ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 475, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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मृत्यु आदि समस्त विकारोंसे सर्वथा रहित हैं और सबके आदि—पुराणपुरुष हैं, उन सबके आत्मा—अन्तर्यामी परब्रह्म परमेश्वरको मैं जानता हूँ ॥ २१ ॥
॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥
चतुर्थ अध्याय
य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद् वर्णानेकान् निहितार्थो दधाति ।
वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः
स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ १ ॥
यः=जो; अवर्णः=रंग, रूप आदिसे रहित होकर भी; निहितार्थः=छिपे हुए प्रयोजनवाला होनेके कारण; बहुधा शक्तियोगात्=विविध शक्तियोंके सम्बन्धसे; आदौ=सृष्टिके आदिमें; अनेकान्=अनेक; वर्णान्=रूप-रंग; दधाति=धारण कर लेता है; च=तथा; अन्ते=अन्तमें; विश्वम्=यह सम्पूर्ण विश्व; (जिसमें) व्येति (वि+एति) च=विलीन भी हो जाता है; सः=वह; देवः=परमदेव (परमात्मा); एकः=एक (अद्वितीय) है; सः=वह; नः=हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या=शुभ बुद्धिसे; संयुनक्तु=संयुक्त करें ॥ १ ॥
व्याख्या—जो परब्रह्म परमात्मा अपने निराकार स्वरूपमें रूप-रंग आदिसे रहित होकर भी सृष्टिके आदिमें किसी रहस्यपूर्ण प्रयोजनके कारण अपनी स्वरूपभूत नाना प्रकारकी शक्तियोंके सम्बन्धसे अनेक रूप-रंग आदि धारण करते हैं तथा अन्तमें यह सम्पूर्ण जगत् जिनमें विलीन भी हो जाता है—अर्थात् जो बिना किसी अपने प्रयोजनके जीवोंका कल्याण करनेके लिये ही उनके कर्मानुसार इस नाना रंग-रूपवाले जगत्की रचना, पालन और संहार करते हैं और समय-समयपर आवश्यकतानुसार अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं, वे परमदेव परमेश्वर वास्तवमें एक—अद्वितीय हैं। उनके अतिरिक्त कुछ नहीं है। वे हमें शुभ बुद्धिसे युक्त करें ॥ १ ॥