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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

४६८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ३ ]

एतत्=इस परब्रह्म परमेश्वरको; विदुः=जान लेते हैं; ते=वे; अमृताः=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं ॥ १३ ॥

व्याख्या —अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाले अन्तर््यामी परमपुरुष परमेश्वर सदा ही मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं और मनके स्वामी हैं तथा निर्मल हृदय और विशुद्ध मनके द्वारा ध्यानमें लाये जाकर प्रत्यक्ष होते हैं; जो साधक इन परब्रह्म परमेश्वरको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं, अर्थात् सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं—अमृतस्वरूप बन जाते हैं। यहाँ परमात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला इसलिये बताया गया है कि मनुष्यका हृदय अँगुठेके नापका होता है और वही परमात्माकी उपलब्धिका स्थान है। ब्रह्मसूत्रमें भी इस विषयपर विचार करके यही निश्चय किया गया है (ब्र० सू० १।३।२४-२५) ॥ १३ ॥

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्रपात्।

स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठदशाङ्गुलम् ॥ १४ ॥*

पुरुषः =वह परम पुरुष; सहस्रशीर्षा =हजारों सिरवाला; सहस्राक्षः =हजारों आँखवाला; सहस्रपात् =(और) हजारों पैरवाला; सः =वह; भूमिम् =समस्त जगत्को; विश्वतः =सब ओरसे; वृत्वा =घेरकर; दशाङ्गुलम् =अति=नाभिसे दस अङ्गुल ऊपर (हृदयमें); अतिष्ठत् =स्थित है ॥ १४ ॥

व्याख्या —उन परमपुरुष परमेश्वरके हजारों सिर, हजारों आँखें और हजारों पैर हैं अर्थात् सब अवयवोंसे रहित होनेपर भी उनके सिर, आँख और पैर आदि सभी अङ्ग अनन्त और असंख्य हैं। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर सर्वत्र व्याप्त हुए ही नाभिसे दस अङ्गुल ऊपर हृदयाकाशमें स्थित हैं। वे सर्वव्यापी और महान् होते हुए ही हृदयरूप एकदेशमें स्थित हैं। भाव यह कि वे अनेक विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं ॥ १४ ॥

पुरुष एवेदः सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्।

उतामृतत्वस्येशानो यदत्रेनातिरोहति ॥ १५ ॥†

*† ये दोनों यजुर्वेदके ३१।१,२, ऋग्वेदके १०।१०।१,२ तथा अथर्ववेदके १९।६।१,४ मन्त्र हैं।

अध्याय ३ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४६९

यत्=जो; भूतम्=अबसे पहले हो चुका है; यत्=जो; भव्यम्=भविव्यमें होनेवाला है; च=और; यत्=जो; अत्रेन=खाद्य पदार्थोंसे; अतिरोहति=इस समय बढ़ रहा है; इदम्=यह; सर्वम्=समस्त जगत्; पुरुषः एव=परम पुरुष परमात्मा ही है; उत=और; (वही) अमृतत्वस्य=अमृतस्वरूप मोक्षका; ईशानः=स्वामी है ॥ १५ ॥

व्याख्या —जो अबसे पहले हो चुका है, जो भविव्यमें होनेवाला है और जो वर्तमान कालमें अत्रके द्वारा अर्थात् खाद्य पदार्थोंके द्वारा बढ़ रहा है, वह समस्त जगत् परम पुरुष परमात्माका ही स्वरूप है। वे स्वयं ही अपनी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिसे इस रूपमें प्रकट होते हैं तथा वे ही अमृतस्वरूप मोक्षके स्वामी हैं अर्थात् जीवोंको संसार-बन्धनसे छुड़ाकर अपनी प्राप्ति करा देते हैं। अतएव उनकी प्राप्तिके अभिलाषी साधकोंको उन्हींकी शरणमें जाना चाहिये ॥ १५ ॥

सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।

सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १६ ॥

तत्=वह परम पुरुष परमात्मा; सर्वतः पाणिपादम्=सब जगह हाथ-पैरवाला; सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्=सब जगह आँख, सिर और मुखवाला; (तथा) सर्वतः श्रुतिम्=सब जगह कानोंवाला है; (वही) लोके=ब्रह्माण्डमें; सर्वम्=सबको; आवृत्य=सब ओरसे घेरकर; तिष्ठति=स्थित है ॥ १६ ॥

व्याख्या —उन परमात्माके हाथ, पैर, आँखें, सिर, मुख और कान सब जगह हैं। वे सब जगह सब शक्तियोंसे सब कार्य करनेमें समर्थ हैं। उन्होंने सभी जगह अपने भक्तोंकी रक्षा करने तथा उन्हें अपनी ओर खींचनेके लिये हाथ बढ़ा रखा है। उनका भक्त उन्हें जहाँ चाहता है, वहाँ उन्हें पहुँचा हुआ पाता है। वे सब जगह सब जीवोंद्वारा किये जानेवाले कर्मोंको देख रहे हैं। उनका भक्त जहाँ उन्हें प्रणाम करता है, सर्वत्र व्याप्त होनेके कारण उनके चरण और सिर आदि अङ्ग वहाँ मौजूद रहते हैं। अपने भक्तकी प्रार्थना सुननेके लिये उनके कान सर्वत्र हैं और अपने भक्तद्वारा अर्पण की हुई वस्तुका भोग लगानेके लिये उनका मुख भी सर्वत्र विद्यमान है। वे परमेश्वर इस ब्रह्माण्डमें सबको सब ओरसे घेरकर स्थित हैं—इस बातपर विश्वास करके मनुष्यको उनकी सेवामें लग जाना चाहिये। यह मन्त्र गीतामें भी इसी रूपमें आया है (१३।१३) ॥ १६ ॥

४७०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ३ ]

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥ १७ ॥

(जो परम पुरुष परमात्मा) सर्वेन्द्रियविवर्जितम्=समस्त इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी; सर्वेन्द्रियगुणाभासम्=समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है; (तथा) सर्वस्य=सबका; प्रभुम्=स्वामी; सर्वस्य=सबका; ईशानम्=शासक; (और) बृहत्=सबसे बड़ा; शरणम्=आश्रय है ॥ १७ ॥

व्याख्या—जो सर्वशक्तिमान् परम पुरुष परमात्मा समस्त इन्द्रियोंसे रहित—देहेन्द्रियादि-भेदसे शून्य होनेपर भी समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं तथा सबके स्वामी, परम समर्थ, सबका शासन करनेवाले और जीवके लिये सबसे बड़े आश्रय हैं, मनुष्यको सर्वतोभावसे उन्हीकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। यही मनुष्य-शरीरका अच्छे-से-अच्छा उपयोग है। इस मन्त्रका पूर्वाङ्ग गीतामें ज्यों-का-त्यों आया है (१३।१४) ॥ १७ ॥

नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥ १८ ॥

सर्वस्य=सम्पूर्ण; स्थावरस्य=स्थावर; च=और; चरस्य=जंगम; लोकस्य वशी=जगत्को वशमें रखनेवाला; हंसः=वह प्रकाशमय परमेश्वर; नवद्वारे=नौ द्वारवाले; पुरे=शरीररूपी नगरमें; देही=अन्तर््यामीरूपसे हृदयमें स्थित देही है; (तथा वही) बहिः=बाह्य जगत्में भी; लेलायते=लीला कर रहा है ॥ १८ ॥

व्याख्या—सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम जीवोंके समुदायरूप इस जगत्को अपने वशमें रखनेवाले वे प्रकाशमय परमेश्वर दो आँख, दो कान, दो नासिका, एक मुख, एक गुदा और एक उपस्थ—इस प्रकार नौ दरवाजोंवाले मनुष्य-शरीररूप नगरमें अन्तर््यामीरूपसे स्थित हैं और वे ही इस बाह्य जगत्में भी लीला कर रहे हैं यों समझकर मन जहाँ सुगमतासे स्थिर हो सके, वहीं उनका ध्यान करना चाहिये ॥ १८ ॥

सम्बन्ध—पहले जो यह बात कही थी कि वे समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सब इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं, उसीका स्पष्टीकरण किया जाता है—

अध्याय ३ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४७१

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥ ११ ॥

सः=वह परमात्मा; अपाणिपादः=हाथ-पैरोंसे रहित होकर भी; ग्रहीता=समस्त वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला; (तथा) जवनः=वेगपूर्वक सर्वत्र गमन करनेवाला है; अचक्षुः=आँखोंके बिना ही; पश्यति=वह सब कुछ देखता है; (और) अकर्णः=कानोंके बिना ही; शृणोति=सब कुछ सुनता है; सः=वह; वेद्यम्=जो कुछ भी जाननेमें आनेवाली वस्तुएँ हैं, उन सबको; वेत्ति=जानता है; च=परंतु; तस्य वेत्ता=उसको जाननेवाला; (कोई) न अस्ति=नहीं है; तम्=(ज्ञानी पुरुष) उसे; महान्तम्=महान्; अग्र्यम्=आदि; पुरुषम्=पुरुष; आहुः=कहते हैं ॥ ११ ॥

व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, वे परब्रह्म परमात्मा हाथोंसे रहित होनेपर भी सब जगह समस्त वस्तुओंको ग्रहण कर लेते हैं तथा पैरोंसे रहित होकर भी बड़े वेगसे इच्छानुसार सर्वत्र गमनागमन करते हैं। आँखोंसे रहित होकर भी सब जगह सब कुछ देखते हैं, कानोंसे रहित होकर भी सब जगह सब कुछ सुनते हैं। वे समस्त जाननेयोग्य और जाननेमें आनेवाले जड़-चेतन पदार्थोंको भलीभाँति जानते हैं, परंतु उनको जाननेवाला कोई नहीं है। जो सबको जाननेवाले हैं, उन्हें भला कौन जान सकता है। उनके विषयमें ज्ञानी महापुरुष कहते हैं कि वे सबके आदि, पुरातन, महान् पुरुष हैं ॥ ११ ॥

अणोरणीयान् महतो महीया- नात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्योः । तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमान्मीशम् ॥ २० ॥*

  • यह मन्त्र कठ उ० १।२।२० में भी है।

४७२ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय ३

अणोः अणीयान्=(वह) सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म; (तथा) महतो महीयान्=बड़ेसे भी बहुत बड़ा; आत्मा=परमात्मा; अस्य जन्तोः=इस जीवकी; गुहायाम्=हृदयरूप गुफामें; निहितः=छिपा हुआ है; धातुः=सबकी रचना करनेवाले परमेश्वरकी; प्रसादात्=कृपासे; (जो मनुष्य) तम्=उस; अक्रतुम्=संकल्परहित; ईशम्=परमेश्वरको; (और) महिमानम्=उसकी महिमाको; पश्यति=देख लेता है; (वह) वीतशोकः=सब प्रकारके दुःखोंसे रहित (हो जाता है) ॥ २० ॥

**व्याख्या—**वे सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म और बड़ेसे भी बहुत बड़े परब्रह्म परमात्मा इस जीवकी हृदयरूप गुफामें छिपे हुए हैं। सबकी रचना करनेवाले उन परमेश्वरकी कृपासे ही मनुष्य उन स्वार्थके संकल्पसे सर्वथा रहित अकारण कृपा करनेवाले परम सुहृद् परमेश्वरको और उनकी महिमाको जान सकता है। जब उन परम दयालु परम सुहृद् परमेश्वरका यह साक्षात् कर लेता है, तब सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे रहित होकर उन परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है॥ २०॥

वेदाहमेतमजरं पुराणं
सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात्।
जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य
ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम्॥ २१॥

ब्रह्मवादिनः=वेदके रहस्यका वर्णन करनेवाले महापुरुष; यस्य=जिसके; जन्मनिरोधम्=जन्मका अभाव; प्रवदन्ति=बतलाते हैं; [ यम् ]=तथा जिसको; नित्यम्=नित्य; प्रवदन्ति=बतलाते हैं; एतम्=इस; विभुत्वात्=व्यापक होनेके कारण; सर्वगतम्=सर्वत्र विद्यमान; सर्वात्मानम्=सबके आत्मा; अजरम्=जरा, मृत्यु आदि विकारोंसे रहित; पुराणम्=पुराणपुरुष परमेश्वरको; अहम्=मैं; वेद=जानता हूँ॥ २१॥

**व्याख्या—**परमात्माको प्राप्त हुए महात्माका कहना है कि 'वेदके रहस्यका वर्णन करनेवाले महापुरुष जिन्हें जन्मरहित तथा नित्य बताते हैं, व्यापक होनेके कारण जो सर्वत्र विद्यमान हैं—जिनसे कोई भी स्थान खाली नहीं है, जो जरा-

अध्याय ४ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४७३

मृत्यु आदि समस्त विकारोंसे सर्वथा रहित हैं और सबके आदि—पुराणपुरुष हैं, उन सबके आत्मा—अन्तर्यामी परब्रह्म परमेश्वरको मैं जानता हूँ ॥ २१ ॥

॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥

चतुर्थ अध्याय

य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद् वर्णानेकान् निहितार्थो दधाति ।

वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः

स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ १ ॥

यः=जो; अवर्णः=रंग, रूप आदिसे रहित होकर भी; निहितार्थः=छिपे हुए प्रयोजनवाला होनेके कारण; बहुधा शक्तियोगात्=विविध शक्तियोंके सम्बन्धसे; आदौ=सृष्टिके आदिमें; अनेकान्=अनेक; वर्णान्=रूप-रंग; दधाति=धारण कर लेता है; च=तथा; अन्ते=अन्तमें; विश्वम्=यह सम्पूर्ण विश्व; (जिसमें) व्येति (वि+एति) च=विलीन भी हो जाता है; सः=वह; देवः=परमदेव (परमात्मा); एकः=एक (अद्वितीय) है; सः=वह; नः=हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या=शुभ बुद्धिसे; संयुनक्तु=संयुक्त करें ॥ १ ॥

व्याख्या—जो परब्रह्म परमात्मा अपने निराकार स्वरूपमें रूप-रंग आदिसे रहित होकर भी सृष्टिके आदिमें किसी रहस्यपूर्ण प्रयोजनके कारण अपनी स्वरूपभूत नाना प्रकारकी शक्तियोंके सम्बन्धसे अनेक रूप-रंग आदि धारण करते हैं तथा अन्तमें यह सम्पूर्ण जगत् जिनमें विलीन भी हो जाता है—अर्थात् जो बिना किसी अपने प्रयोजनके जीवोंका कल्याण करनेके लिये ही उनके कर्मानुसार इस नाना रंग-रूपवाले जगत्की रचना, पालन और संहार करते हैं और समय-समयपर आवश्यकतानुसार अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं, वे परमदेव परमेश्वर वास्तवमें एक—अद्वितीय हैं। उनके अतिरिक्त कुछ नहीं है। वे हमें शुभ बुद्धिसे युक्त करें ॥ १ ॥

४७४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ४ ]

सम्बन्ध —इस प्रकार प्रार्थना करनेका प्रकार बताया गया। अब तीन मन्त्रोंद्वारा परमेश्वरका जगत्के रूपमें चिन्तन करते हुए उनकी स्तुति करनेका प्रकार बतलाया जाता है—

तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्लं तद्ब्रह्म तदापस्तत् प्रजापतिः ॥ २ ॥*

तत् एव=वही; अग्निः=अग्नि है; तत्=वह; आदित्यः=सूर्य है; तत्=वह; वायुः=वायु है; उ=तथा; तत्=वही; चन्द्रमाः=चन्द्रमा हैं; तत्=वह; शुक्लम्=अन्यान्य प्रकाशयुक्त नक्षत्र आदि है; तत्=वह; आपः=जल है; तत्=वह; प्रजापतिः=प्रजापति है; (और) तत् एव=वही; ब्रह्म=ब्रह्मा है ॥ २ ॥

व्याख्या —वे परब्रह्म ही अग्नि, जल, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, अन्यान्य प्रकाशमय नक्षत्र आदि प्रजापति और ब्रह्मा हैं। ये सब उन एक अद्वितीय परब्रह्म परमेश्वरकी ही विभूतियाँ हैं। इन सबके अन्तर्यामी आत्मा वे ही हैं, अतः ये सब उन्हींके स्वरूप हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्के रूपमें उन परमात्माका चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥

त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥ ३ ॥†

त्वम्=तू; स्त्री=स्त्री है; त्वम्=तू; पुमान्=पुरुष है; त्वम्=तू ही; कुमारः=कुमार; उत वा=अथवा; कुमारी=कुमारी; असि=है; त्वम्=तू; जीर्णः=बूढ़ होकर; दण्डेन=लाठीके सहारे; वञ्चसि=चलता है; [ उ ]=तथा; त्वम्=तू ही; जातः=विराट् रूपमें प्रकट होकर; विश्वतोमुखः=सब ओर मुख-वाला; भवसि=हो जाता है ॥ ३ ॥

व्याख्या —हे सर्वेश्वर! आप स्त्री, पुरुष, कुमार, कुमारी आदि अनेक रूपोंवाले हैं—अर्थात् इन सबके रूपमें आप ही प्रकट हो रहे हैं। आप ही बूढ़े

  • यह मन्त्र यजुर्वेद ३२।१ में भी आया है।

† यह अथर्ववेद काण्ड १० सूक्त ८ का २७ वाँ मन्त्र है।

अध्याय ४ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४७५

होकर लाठीके सहारे चलते हैं अर्थात् आप ही बुड़ढोंके रूपमें अभिव्यक्त हैं। हे परमात्मन्! आप ही विराट् रूपमें प्रकट होकर सब ओर मुख किये हुए हैं, अर्थात् सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है। जगत्में जितने भी मुख दिखायी देते हैं, सब आपके ही हैं ॥ ३ ॥

नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्ष- स्तडिदग्धं ऋतवः समुद्राः । अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा ॥ ४ ॥

[ त्वम् एव ]=तू ही; नीलः=नीलवर्ण; पतङ्गः=पतङ्ग है; हरितः=हरे रंगका; (और) लोहिताक्षः=लाल आँखोंवाला (पक्षी है एवं); तडिदग्धः=मेघ; ऋतवः=वसन्त आदि ऋतुएँ; (तथा) समुद्राः=सप्त समुद्ररूप है; यतः=क्योंकि; [ त्वत्तः एव ]=तुझसे ही; विश्वा=सम्पूर्ण; भुवनानि=लोक; जातानि=उत्पन्न हुए हैं; त्वम्=तू ही; अनादिमत्त्वं=अनादि (प्रकृतियों) का स्वामी; (और) विभुत्वेन=व्यापकरूपसे; वर्तसे=सबमें विद्यमान हैं ॥ ४ ॥

व्याख्या—हे सर्वान्तर््यामिन्! आप ही नीले रंगके पतङ्ग (भौर) तथा हरे रंग और लाल आँखोंवाले पक्षी—तोते हैं; आप ही बिजलीसे युक्त मेघ हैं, वसन्तादि सब ऋतुएँ और सातों समुद्र भी आपके ही रूप हैं। अर्थात् इन नाना प्रकारके रंग-रूपवाले समस्त जड-चेतन पदार्थोंके रूपमें मैं आपको ही देख रहा हूँ; क्योंकि आपसे ही ये समस्त लोक और उनमें निवास करनेवाले सम्पूर्ण जीव-समुदाय प्रकट हुए हैं। व्यापकरूपसे आप ही सबमें विद्यमान हैं तथा अत्यक्त एवं जीवरूप अपनी दो अनादि प्रकृतियोंके (जिन्हें गीतामें अपरा और परा नामोंसे कहा गया है) स्वामी भी आप ही हैं। अतः एकमात्र आपको ही मैं सबके रूपमें देखता हूँ ॥ ४ ॥

