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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 469, कुल 548 में से

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पृष्ठ 469

अध्याय ३ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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किया जानेवाला कार्य करनेमें समर्थ हैं। वे समस्त प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें निवास करते हैं और सर्वव्यापी हैं, इसलिये वे कल्याणस्वरूप परमेश्वर सभी जगह पहुँचे हुए हैं। अभिप्राय यह कि साधक उनको जिस समय, जहाँ और जिस रूपमें प्रत्यक्ष करना चाहे, उसी समय, उसी जगह और उसी रूपमें वे प्रत्यक्ष हो सकते हैं ॥ ११ ॥

महान् प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः। सुनिर्मलाभिमां प्रासिमीशानो ज्योतिरव्ययः ॥ १२ ॥

वै=निश्चय ही; एषः=यह; महान्=महान्; प्रभुः=समर्थ; ईशानः=सबपर शासन करनेवाला; अव्ययः=अविनाशी; (एवं) ज्योतिः=प्रकाशस्वरूप; पुरुषः=परमपुरुष पुरुषोत्तम; इमाम् सुनिर्मलाम् प्रासिम् (प्रति)=अपनी प्रासिरूप इस अत्यन्त निर्मल लाभकी ओर; सत्त्वस्य प्रवर्तकः=अन्तःकरणको प्रेरित करनेवाला है ॥ १२ ॥

व्याख्या—निश्चय ही ये सबपर शासन करनेवाले, महान् प्रभु तथा अविनाशी और प्रकाशस्वरूप परम पुरुष पुरुषोत्तम पहले बताये हुए इस परम निर्मल लाभके प्रति अर्थात् अपने आनन्दमय विशुद्ध स्वरूपकी प्राप्तिकी ओर मनुष्यके अन्तःकरणको प्रेरित करते हैं, हरेक मनुष्यको ये अपनी ओर आकर्षित करते हैं; तथापि यह मूर्ख जीव सब प्रकारका सुयोग पाकर भी उनकी प्रेरणाके अनुसार उनकी प्राप्तिके लिये तत्परतासे चेष्टा नहीं करता, इसी कारण मारा-मारा फिरता है ॥ १२ ॥

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। हृदा मन्वीशो मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १३ ॥

अङ्गुष्ठमात्रः=(यह) अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; अन्तरात्मा=अन्तर्गामी; पुरुषः=परम पुरुष (पुरुषोत्तम); सदा=सदा ही; जनानाम्=मनुष्योंके; हृदये=हृदयमें; संनिविष्टः=सम्यक् प्रकारसे स्थित है; मन्वीशः=मनका स्वामी है; (तथा) हृदा=निर्मल हृदय; (और) मनसा=विशुद्ध मनसे; अभिक्लृप्तः=ध्यानमें लाया हुआ (प्रत्यक्ष होता है); ये=जो;