ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 478, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ४ ]
अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ ५ ॥
सरूपाः=अपने ही सदृश अर्थात् त्रिगुणमय; बह्वीः=बहुत-से; प्रजाः=भूत-समुदायोंको; सृजमानाम्=रचनेवाली; (तथा) लोहितशुक्लकृष्णाम्=लाल, सफेद और काले रंगकी अर्थात् त्रिगुणमयी; एकाम्=एक; अजाम्=अजा (अजन्मा—अनादि प्रकृति)को; हि=निश्चय ही; एकः अजः=एक अजन्मा (अज्ञानी जीव); जुषमाणः=आसक्त हुआ; अनुशेते=भोगता है; (और) अन्यः=दूसरा; अजः=अज (ज्ञानी महापुरुष); एनाम्=इस; भुक्तभोगाम्=भोगी हुई प्रकृतिको; जहाति=त्याग देता है ॥ ५ ॥
व्याख्या—पिछले मन्त्रमें जिनका संकेत किया गया है; उन दो प्रकृतियोंमेंसे एक तो वह है, जिसका गीतामें अपरा नामसे उल्लेख हुआ है तथा जिसके आठ भेद किये गये हैं (गीता ७।४)। यह अपने अधिष्ठाता परमदेव परमेश्वरकी अध्यक्षतामें अपने ही सदृश अर्थात् त्रिगुणमय असंख्य जीवदेहोंको उत्पन्न करती है। त्रिगुणमयी अथवा त्रिगुणात्मिका होनेसे इसे तीन रंगवाली कहा गया है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही इसके तीन रंग हैं। सत्त्वगुण निर्मल एवं प्रकाशक होनेसे उसे श्वेत माना गया है। रजोगुण रागात्मक है, अतएव उसका रंग लाल माना गया है तथा तमोगुण अज्ञानरूप एवं आवरक होनेसे उसे कृष्णवर्ण कहा गया है। इन तीन गुणोंको लेकर ही प्रकृतिको सफेद, लाल एवं काले रंगकी कहा गया। दूसरी जिसका गीतामें जीवरूप परा अथवा चेतन प्रकृतिके नामसे (७।५), क्षेत्रज्ञके नामसे (१३।१) तथा अक्षर-पुरुषके नामसे (१५।१६) वर्णन किया गया है, उसके दो भेद हैं। एक तो वे जीव, जो उस अपरा प्रकृतिमें आसक्त होकर— उसके साथ एकरूप होकर उसके विचित्र भोगोंको अपने कर्मानुसार भोगते हैं। दूसरा समुदाय उन ज्ञानी महापुरुषोंका है, जिन्होंने इसके भोगोंको भोगकर इसे निःसार और क्षणभङ्गुर समझकर इसका