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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 548 में से

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पृष्ठ 477

अध्याय ४ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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होकर लाठीके सहारे चलते हैं अर्थात् आप ही बुड़ढोंके रूपमें अभिव्यक्त हैं। हे परमात्मन्! आप ही विराट् रूपमें प्रकट होकर सब ओर मुख किये हुए हैं, अर्थात् सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है। जगत्में जितने भी मुख दिखायी देते हैं, सब आपके ही हैं ॥ ३ ॥

नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्ष- स्तडिदग्धं ऋतवः समुद्राः । अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा ॥ ४ ॥

[ त्वम् एव ]=तू ही; नीलः=नीलवर्ण; पतङ्गः=पतङ्ग है; हरितः=हरे रंगका; (और) लोहिताक्षः=लाल आँखोंवाला (पक्षी है एवं); तडिदग्धः=मेघ; ऋतवः=वसन्त आदि ऋतुएँ; (तथा) समुद्राः=सप्त समुद्ररूप है; यतः=क्योंकि; [ त्वत्तः एव ]=तुझसे ही; विश्वा=सम्पूर्ण; भुवनानि=लोक; जातानि=उत्पन्न हुए हैं; त्वम्=तू ही; अनादिमत्त्वं=अनादि (प्रकृतियों) का स्वामी; (और) विभुत्वेन=व्यापकरूपसे; वर्तसे=सबमें विद्यमान हैं ॥ ४ ॥

व्याख्या—हे सर्वान्तर््यामिन्! आप ही नीले रंगके पतङ्ग (भौर) तथा हरे रंग और लाल आँखोंवाले पक्षी—तोते हैं; आप ही बिजलीसे युक्त मेघ हैं, वसन्तादि सब ऋतुएँ और सातों समुद्र भी आपके ही रूप हैं। अर्थात् इन नाना प्रकारके रंग-रूपवाले समस्त जड-चेतन पदार्थोंके रूपमें मैं आपको ही देख रहा हूँ; क्योंकि आपसे ही ये समस्त लोक और उनमें निवास करनेवाले सम्पूर्ण जीव-समुदाय प्रकट हुए हैं। व्यापकरूपसे आप ही सबमें विद्यमान हैं तथा अत्यक्त एवं जीवरूप अपनी दो अनादि प्रकृतियोंके (जिन्हें गीतामें अपरा और परा नामोंसे कहा गया है) स्वामी भी आप ही हैं। अतः एकमात्र आपको ही मैं सबके रूपमें देखता हूँ ॥ ४ ॥

सम्बन्ध—पूर्व मन्त्रमें परब्रह्म परमेश्वरको जिन दो प्रकृतियोंका स्वामी बताया गया है, वे दोनों अनादि प्रकृतियाँ कौन-सी हैं—इसका स्पष्टीकरण किया जाता है—