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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 548 में से

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ४ ]

सम्बन्ध —इस प्रकार प्रार्थना करनेका प्रकार बताया गया। अब तीन मन्त्रोंद्वारा परमेश्वरका जगत्के रूपमें चिन्तन करते हुए उनकी स्तुति करनेका प्रकार बतलाया जाता है—

तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्लं तद्ब्रह्म तदापस्तत् प्रजापतिः ॥ २ ॥*

तत् एव=वही; अग्निः=अग्नि है; तत्=वह; आदित्यः=सूर्य है; तत्=वह; वायुः=वायु है; उ=तथा; तत्=वही; चन्द्रमाः=चन्द्रमा हैं; तत्=वह; शुक्लम्=अन्यान्य प्रकाशयुक्त नक्षत्र आदि है; तत्=वह; आपः=जल है; तत्=वह; प्रजापतिः=प्रजापति है; (और) तत् एव=वही; ब्रह्म=ब्रह्मा है ॥ २ ॥

व्याख्या —वे परब्रह्म ही अग्नि, जल, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, अन्यान्य प्रकाशमय नक्षत्र आदि प्रजापति और ब्रह्मा हैं। ये सब उन एक अद्वितीय परब्रह्म परमेश्वरकी ही विभूतियाँ हैं। इन सबके अन्तर्यामी आत्मा वे ही हैं, अतः ये सब उन्हींके स्वरूप हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्के रूपमें उन परमात्माका चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥

त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥ ३ ॥†

त्वम्=तू; स्त्री=स्त्री है; त्वम्=तू; पुमान्=पुरुष है; त्वम्=तू ही; कुमारः=कुमार; उत वा=अथवा; कुमारी=कुमारी; असि=है; त्वम्=तू; जीर्णः=बूढ़ होकर; दण्डेन=लाठीके सहारे; वञ्चसि=चलता है; [ उ ]=तथा; त्वम्=तू ही; जातः=विराट् रूपमें प्रकट होकर; विश्वतोमुखः=सब ओर मुख-वाला; भवसि=हो जाता है ॥ ३ ॥

व्याख्या —हे सर्वेश्वर! आप स्त्री, पुरुष, कुमार, कुमारी आदि अनेक रूपोंवाले हैं—अर्थात् इन सबके रूपमें आप ही प्रकट हो रहे हैं। आप ही बूढ़े

  • यह मन्त्र यजुर्वेद ३२।१ में भी आया है।

† यह अथर्ववेद काण्ड १० सूक्त ८ का २७ वाँ मन्त्र है।