ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 479, कुल 548 में से
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श्वेताश्वतरोपनिषद्
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सर्वथा परित्याग कर दिया है। ये दोनों प्रकारके जीव स्वरूपतः अजन्मा तथा अनादि हैं। इसीलिये इन्हें 'अज' कहा गया है ॥५॥*
सम्बन्ध— वह परा प्रकृतिरूप जीवसमुदाय, जो इस प्रकृतिके भोगोंको भोगता है, कब और कैसे मुक्त हो सकता है—इस जिज्ञासापर दो मन्त्रोंमें कहते हैं—
| द्व्वा | सुपर्णा | सयुजा | सखाया |
|---|---|---|---|
| समानं | वृक्षं | परिषस्वजाते । | |
| तयोरन्यः | पिप्पलं | स्वाद्भृत्य- | |
| नश्नन्नन्यो | अभिचाकशीति ॥ ६ ॥ |
सयुजा=सदा साथ रहनेवाले; (तथा) सखाया=परस्पर सख्यभाव रखनेवाले; द्व्वा=दो; सुपर्णा=पक्षी (जीवात्मा एवं परमात्मा); समानम्=एक ही; वृक्षम् परिषस्वजाते=वृक्ष (शरीर)का आश्रय लेकर रहते हैं; तयोः=उन दोनोंमेंसे; अन्यः=एक (जीवात्मा) तो; पिप्पलम्=उस वृक्षके फलों (कर्मफलों) को; स्वाद्=स्वाद ले-लेकर; अति=खाता है; अन्यः=(किंतु) दूसरा (ईश्वर); अनश्नन्=उनका उपभोग न करता हुआ; अभिचाकशीति=केवल देखता रहता है ॥६॥
व्याख्या— जिस प्रकार गीता आदिमें जगत्का अश्वत्थ-वृक्षके रूपमें वर्णन किया गया है, उसी प्रकार इस मन्त्रमें शरीरको अश्वत्थ-वृक्षका और जीवात्मा तथा परमात्माको पक्षियोंका रूप देकर वर्णन किया गया है। इसी प्रकार
- सांख्यमतावलम्बियोंने इस मन्त्रको सांख्यशास्त्रका बीज माना है और इसीके आधारपर उक्त दर्शनको श्रुतिसम्मत सिद्ध किया है। सांख्यकारिकाके प्रसिद्ध टीकाकार तथा अन्य दर्शनोंके व्याख्याता सर्वतन्त्रस्वतन्त्र स्वनामधन्य श्रीवाचस्पति मिश्रने अपनी सांख्य-तत्त्वकौमुदी नामक टीकाके आरम्भमें इसी मन्त्रको कुछ परिवर्तनके साथ मङ्गलाचरणके रूपमें उद्धृत करते हुए इसमें वर्णित प्रकृतिकी वन्दना की है। यहाँ काव्यमयी भाषामें प्रकृतिको एक तिरंगी बकरीके रूपमें चित्रित किया गया है, जो बड़जीवरूप बकरेके संयोगसे अपनी ही जैसी तिरंगी—त्रिगुणमयी संतान उत्पन्न करती है। संस्कृतमें 'अजा' बकरीको भी कहते हैं। इसी श्लेषका उपयोग करके प्रकृतिका आलङ्कारिक रूपमें वर्णन किया गया है।
† यह मन्त्र अथर्ववेद काण्ड ९ सूक्त १४ का २० वें है तथा ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त १६४ का २० वें है।