीशानो ज्योतिरव्ययः ॥ १२ ॥
वै=निश्चय ही; एषः=यह; महान्=महान्; प्रभुः=समर्थ; ईशानः=सबपर शासन करनेवाला; अव्ययः=अविनाशी; (एवं) ज्योतिः=प्रकाशस्वरूप; पुरुषः=परमपुरुष पुरुषोत्तम; इमाम् सुनिर्मलाम् प्रासिम् (प्रति)=अपनी प्रासिरूप इस अत्यन्त निर्मल लाभकी ओर; सत्त्वस्य प्रवर्तकः=अन्तःकरणको प्रेरित करनेवाला है ॥ १२ ॥
व्याख्या—निश्चय ही ये सबपर शासन करनेवाले, महान् प्रभु तथा अविनाशी और प्रकाशस्वरूप परम पुरुष पुरुषोत्तम पहले बताये हुए इस परम निर्मल लाभके प्रति अर्थात् अपने आनन्दमय विशुद्ध स्वरूपकी प्राप्तिकी ओर मनुष्यके अन्तःकरणको प्रेरित करते हैं, हरेक मनुष्यको ये अपनी ओर आकर्षित करते हैं; तथापि यह मूर्ख जीव सब प्रकारका सुयोग पाकर भी उनकी प्रेरणाके अनुसार उनकी प्राप्तिके लिये तत्परतासे चेष्टा नहीं करता, इसी कारण मारा-मारा फिरता है ॥ १२ ॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। हृदा मन्वीशो मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १३ ॥
अङ्गुष्ठमात्रः=(यह) अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; अन्तरात्मा=अन्तर्गामी; पुरुषः=परम पुरुष (पुरुषोत्तम); सदा=सदा ही; जनानाम्=मनुष्योंके; हृदये=हृदयमें; संनिविष्टः=सम्यक् प्रकारसे स्थित है; मन्वीशः=मनका स्वामी है; (तथा) हृदा=निर्मल हृदय; (और) मनसा=विशुद्ध मनसे; अभिक्लृप्तः=ध्यानमें लाया हुआ (प्रत्यक्ष होता है); ये=जो;
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
एतत्=इस परब्रह्म परमेश्वरको; विदुः=जान लेते हैं; ते=वे; अमृताः=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं ॥ १३ ॥
व्याख्या —अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाले अन्तर््यामी परमपुरुष परमेश्वर सदा ही मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं और मनके स्वामी हैं तथा निर्मल हृदय और विशुद्ध मनके द्वारा ध्यानमें लाये जाकर प्रत्यक्ष होते हैं; जो साधक इन परब्रह्म परमेश्वरको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं, अर्थात् सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं—अमृतस्वरूप बन जाते हैं। यहाँ परमात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला इसलिये बताया गया है कि मनुष्यका हृदय अँगुठेके नापका होता है और वही परमात्माकी उपलब्धिका स्थान है। ब्रह्मसूत्रमें भी इस विषयपर विचार करके यही निश्चय किया गया है (ब्र० सू० १।३।२४-२५) ॥ १३ ॥
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठदशाङ्गुलम् ॥ १४ ॥*
पुरुषः =वह परम पुरुष; सहस्रशीर्षा =हजारों सिरवाला; सहस्राक्षः =हजारों आँखवाला; सहस्रपात् =(और) हजारों पैरवाला; सः =वह; भूमिम् =समस्त जगत्को; विश्वतः =सब ओरसे; वृत्वा =घेरकर; दशाङ्गुलम् =अति=नाभिसे दस अङ्गुल ऊपर (हृदयमें); अतिष्ठत् =स्थित है ॥ १४ ॥
व्याख्या —उन परमपुरुष परमेश्वरके हजारों सिर, हजारों आँखें और हजारों पैर हैं अर्थात् सब अवयवोंसे रहित होनेपर भी उनके सिर, आँख और पैर आदि सभी अङ्ग अनन्त और असंख्य हैं। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर सर्वत्र व्याप्त हुए ही नाभिसे दस अङ्गुल ऊपर हृदयाकाशमें स्थित हैं। वे सर्वव्यापी और महान् होते हुए ही हृदयरूप एकदेशमें स्थित हैं। भाव यह कि वे अनेक विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं ॥ १४ ॥