सम्बन्ध—पूर्व मन्त्रमें परब्रह्म परमेश्वरको जिन दो प्रकृतियोंका स्वामी बताया गया है, वे दोनों अनादि प्रकृतियाँ कौन-सी हैं—इसका स्पष्टीकरण किया जाता है—

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ४ ]

अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ ५ ॥

सरूपाः=अपने ही सदृश अर्थात् त्रिगुणमय; बह्वीः=बहुत-से; प्रजाः=भूत-समुदायोंको; सृजमानाम्=रचनेवाली; (तथा) लोहितशुक्लकृष्णाम्=लाल, सफेद और काले रंगकी अर्थात् त्रिगुणमयी; एकाम्=एक; अजाम्=अजा (अजन्मा—अनादि प्रकृति)को; हि=निश्चय ही; एकः अजः=एक अजन्मा (अज्ञानी जीव); जुषमाणः=आसक्त हुआ; अनुशेते=भोगता है; (और) अन्यः=दूसरा; अजः=अज (ज्ञानी महापुरुष); एनाम्=इस; भुक्तभोगाम्=भोगी हुई प्रकृतिको; जहाति=त्याग देता है ॥ ५ ॥

व्याख्या—पिछले मन्त्रमें जिनका संकेत किया गया है; उन दो प्रकृतियोंमेंसे एक तो वह है, जिसका गीतामें अपरा नामसे उल्लेख हुआ है तथा जिसके आठ भेद किये गये हैं (गीता ७।४)। यह अपने अधिष्ठाता परमदेव परमेश्वरकी अध्यक्षतामें अपने ही सदृश अर्थात् त्रिगुणमय असंख्य जीवदेहोंको उत्पन्न करती है। त्रिगुणमयी अथवा त्रिगुणात्मिका होनेसे इसे तीन रंगवाली कहा गया है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही इसके तीन रंग हैं। सत्त्वगुण निर्मल एवं प्रकाशक होनेसे उसे श्वेत माना गया है। रजोगुण रागात्मक है, अतएव उसका रंग लाल माना गया है तथा तमोगुण अज्ञानरूप एवं आवरक होनेसे उसे कृष्णवर्ण कहा गया है। इन तीन गुणोंको लेकर ही प्रकृतिको सफेद, लाल एवं काले रंगकी कहा गया। दूसरी जिसका गीतामें जीवरूप परा अथवा चेतन प्रकृतिके नामसे (७।५), क्षेत्रज्ञके नामसे (१३।१) तथा अक्षर-पुरुषके नामसे (१५।१६) वर्णन किया गया है, उसके दो भेद हैं। एक तो वे जीव, जो उस अपरा प्रकृतिमें आसक्त होकर— उसके साथ एकरूप होकर उसके विचित्र भोगोंको अपने कर्मानुसार भोगते हैं। दूसरा समुदाय उन ज्ञानी महापुरुषोंका है, जिन्होंने इसके भोगोंको भोगकर इसे निःसार और क्षणभङ्गुर समझकर इसका

अध्याय ४ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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सर्वथा परित्याग कर दिया है। ये दोनों प्रकारके जीव स्वरूपतः अजन्मा तथा अनादि हैं। इसीलिये इन्हें 'अज' कहा गया है ॥५॥*

सम्बन्ध— वह परा प्रकृतिरूप जीवसमुदाय, जो इस प्रकृतिके भोगोंको भोगता है, कब और कैसे मुक्त हो सकता है—इस जिज्ञासापर दो मन्त्रोंमें कहते हैं—

द्व्वासुपर्णासयुजासखाया
समानंवृक्षंपरिषस्वजाते ।
तयोरन्यःपिप्पलंस्वाद्भृत्य-
नश्नन्नन्योअभिचाकशीति ॥ ६ ॥

सयुजा=सदा साथ रहनेवाले; (तथा) सखाया=परस्पर सख्यभाव रखनेवाले; द्व्वा=दो; सुपर्णा=पक्षी (जीवात्मा एवं परमात्मा); समानम्=एक ही; वृक्षम् परिषस्वजाते=वृक्ष (शरीर)का आश्रय लेकर रहते हैं; तयोः=उन दोनोंमेंसे; अन्यः=एक (जीवात्मा) तो; पिप्पलम्=उस वृक्षके फलों (कर्मफलों) को; स्वाद्=स्वाद ले-लेकर; अति=खाता है; अन्यः=(किंतु) दूसरा (ईश्वर); अनश्नन्=उनका उपभोग न करता हुआ; अभिचाकशीति=केवल देखता रहता है ॥६॥

व्याख्या— जिस प्रकार गीता आदिमें जगत्का अश्वत्थ-वृक्षके रूपमें वर्णन किया गया है, उसी प्रकार इस मन्त्रमें शरीरको अश्वत्थ-वृक्षका और जीवात्मा तथा परमात्माको पक्षियोंका रूप देकर वर्णन किया गया है। इसी प्रकार

  • सांख्यमतावलम्बियोंने इस मन्त्रको सांख्यशास्त्रका बीज माना है और इसीके आधारपर उक्त दर्शनको श्रुतिसम्मत सिद्ध किया है। सांख्यकारिकाके प्रसिद्ध टीकाकार तथा अन्य दर्शनोंके व्याख्याता सर्वतन्त्रस्वतन्त्र स्वनामधन्य श्रीवाचस्पति मिश्रने अपनी सांख्य-तत्त्वकौमुदी नामक टीकाके आरम्भमें इसी मन्त्रको कुछ परिवर्तनके साथ मङ्गलाचरणके रूपमें उद्धृत करते हुए इसमें वर्णित प्रकृतिकी वन्दना की है। यहाँ काव्यमयी भाषामें प्रकृतिको एक तिरंगी बकरीके रूपमें चित्रित किया गया है, जो बड़जीवरूप बकरेके संयोगसे अपनी ही जैसी तिरंगी—त्रिगुणमयी संतान उत्पन्न करती है। संस्कृतमें 'अजा' बकरीको भी कहते हैं। इसी श्लेषका उपयोग करके प्रकृतिका आलङ्कारिक रूपमें वर्णन किया गया है।

† यह मन्त्र अथर्ववेद काण्ड ९ सूक्त १४ का २० वें है तथा ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त १६४ का २० वें है।

४७८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ४ ]

