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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 548 में से

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पृष्ठ 474

४७२ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय ३

अणोः अणीयान्=(वह) सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म; (तथा) महतो महीयान्=बड़ेसे भी बहुत बड़ा; आत्मा=परमात्मा; अस्य जन्तोः=इस जीवकी; गुहायाम्=हृदयरूप गुफामें; निहितः=छिपा हुआ है; धातुः=सबकी रचना करनेवाले परमेश्वरकी; प्रसादात्=कृपासे; (जो मनुष्य) तम्=उस; अक्रतुम्=संकल्परहित; ईशम्=परमेश्वरको; (और) महिमानम्=उसकी महिमाको; पश्यति=देख लेता है; (वह) वीतशोकः=सब प्रकारके दुःखोंसे रहित (हो जाता है) ॥ २० ॥

**व्याख्या—**वे सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म और बड़ेसे भी बहुत बड़े परब्रह्म परमात्मा इस जीवकी हृदयरूप गुफामें छिपे हुए हैं। सबकी रचना करनेवाले उन परमेश्वरकी कृपासे ही मनुष्य उन स्वार्थके संकल्पसे सर्वथा रहित अकारण कृपा करनेवाले परम सुहृद् परमेश्वरको और उनकी महिमाको जान सकता है। जब उन परम दयालु परम सुहृद् परमेश्वरका यह साक्षात् कर लेता है, तब सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे रहित होकर उन परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है॥ २०॥

वेदाहमेतमजरं पुराणं
सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात्।
जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य
ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम्॥ २१॥

ब्रह्मवादिनः=वेदके रहस्यका वर्णन करनेवाले महापुरुष; यस्य=जिसके; जन्मनिरोधम्=जन्मका अभाव; प्रवदन्ति=बतलाते हैं; [ यम् ]=तथा जिसको; नित्यम्=नित्य; प्रवदन्ति=बतलाते हैं; एतम्=इस; विभुत्वात्=व्यापक होनेके कारण; सर्वगतम्=सर्वत्र विद्यमान; सर्वात्मानम्=सबके आत्मा; अजरम्=जरा, मृत्यु आदि विकारोंसे रहित; पुराणम्=पुराणपुरुष परमेश्वरको; अहम्=मैं; वेद=जानता हूँ॥ २१॥

**व्याख्या—**परमात्माको प्राप्त हुए महात्माका कहना है कि 'वेदके रहस्यका वर्णन करनेवाले महापुरुष जिन्हें जन्मरहित तथा नित्य बताते हैं, व्यापक होनेके कारण जो सर्वत्र विद्यमान हैं—जिनसे कोई भी स्थान खाली नहीं है, जो जरा-