पुरुष एवेदः सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदत्रेनातिरोहति ॥ १५ ॥†
*† ये दोनों यजुर्वेदके ३१।१,२, ऋग्वेदके १०।१०।१,२ तथा अथर्ववेदके १९।६।१,४ मन्त्र हैं।
अध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४६९
यत्=जो; भूतम्=अबसे पहले हो चुका है; यत्=जो; भव्यम्=भविव्यमें होनेवाला है; च=और; यत्=जो; अत्रेन=खाद्य पदार्थोंसे; अतिरोहति=इस समय बढ़ रहा है; इदम्=यह; सर्वम्=समस्त जगत्; पुरुषः एव=परम पुरुष परमात्मा ही है; उत=और; (वही) अमृतत्वस्य=अमृतस्वरूप मोक्षका; ईशानः=स्वामी है ॥ १५ ॥
व्याख्या —जो अबसे पहले हो चुका है, जो भविव्यमें होनेवाला है और जो वर्तमान कालमें अत्रके द्वारा अर्थात् खाद्य पदार्थोंके द्वारा बढ़ रहा है, वह समस्त जगत् परम पुरुष परमात्माका ही स्वरूप है। वे स्वयं ही अपनी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिसे इस रूपमें प्रकट होते हैं तथा वे ही अमृतस्वरूप मोक्षके स्वामी हैं अर्थात् जीवोंको संसार-बन्धनसे छुड़ाकर अपनी प्राप्ति करा देते हैं। अतएव उनकी प्राप्तिके अभिलाषी साधकोंको उन्हींकी शरणमें जाना चाहिये ॥ १५ ॥
सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १६ ॥
तत्=वह परम पुरुष परमात्मा; सर्वतः पाणिपादम्=सब जगह हाथ-पैरवाला; सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्=सब जगह आँख, सिर और मुखवाला; (तथा) सर्वतः श्रुतिम्=सब जगह कानोंवाला है; (वही) लोके=ब्रह्माण्डमें; सर्वम्=सबको; आवृत्य=सब ओरसे घेरकर; तिष्ठति=स्थित है ॥ १६ ॥
व्याख्या —उन परमात्माके हाथ, पैर, आँखें, सिर, मुख और कान सब जगह हैं। वे सब जगह सब शक्तियोंसे सब कार्य करनेमें समर्थ हैं। उन्होंने सभी जगह अपने भक्तोंकी रक्षा करने तथा उन्हें अपनी ओर खींचनेके लिये हाथ बढ़ा रखा है। उनका भक्त उन्हें जहाँ चाहता है, वहाँ उन्हें पहुँचा हुआ पाता है। वे सब जगह सब जीवोंद्वारा किये जानेवाले कर्मोंको देख रहे हैं। उनका भक्त जहाँ उन्हें प्रणाम करता है, सर्वत्र व्याप्त होनेके कारण उनके चरण और सिर आदि अङ्ग वहाँ मौजूद रहते हैं। अपने भक्तकी प्रार्थना सुननेके लिये उनके कान सर्वत्र हैं और अपने भक्तद्वारा अर्पण की हुई वस्तुका भोग लगानेके लिये उनका मुख भी सर्वत्र विद्यमान है। वे परमेश्वर इस ब्रह्माण्डमें सबको सब ओरसे घेरकर स्थित हैं—इस बातपर विश्वास करके मनुष्यको उनकी सेवामें लग जाना चाहिये। यह मन्त्र गीतामें भी इसी रूपमें आया है (१३।१३) ॥ १६ ॥
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥ १७ ॥
(जो परम पुरुष परमात्मा) सर्वेन्द्रियविवर्जितम्=समस्त इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी; सर्वेन्द्रियगुणाभासम्=समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है; (तथा) सर्वस्य=सबका; प्रभुम्=स्वामी; सर्वस्य=सबका; ईशानम्=शासक; (और) बृहत्=सबसे बड़ा; शरणम्=आश्रय है ॥ १७ ॥