कठोपनिषद्में जीवात्मा और परमात्माको गुहामें प्रविष्ट छाया और धूपके रूपमें बताकर वर्णन किया गया है (कठ १।३।१)। दोनों जगहका भाव प्रायः एक ही है। यहाँ मन्त्रका सारांश यह है कि यह मनुष्य-शरीर मानो एक पीपलका वृक्ष है। ईश्वर और जीव—ये दोनों सदा साथ रहनेवाले दो मित्र मानो दो पक्षी हैं। ये दोनों इस शरीररूप वृक्षमें एक साथ एक ही हृदयरूप घोंसलेमें निवास करते हैं। शरीरमें रहते हुए प्रारब्धानुसार जो सुख-दुःखरूप कर्मफल प्राप्त होते हैं, वे ही मानो इस पीपलके फल हैं। इन फलोंको जीवात्मारूप एक पक्षी तो स्वादपूर्वक खाता है। अर्थात् हर्ष-शोकका अनुभव करते हुए कर्मफलको भोगता है। दूसरा ईश्वररूप पक्षी इन फलोंको खाता नहीं, केवल देखता रहता है अर्थात् इस शरीरमें प्राप्त हुए सुख-दुःखोंको वह भोगता नहीं, केवल उनका साक्षी बना रहता है। परमात्माकी भाँति यदि जीवात्मा भी इनका द्रष्टा बन जाय तो फिर उसका इनसे कोई सम्बन्ध न रह जाय। ऐसे ही जीवात्माके सम्बन्धमें पिछले मन्त्रमें यह कहा गया है कि वह प्रकृतिका उपभोग कर चुकनेके बाद उसे निःसार समझकर उसका परित्याग कर देता है, उससे मुँह मोड़ लेता है। उसके लिये फिर प्रकृति अर्थात् जगत्की सत्ता ही नहीं रह जाती। फिर तो वह और उसका मित्र—दो ही रह जाते हैं और परस्पर मित्रताका आनन्द लूटते हैं। यही इस मन्त्रका तात्पर्य मालूम होता है। मुण्डक० ३।१।१ में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है ॥६॥

समानेवृक्षेपुरुषोनिमग्नो-
उनीशयाशोचतिमुह्यमानः।
जुष्टंयदापश्यत्यन्यमीश-
मस्यमहिमानमितिवीतशोकः ॥७॥

समाने वृक्षे=पूर्वोक्त शरीररूप एक ही वृक्षपर रहनेवाला; पुरुषः=जीवात्मा; निमग्नः=गहरी आसक्तिमें डूबा हुआ है; (अतः) अनीशया=असमर्थ होनेके कारण (दीनतापूर्वक); मुह्यमानः=मोहित हुआ; शोचति=शोक करता रहता है; यदा=जब (यह भगवान्की अहैतुकी दयासे); जुष्टम्=भक्तोंद्वारा नित्य सेवित; अन्यम्=अपनेसे

अध्याय ४ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४७९

भिन्न; ईशम्=परमेश्वरको; (और) अस्य=उसकी; महिमानम्=आश्चर्यमयी महिमाको; पश्यति=प्रत्यक्ष देख लेता है; इति=तब; वीतशोकः=सर्वथा शोकरहित; [ भवति ]=हो जाता है ॥७॥

व्याख्या —पहले बतलाये हुए इस शरीररूप एक ही वृक्षपर हृदयरूप घोंसलेमें परमात्माके साथ रहनेवाला यह जीवात्मा जबतक अपने साथ रहनेवाले परम सुहृद परमेश्वरकी ओर नहीं देखता, इस शरीरमें ही आसक्त होकर मोहमें निमग्न रहता है, अर्थात् शरीरमें अत्यन्त ममता करके उसके द्वारा भोगोंका उपभोग करनेमें ही रचा-पचा रहता है, तबतक असमर्थता और दीनतासे मोहित हुआ नाना प्रकारके दुःखोंको भोगता रहता है। जब कभी इसपर भगवान्की अहेतुकी दया होती है, तब यह अपनेसे भिन्न, अपने ही साथ रहनेवाले, परम सुहृद, परम प्रिय भगवान्को पहचान पाता है। जो भक्तजनोंद्वारा निरन्तर सेवित हैं, उन परमेश्वरको तथा उनकी आश्चर्यमयी महिमाको, जो जगत्में सर्वत्र भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्रकट हो रही है, जब यह देख लेता है, उस समय तत्काल ही सर्वथा शोकरहित हो जाता है। मुण्डक० ३।१।२ में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है ॥७॥

ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः। यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत् तद् विदुस्त इमे समासते ॥८॥*

यस्मिन्=जिसमें; विश्वे=समस्त; देवाः=देवगण; अधि=भलीभाँति; निषेदुः=स्थित हैं; [ तस्मिन् ]=उस; अक्षरे=अविनाशी; परमे व्योमन्=परम व्योम (परम धाम)में; ऋचः=सम्पूर्ण वेद स्थित हैं; यः=जो मनुष्य; तम्=उसको; न=नहीं; वेद=जानता; [ सः ]=वह; ऋचा=वेदोंके द्वारा; किम्=क्या; करिष्यति=सिद्ध करेगा; इत्=परंतु;

  • यह मन्त्र ऋग्वेद मण्डल १ सू० १६४ का उन्चालीसवॉँ है तथा अथर्ववेद (९।१५।१८) में भी है।

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ४ ]

ये=जो; तत्=उसको; विदुः=जानते हैं; ते=वे तो; इमे=ये; समासते=सम्यक् प्रकारसे उसीमें स्थित हैं ॥ ८ ॥

व्याख्या —परब्रह्म परमेश्वरके जिस अविनाशी दिव्य चेतन परम आकाशस्वरूप परमधामसे समस्त देवगण अर्थात् उन परमात्माके पार्षदगण उन परमेश्वरकी सेवा करते हुए निवास करते हैं, वही समस्त वेद भी पार्षदोंके रूपमें मूर्तिमान् होकर भगवान्की सेवा करते हैं। जो मनुष्य उस परमधाममें रहनेवाले परब्रह्म पुरुषोत्तमको नहीं जानता और इस रहस्यको भी नहीं जानता कि समस्त वेद उन परमात्माकी सेवा करनेवाले उन्हींके अङ्गभूत पार्षद हैं, वह वेदोंके द्वारा अपना क्या प्रयोजन सिद्ध करेगा? अर्थात् कुछ सिद्ध नहीं कर सकेगा। परंतु जो उन परमात्माको तत्त्वसे जान लेते हैं, वे तो उस परमधाममें ही सम्यक् प्रकारसे स्थित रहते हैं, अर्थात् वहाँसे कभी नहीं लौटते ॥ ८ ॥

छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति। अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ९ ॥

छन्दांसि =छन्द; यज्ञाः =यज्ञ; क्रतवः =क्रतु (ज्योतिष्टोम आदि विशेष यज्ञ); व्रतानि =नाना प्रकारके व्रत; =तथा; यत् =और भी जो कुछ; भूतम् =भूत; भव्यम् =भविष्य एवं वर्तमानरूपसे; वेदाः =वेद; वदन्ति =वर्णन करते हैं; एतत् =विश्वम्=इस सम्पूर्ण जगत्को; मायी =प्रकृतिका अधिपति परमेश्वर; अस्मात् =इस (पहले बताये हुए महाभूतादि तत्त्वोंके समुदाय) से; सृजते =रचता है; =तथा; अन्यः =दूसरा (जीवात्मा); तस्मिन् =उस प्रपञ्चमें; मायया =मायाके द्वारा; संनिरुद्धः =भलीभाँति बँधा हुआ है ॥ ९ ॥

व्याख्या —जो समस्त वेदमन्त्र रूप छन्द, यज्ञ, क्रतु अर्थात् ज्योतिष्टोमादि विशेष यज्ञ, नाना प्रकारके व्रत अर्थात् शुभकर्म, सदाचार और उनके नियम हैं तथा और भी जो कुछ भूत, भविष्य, वर्तमान पदार्थ हैं, जिनका वर्णन वेदोंमें पाया जाता है—इन सबको वे प्रकृतिके अधिष्ठाता परमेश्वर ही अपने अंशभूत

अध्याय ४ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४८१

इस पहले बताये हुए पञ्चभूत आदि तत्त्वसमुदायसे रचते हैं; इस प्रकार रचे हुए उस जगत्में अन्य अर्थात् पहले बताये हुए ज्ञानी महापुरुषोंसे भिन्न जीवसमुदाय मायाके द्वारा बँधा हुआ है। जबतक वह अपने स्वामी परमदेव परमेश्वरको साक्षात् नहीं कर लेता, तबतक उसका इस प्रकृतिसे छुटकारा नहीं हो सकता; अतः मनुष्यको उन परमात्माको जानने और पानेकी उत्कट अभिलाषा रखनी चाहिये ॥ ९ ॥

मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्। तस्यावयवभूतैस्तु व्यासं सर्वमिदं जगत् ॥ १० ॥

मायाम्=माया; तु=तो; प्रकृतिम्=प्रकृतिको; विद्यात्=समझना चाहिये; तु=और; मायिनम्=मायापति; महेश्वरम्=महेश्वरको समझना चाहिये; तस्य तु=उसीके; अवयवभूतैः=अङ्गभूत कारण-कार्य-समुदायसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण; जगत्=जगत्; व्यासम्=व्यास हो रहा है ॥ १० ॥

व्याख्या —इस प्रकारणमें जिसका मायाके नामसे वर्णन हुआ है, वह तो भगवान्की शक्तिरूपा प्रकृति है और उस माया नामसे कही जानेवाली शक्तिरूपा प्रकृतिका अधिपति परब्रह्म परमात्मा महेश्वर है; इस प्रकार इन दोनोंको अलग-अलग समझना चाहिये। उस परमेश्वरकी शक्तिरूपा प्रकृतिके ही अङ्गभूत कारण-कार्य-समुदायसे यह सम्पूर्ण जगत् व्यास हो रहा है ॥ १० ॥

यो योनिं योनिमधिष्ठित्युत्प्रेको यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम्। तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाव्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ ११ ॥

यः=जो; एकः=अकेला ही; योनिम् योनिम् अधिष्ठितः=प्रत्येक योनि का अधिष्ठाता हो रहा है; यस्मिन्=जिसमें; इदम्=यह; सर्वम्=समस्त जगत्; समेति=प्रलयकालमें विलीन हो जाता है; च=और; व्येति च=सृष्टिकालमें विविध रूपोंमें प्रकट भी हो जाता है; तम्=उस; ईशानम्=सर्वनिशन्ता; वरदम्=वरदायक; ईड्यम्=स्तुति करनेयोग्य; देवम्=परमदेव परमेश्वरको; निचाव्यम्=तत्त्वसे जानकर;

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ४ ]

(मनुष्य) अत्यन्तम्-निरन्तर बनी रहनेवाली; इमाम्-इस (मुक्तिरूप); शान्तिम्-परम शान्तिको; एति-प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥

व्याख्या —परब्रह्म परमेश्वर प्रत्येक योनिके एकमात्र अध्यक्ष हैं— जगत्में जितने प्रकारके कारण माने जाते हैं, उन सबके अधिष्ठाता हैं। उनमें किसी कार्यको उत्पन्न करनेकी शक्ति उन्हीं सर्वकारण परमात्माकी है और उन्हींकी अध्यक्षतामें वे उन-उन कार्योंको उत्पन्न करते हैं। वे परमेश्वर ही उन सबपर शासन करते हैं—उनकी यथायोग्य व्यवस्था करते हैं। यह समस्त जगत् प्रलयके समय उनमें विलीन हो जाता है तथा पुनः सृष्टिकालमें उन्हींसे विविध रूपोंमें उत्पन्न हो जाता है। उन सर्वनियन्ता, वरदायक, एकमात्र स्तुति करनेयोग्य परमदेव, सर्वसुहृद, सर्वेश्वर परमात्माको जानकर यह जीव निरन्तर बनी रहनेवाली परमनिर्वाणरूप शान्तिको प्राप्त हो जाता है। गीतामें इसका शाश्वती शान्ति (गीता १।३१), परा शान्ति (गीता १८।६२) आदि नामोंसे भी वर्णन आता है ॥ ११ ॥

यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्ववाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं स नो बुद्ध्या शुभया संयुक्तु ॥ १२ ॥

यः=जो; रुद्रः=रुद्र; देवानाम्=इन्द्रादि देवताओंको; प्रभवः=उत्पन्न करनेवाला; च=और; उद्भवः=बढ़ानेवाला है; च=तथा; (जो) विश्ववाधिपः=सबका अधिपति; महर्षिः=(और) महान् ज्ञानी (सर्वज्ञ) है; (जिसने सबसे पहले) जायमानम्=उत्पन्न हुए; हिरण्यगर्भम्=हिरण्यगर्भको; पश्यत=देखा था; सः=वह परमदेव परमेश्वर; नः=हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या=शुभ बुद्धिसे; संयुक्तु=संयुक्त करें ॥ १२ ॥

