ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 467, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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एव=ही; (मनुष्य) मृत्युम्=मृत्युको; अत्येति ( अति+एति )=उल्लङ्घन कर जाता है; अयनाय=(परमपदकी) प्राप्तिके लिये; अन्यः=दूसरा; पन्थाः=मार्ग; न=नहीं; विद्यते=है ॥ ८ ॥
व्याख्या —कोई ज्ञानी महापुरुष कहता है—इन महानुसे भी महान् परम पुरुषोत्तमको मैं जानता हूँ। वे अविद्यारूप अन्धकारसे सर्वथा अतीत हैं तथा सूर्यकी भाँति स्वयंप्रकाशस्वरूप हैं। उनको जानकर ही मनुष्य मृत्युका उल्लङ्घन करनेमें—इस जन्म-मृत्युके बन्धनसे सदाके लिये छुटकारा पानेमें समर्थ होता है। परमपदकी प्राप्तिके लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग अर्थात् उपाय नहीं है ॥ ८ ॥
यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चिद् यस्मात्राणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक- स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥ ९ ॥
यस्मात् परम्=जिससे श्रेष्ठ; अपरम्=दूसरा; किञ्चित्=कुछ भी; न=नहीं; अस्ति=है; यस्मात्=जिससे (बढ़कर); कश्चित्=कोई भी; न=न तो; अणीयः=अधिक सूक्ष्म; न=और न; ज्यायः=महान् ही; अस्ति=है; एकः=(जो) अकेला ही; वृक्षः इव=वृक्षकी भाँति; स्तब्धः=निश्चलभावसे; दिवि=प्रकाशमय आकाशमें; तिष्ठति=स्थित है; तेन पुरुषेण=उस परमपुरुष पुरुषोत्तमसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण जगत्; पूर्णम्=परिपूर्ण है ॥ ९ ॥
व्याख्या —उन परमदेव परमेश्वरसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है, वे सर्वश्रेष्ठ हैं। जितने भी सूक्ष्म तत्त्व हैं, उन सबसे अधिक सूक्ष्म वे ही हैं। उनसे अधिक सूक्ष्म कोई भी नहीं है। इसीसे वे छोटे-से-छोटे जीवके शरीरमें प्रविष्ट होकर स्थित हैं। इसी प्रकार जितने भी महान् व्यापक तत्त्व हैं, उन सबसे महान्—अधिक व्यापक वे परब्रह्म हैं; उनसे बड़ा—उनसे अधिक व्यापक कोई भी नहीं है। इसीसे वे प्रलयकालमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपने अंदर लीन कर लेते हैं। जो अकेले ही वृक्षकी भाँति निश्चलभावसे परम-धामरूप प्रकाशमय दिव्य