ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 470, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें४६८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
एतत्=इस परब्रह्म परमेश्वरको; विदुः=जान लेते हैं; ते=वे; अमृताः=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं ॥ १३ ॥
व्याख्या —अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाले अन्तर््यामी परमपुरुष परमेश्वर सदा ही मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं और मनके स्वामी हैं तथा निर्मल हृदय और विशुद्ध मनके द्वारा ध्यानमें लाये जाकर प्रत्यक्ष होते हैं; जो साधक इन परब्रह्म परमेश्वरको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं, अर्थात् सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं—अमृतस्वरूप बन जाते हैं। यहाँ परमात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला इसलिये बताया गया है कि मनुष्यका हृदय अँगुठेके नापका होता है और वही परमात्माकी उपलब्धिका स्थान है। ब्रह्मसूत्रमें भी इस विषयपर विचार करके यही निश्चय किया गया है (ब्र० सू० १।३।२४-२५) ॥ १३ ॥
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठदशाङ्गुलम् ॥ १४ ॥*
पुरुषः =वह परम पुरुष; सहस्रशीर्षा =हजारों सिरवाला; सहस्राक्षः =हजारों आँखवाला; सहस्रपात् =(और) हजारों पैरवाला; सः =वह; भूमिम् =समस्त जगत्को; विश्वतः =सब ओरसे; वृत्वा =घेरकर; दशाङ्गुलम् =अति=नाभिसे दस अङ्गुल ऊपर (हृदयमें); अतिष्ठत् =स्थित है ॥ १४ ॥
व्याख्या —उन परमपुरुष परमेश्वरके हजारों सिर, हजारों आँखें और हजारों पैर हैं अर्थात् सब अवयवोंसे रहित होनेपर भी उनके सिर, आँख और पैर आदि सभी अङ्ग अनन्त और असंख्य हैं। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर सर्वत्र व्याप्त हुए ही नाभिसे दस अङ्गुल ऊपर हृदयाकाशमें स्थित हैं। वे सर्वव्यापी और महान् होते हुए ही हृदयरूप एकदेशमें स्थित हैं। भाव यह कि वे अनेक विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं ॥ १४ ॥
पुरुष एवेदः सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदत्रेनातिरोहति ॥ १५ ॥†
*† ये दोनों यजुर्वेदके ३१।१,२, ऋग्वेदके १०।१०।१,२ तथा अथर्ववेदके १९।६।१,४ मन्त्र हैं।