व्याख्या —सबको अपने शासनमें रखनेवाले जो रुद्ररूप परमेश्वर इन्द्रादि समस्त देवताओंको उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं तथा जो सबके अधिपति और महान् ज्ञानसम्पन्न (सर्वज्ञ) हैं, जिन्होंने सृष्टिके आदिमें सबसे पहले उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको देखा था, अर्थात् जो ब्रह्माके भी पूर्ववर्ती हैं, वे परमदेव परमात्मा

अध्याय ४ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४८३

हम लोगोंको शुभ बुद्धिसे संयुक्त करें, जिससे हम उनकी ओर बढ़कर उन्हें प्राप्त कर सकें। शुभ बुद्धि वही है, जो जीवको परम कल्याणरूप परमात्माकी ओर लगाये। गायत्री-मन्त्रमें भी इसी बुद्धिके लिये प्रार्थना की गयी है। पहले इसी उपनिषद् (३।४) में यह मन्त्र आ चुका है॥१२॥

यो देवानामधिपो यस्मिँल्लोका अधिश्चिन्ताः। य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्यदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ १३ ॥

यः=जो; देवानाम्=समस्त देवोंका; अधिपः=अधिपति है; यस्मिन्=जिसमें; लोकाः=समस्त लोक; अधिश्चिन्ताः=सब प्रकारसे आश्रित हैं; यः=जो; अस्य=इस; द्विपदः=दो पैरवाले; (और) चतुष्यदः=चार पैरवाले समस्त जीवसमुदायका; ईशे=शासन करता है; (उस) कस्मै देवाय=आनन्दस्वरूप परमदेव परमेश्वरकी; (हम) हविषा=हविष्य अर्थात् श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भेंट समर्पण करके; विधेम=पूजा करें॥१३॥

व्याख्या —जो सर्वनियन्ता परमेश्वर समस्त देवोंके अधिपति हैं, जिनमें समस्त लोक सब प्रकारसे आश्रित हैं अर्थात् जो स्थूल, सूक्ष्म और अव्यक्त अवस्थाओंमें सदा ही सब प्रकारसे सबके आश्रय हैं, जो दो पैरवाले और चार पैरवाले अर्थात् सम्पूर्ण जीव-समुदायका अपनी अचिन्त्य शक्तियोंके द्वारा शासन करते हैं, उन आनन्दस्वरूप परमदेव सर्वाधार सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी हम श्रद्धा-भक्तिपूर्वक हविःस्वरूप भेंट समर्पण करके पूजा करें। अर्थात् सब कुछ उन्हें समर्पण करके उन्हींके हो जायें। यही उनकी प्रासिका सहज उपाय है॥१३॥

सूक्ष्मातिसूक्ष्मंकलिलस्यमध्ये
विश्वस्यस्रष्टारमनेकरूपम्।
विश्वस्यैकंपरिवेष्टितारं
ज्ञात्वाशिवंशान्तिमत्यन्तमेति ॥ १४ ॥*

सूक्ष्मातिसूक्ष्मम् -(जो) सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म; कलिलस्य मध्ये =हृदय-

  • यह मन्त्र इसी उपनिषद् (५।१३) में आया है, यहाँ थोड़ा भेद है।

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ४ ]

गुह्यरूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित; विश्ववस्य=अखिल विश्वकी; स्वधारम्=रचना करनेवाला; अनेकरूपम्=अनेक रूप धारण करनेवाला; (तथा) विश्ववस्य परिवेष्टितारम्=समस्त जगत्को सब ओरसे घेर रखनेवाला है; (उस) एकम्=एक (अद्वितीय); शिवम्=कल्याणस्वरूप महेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) अत्यन्तम्=सदा रहनेवाली; शान्तिम्=शान्तिको; एति=प्राप्त होता है ॥ १४ ॥

व्याख्या —जो परब्रह्म परमात्मा सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं—अर्थात् जो बिना उनकी कृपाके जाने नहीं जाते, जो सबकी हृदय-गुह्यरूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित हैं अर्थात् जो हमारे समीप हैं, जो अखिल विश्वकी रचना करते हैं तथा स्वयं विश्वरूप होकर अनेक रूप धारण किये हुए हैं—यही नहीं, जो निराकाररूपसे समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे रहते हैं, उन सर्वोपरि एक—अद्वितीय कल्याणस्वरूप महेश्वरको जानकर मनुष्य सदा रहनेवाली असीम, अविनाशी और अतिशय शान्तिको प्राप्त कर लेता है, क्योंकि वह महापुरुष इस अशान्त जगत्-प्रपञ्चसे सर्वथा सम्बन्धरहित एवं उपरत हो जाता है ॥ १४ ॥

स एव काले भुवनस्य गोसा

विश्वधिपः सर्वभूतेषु गृहः ।

यस्मिन् युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च

तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिन्नन्ति ॥ १५ ॥

सः एव=वही; काले =समयपर; भुवनस्य गोसा =समस्त ब्रह्माण्डोंकी रक्षा करनेवाला; विश्वधिपः =समस्त जगत्का अधिपति; (और) सर्वभूतेषु =समस्त प्राणियोंमें; गृहः =छिपा हुआ है; यस्मिन् =जिसमें; ब्रह्मर्षयः =वेदज्ञ महर्षिगण; =और; देवताः =देवतालोग भी; युक्ताः =ध्यानद्वारा संलग्न हैं; तम् =उस (परमदेव परमेश्वर) को; एवम् =इस प्रकार; ज्ञात्वा =जानकर; (मनुष्य) मृत्युपाशान् =मृत्युके बन्धनोंको; छिन्नन्ति =काट डालता है ॥ १५ ॥

व्याख्या —जिनका बार-बार वर्णन किया गया है, वे परमदेव परमेश्वर ही समयपर अर्थात् स्थितिकालमें समस्त ब्रह्माण्डोंकी रक्षा करते हैं तथा वे ही

अध्याय ४ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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सम्पूर्ण जगत्के अधिपति और समस्त प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे छिपे हुए हैं। उन्हींमें वेदके रहस्यको समझनेवाले महर्षिगण और समस्त देवतालोग भी ध्यानके द्वारा संलग्न रहते हैं। सब उन्हींका स्मरण और चिन्तन करके उन्हींमें जुड़े रहते हैं। इस प्रकार उन परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य यमराजके समस्त पाशोंको अर्थात् जन्म-मृत्युके कारणभूत समस्त बन्धनोंको काट डालता है। फिर वह कभी प्रकृतिके बन्धनमें नहीं आता, सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥

घृतात् परं मण्डभिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गृह्णम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १६ ॥