व्याख्या—जो सर्वशक्तिमान् परम पुरुष परमात्मा समस्त इन्द्रियोंसे रहित—देहेन्द्रियादि-भेदसे शून्य होनेपर भी समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं तथा सबके स्वामी, परम समर्थ, सबका शासन करनेवाले और जीवके लिये सबसे बड़े आश्रय हैं, मनुष्यको सर्वतोभावसे उन्हीकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। यही मनुष्य-शरीरका अच्छे-से-अच्छा उपयोग है। इस मन्त्रका पूर्वाङ्ग गीतामें ज्यों-का-त्यों आया है (१३।१४) ॥ १७ ॥
नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥ १८ ॥
सर्वस्य=सम्पूर्ण; स्थावरस्य=स्थावर; च=और; चरस्य=जंगम; लोकस्य वशी=जगत्को वशमें रखनेवाला; हंसः=वह प्रकाशमय परमेश्वर; नवद्वारे=नौ द्वारवाले; पुरे=शरीररूपी नगरमें; देही=अन्तर््यामीरूपसे हृदयमें स्थित देही है; (तथा वही) बहिः=बाह्य जगत्में भी; लेलायते=लीला कर रहा है ॥ १८ ॥
व्याख्या—सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम जीवोंके समुदायरूप इस जगत्को अपने वशमें रखनेवाले वे प्रकाशमय परमेश्वर दो आँख, दो कान, दो नासिका, एक मुख, एक गुदा और एक उपस्थ—इस प्रकार नौ दरवाजोंवाले मनुष्य-शरीररूप नगरमें अन्तर््यामीरूपसे स्थित हैं और वे ही इस बाह्य जगत्में भी लीला कर रहे हैं यों समझकर मन जहाँ सुगमतासे स्थिर हो सके, वहीं उनका ध्यान करना चाहिये ॥ १८ ॥
सम्बन्ध—पहले जो यह बात कही थी कि वे समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सब इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं, उसीका स्पष्टीकरण किया जाता है—
अध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४७१
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥ ११ ॥
सः=वह परमात्मा; अपाणिपादः=हाथ-पैरोंसे रहित होकर भी; ग्रहीता=समस्त वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला; (तथा) जवनः=वेगपूर्वक सर्वत्र गमन करनेवाला है; अचक्षुः=आँखोंके बिना ही; पश्यति=वह सब कुछ देखता है; (और) अकर्णः=कानोंके बिना ही; शृणोति=सब कुछ सुनता है; सः=वह; वेद्यम्=जो कुछ भी जाननेमें आनेवाली वस्तुएँ हैं, उन सबको; वेत्ति=जानता है; च=परंतु; तस्य वेत्ता=उसको जाननेवाला; (कोई) न अस्ति=नहीं है; तम्=(ज्ञानी पुरुष) उसे; महान्तम्=महान्; अग्र्यम्=आदि; पुरुषम्=पुरुष; आहुः=कहते हैं ॥ ११ ॥
व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, वे परब्रह्म परमात्मा हाथोंसे रहित होनेपर भी सब जगह समस्त वस्तुओंको ग्रहण कर लेते हैं तथा पैरोंसे रहित होकर भी बड़े वेगसे इच्छानुसार सर्वत्र गमनागमन करते हैं। आँखोंसे रहित होकर भी सब जगह सब कुछ देखते हैं, कानोंसे रहित होकर भी सब जगह सब कुछ सुनते हैं। वे समस्त जाननेयोग्य और जाननेमें आनेवाले जड़-चेतन पदार्थोंको भलीभाँति जानते हैं, परंतु उनको जाननेवाला कोई नहीं है। जो सबको जाननेवाले हैं, उन्हें भला कौन जान सकता है। उनके विषयमें ज्ञानी महापुरुष कहते हैं कि वे सबके आदि, पुरातन, महान् पुरुष हैं ॥ ११ ॥
अणोरणीयान् महतो महीया- नात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्योः । तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमान्मीशम् ॥ २० ॥*
- यह मन्त्र कठ उ० १।२।२० में भी है।