ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 466, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्नं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितार- मीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥
ततः=पूर्वोक्त जीव-समुदायरूप जगत्के; परम्=परे; (और) ब्रह्मपरम्=हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ; सर्वभूतेषु=समस्त प्राणियोंमें; यथानिकायम्=उनके शरीरोंके अनुरूप होकर; गूढम्=छिपे हुए; (और) विश्वस्य परिवेष्टितारम्=सम्पूर्ण विश्वको सब ओरसे घेरे हुए; तम्=उस; बृहन्नम्=महान्, सर्वत्र व्यापक; एकम्=एकमात्र देव; ईशम्=परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; अमृताः भवन्ति=(ज्ञानीजन) अमर हो जाते हैं ॥ ७ ॥
व्याख्या —जो पहले कहे हुए जीव-समुदायरूप जगत्से और हिरण्यगर्भ नामक ब्रह्मासे भी सर्वथा श्रेष्ठ हैं, समस्त प्राणियोंमें उनके शरीरोंके अनुरूप होकर छिपे हुए हैं; समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे हुए हैं तथा सर्वत्र व्याप्त और महान् हैं, उन एकमात्र परमेश्वरको जानकर ज्ञानीजन सदाके लिये अमर हो जाते हैं; फिर कभी उनका जन्म-मरण नहीं होता ॥ ७ ॥
सम्बन्ध —अब इस मन्त्रमें ज्ञानी महापुरुषके अनुभवकी बात कहकर परमात्मज्ञानके फलकी दृढ़ता दिखलाते हैं—
वेदाहमेतं पुरुषं महान्त- मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ ८ ॥ *
तमसः परस्तात्=अविद्यारूप अन्धकारसे अतीत; (तथा) आदित्यवर्णम्=सूर्यकी भाँति स्वयंप्रकाशस्वरूप; एतम्=इस; महान्तम् पुरुषम्=महान् पुरुष (परमेश्वर) को; अहम् वेद=मैं जानता हूँ; तम्=उसको; विदित्वा=जानकर;
- यह यजुर्वेद अध्याय ३१का अठारहवाँ मन्त्र है।