शिवम्=कल्याणस्वरूप; एकम् देवम्=एक (अद्वितीय) परमदेवको; घृतात् परम्=मक्खनके ऊपर रहनेवाले; मण्डम् इव=सारभागकी भाँति; अतिसूक्ष्मम्=अत्यन्त सूक्ष्म; (और) सर्वभूतेषु=समस्त प्राणियोंमें; गृह्णम्=छिपा हुआ; ज्ञात्वा=जानकर; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम्=समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर स्थित हुआ; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः=समस्त बन्धनोंसे, मुच्यते=छूट जाता है ॥ १६ ॥

व्याख्या—जो मक्खनके ऊपर रहनेवाले सारभागकी भाँति सबके सार एवं अत्यन्त सूक्ष्म हैं, उन कल्याणस्वरूप एकमात्र परमदेव परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें छिपा हुआ तथा समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर उसे व्याप्त करनेवाला जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सदाके लिये सर्वथा छूट जाता है ॥ १६ ॥

एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः । हृदा मनीषा मनसाभिकल्पो य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १७ ॥

एषः=यह; विश्वकर्मा=जगत्कर्ता; महात्मा=महात्मा; देवः=परमदेव परमेश्वर;

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ४ ]

सदा=सर्वदा; जनानाम्=सब मनुष्योंके; हृदये=हृदयमें; संनिविष्टः=सम्यक् प्रकारसे स्थित है; (तथा) हृदा=हृदयसे; मनीषा=बुद्धिसे; (और) मनसा=मनसे; अभिक्लृप्तः=ध्यानमें लाया हुआ; [ आविर्भवति= ] प्रत्यक्ष होता है; ये=जो साधक; एतत्=इस रहस्यको; विदुः=जान लेते हैं; ते=वे; अमृताः=अमृतस्वरूप; भवन्ति=हो जाते हैं ॥ १७ ॥

व्याख्या —ये जगत्को उत्पन्न करनेवाले महात्मा अर्थात् सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी परमदेव परमेश्वर सदा ही सभी मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं। उनके गुण-प्रभावको सुनकर द्रवित और विशुद्ध हुए निर्मल हृदयसे, निश्चययुक्त बुद्धिसे तथा एकाग्र मनके द्वारा निरन्तर ध्यान करनेपर वे परमात्मा प्रत्यक्ष होते हैं। जो साधक इस रहस्यको जान लेते हैं, वे उन्हें प्राप्त करके अमृतस्वरूप हो जाते हैं, सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं ॥ १७ ॥

यदातमस्तन्न दिवा न रात्रि- न सन्न चासञ्चिष्व एव केवलः।

तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं

प्रज्ञा च तस्मात् प्रसूता पुराणी ॥ १८ ॥

यदा=जब; अतमः [ स्यात् ]=अज्ञानमय अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है; तत्*=उस समय (अनुभवमें आनेवाला तत्त्व); न=न; दिवा=दिन है; न=न; रात्रिः=रात है; न=न; सन्=सत् है; च=और; न=न; असन्=असत् है; केवलः=एकमात्र, विशुद्ध; शिवः एव=कल्याणमय शिव ही है; तत्=वह; अक्षरम्=सर्वथा अविनाशी है; तत्=वह; सवितुः=सूर्याभिमानी देवताका भी; वरेण्यम्=उपास्य है; च=तथा; तस्मात्=उसीसे; पुराणी=(यह) पुराना; प्रज्ञा=ज्ञान; प्रसूता=फैला है ॥ १८ ॥

व्याख्या —जिस समय अज्ञानरूप अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है, उस समय प्रत्यक्ष होनेवाला तत्त्व न दिन है, न रात है। अर्थात् उसे न तो दिनकी भाँति प्रकाशमय कहा जा सकता है और न रातकी भाँति

  • 'तत्' अव्यय पद है, यहाँ 'तदा'के अर्थमें इसका प्रयोग हुआ है।

अध्याय ४ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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अन्धकारमय ही; क्योंकि वह इन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है, वहाँ ज्ञान-अज्ञानके भेदकी कल्पनाके लिये स्थान नहीं है। वह न सत् है और न असत् है—उसे न तो 'सत्' कहना बनता है न 'असत्' ही; क्योंकि वह 'सत्' और 'असत्' नामसे समझे जानेवाले पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण है। एकमात्र कल्याणस्वरूप शिव ही वह तत्त्व हैं। वे सर्वथा अविनाशी हैं। सूर्य आदि समस्त देवताओंके उपास्यदेव हैं। उन्हींसे यह सदासे चला आता हुआ अनादि ज्ञान विस्तारित हुआ है अर्थात् परमात्माको जानने और पानेका साधन अधिकारियोंको परम्परासे प्राप्त होता चला आ रहा है॥ १८ ॥

नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्नभत्।

न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः॥ १९ ॥

एनम्=इस परमात्माको; (कोई भी) न=न तो; ऊर्ध्वम्=ऊपरसे; न=न; तिर्यञ्चम्=इधर-उधरसे; (और) न=न; मध्ये=बीचमेंसे ही; परिजग्नभत्=भलीभाँति पकड़ सकता है; यस्य=जिसका; महद्यशः=महान् यश; नाम=नाम है; तस्य=उसकी; प्रतिमा=कोई उपमा; न=नहीं; अस्ति=है॥ १९ ॥

व्याख्या —जिसका पहले कई मन्त्रोंमें वर्णन किया गया है, उन परम प्राप्य परब्रह्मको कोई भी मनुष्य न तो ऊपरसे पकड़ सकता है, न नीचेसे पकड़ सकता है और न बीचमें इधर-उधरसे ही पकड़ सकता है; क्योंकि ये सर्वथा अग्राह्य हैं—ग्रहण करनेमें नहीं आते। इन्हें जानने और ग्रहण करनेकी बात जो शास्त्रोंमें पायी जाती है, उसका रहस्य वही समझ सकता है, जो उन्हें पा लेता है। वह भी वाणीद्वारा व्यक्त नहीं कर सकता; क्योंकि मन और वाणीकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे समझने और समझानेमें आनेवाले समस्त पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण हैं। जिनका नाम 'महान् यश' है, जिनका महान् यश सर्वत्र प्रसिद्ध है, उन परात्पर ब्रह्मकी कोई भी उपमा नहीं है, जिसके द्वारा उनको समझा अथवा समझाया जा सके। उनके अतिरिक्त कोई दूसरा उनके समान हो तो उसकी उपमा दी जाय। अतः मनुष्यको उस परम प्राप्य तत्त्वको जानने और