ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 468, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
आकाशमें स्थित हैं, उन परब्रह्म परमात्मासे यह समस्त जगत् व्याप्त है—वे परम पुरुष परमेश्वर ही निराकाररूपसे सारे जगत्में परिपूर्ण हैं ॥ ९ ॥
ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम् । य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १० ॥
ततः=उस पहले बताये हुए हिरण्यगर्भसे; यत्=जो; उत्तरतरम्=अत्यन्त उत्कृष्ट है; तत्=वह परब्रह्म परमात्मा; अरूपम्=आकाररहित; (और) अनामयम्=सब प्रकारके दोषोंसे शून्य है; ये=जो; एतत्=इस परब्रह्म परमात्माको; विदुः=जानते हैं; ते=वे; अमृताः=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं; अथ=परंतु; इतरे=इस रहस्यको न जानेवाले दूसरे लोग; (बार-बार) दुःखम्=दुःखको; एव=ही; अपियन्ति=प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥
व्याख्या —उस पहले बताये हुए हिरण्यगर्भसे जो सब प्रकारसे अत्यन्त उत्कृष्ट हैं, वे परब्रह्म परमात्मा आकाररहित और सब प्रकारके विकारोंसे सर्वथा शून्य हैं; जो कोई महापुरुष इन परब्रह्म परमात्माको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं—सदाके लिये जन्म-मृत्युके दुःखोंसे छूट जाते हैं। परंतु जो इन्हें नहीं जानते, वे सब लोग निश्चयपूर्वक बार-बार दुःखोंको प्राप्त होते हैं। अतः मनुष्यको सदाके लिये दुःखोंसे छूटने और परमानन्दस्वरूप परमात्माको पानेके लिये उन्हें जानना चाहिये ॥ १० ॥
सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः ।
सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात् सर्वगतः शिवः ॥ ११ ॥
सः=वह; भगवान्=भगवान्; सर्वाननशिरोग्रीवः=सब ओर मुख, सिर और ग्रीवावाला है; सर्वभूतगुहाशयः=समस्त प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें निवास करता है; (और) सर्वव्यापी=सर्वव्यापी है; तस्मात्=इसलिये; [ सः ]=वह; शिवः=कल्याणस्वरूप परमेश्वर; सर्वगतः=सब जगह पहुँचा हुआ है ॥ ११ ॥
व्याख्या —उन सर्वेश्वर भगवान्के सभी जगह मुख हैं, सभी जगह सिर और सभी जगह गला हैं। भाव यह कि वे प्रत्येक स्थानपर प्रत्येक अङ्गद्वारा