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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 473, कुल 548 में से

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पृष्ठ 473

अध्याय ३ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४७१

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥ ११ ॥

सः=वह परमात्मा; अपाणिपादः=हाथ-पैरोंसे रहित होकर भी; ग्रहीता=समस्त वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला; (तथा) जवनः=वेगपूर्वक सर्वत्र गमन करनेवाला है; अचक्षुः=आँखोंके बिना ही; पश्यति=वह सब कुछ देखता है; (और) अकर्णः=कानोंके बिना ही; शृणोति=सब कुछ सुनता है; सः=वह; वेद्यम्=जो कुछ भी जाननेमें आनेवाली वस्तुएँ हैं, उन सबको; वेत्ति=जानता है; च=परंतु; तस्य वेत्ता=उसको जाननेवाला; (कोई) न अस्ति=नहीं है; तम्=(ज्ञानी पुरुष) उसे; महान्तम्=महान्; अग्र्यम्=आदि; पुरुषम्=पुरुष; आहुः=कहते हैं ॥ ११ ॥

व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, वे परब्रह्म परमात्मा हाथोंसे रहित होनेपर भी सब जगह समस्त वस्तुओंको ग्रहण कर लेते हैं तथा पैरोंसे रहित होकर भी बड़े वेगसे इच्छानुसार सर्वत्र गमनागमन करते हैं। आँखोंसे रहित होकर भी सब जगह सब कुछ देखते हैं, कानोंसे रहित होकर भी सब जगह सब कुछ सुनते हैं। वे समस्त जाननेयोग्य और जाननेमें आनेवाले जड़-चेतन पदार्थोंको भलीभाँति जानते हैं, परंतु उनको जाननेवाला कोई नहीं है। जो सबको जाननेवाले हैं, उन्हें भला कौन जान सकता है। उनके विषयमें ज्ञानी महापुरुष कहते हैं कि वे सबके आदि, पुरातन, महान् पुरुष हैं ॥ ११ ॥

अणोरणीयान् महतो महीया- नात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्योः । तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमान्मीशम् ॥ २० ॥*

  • यह मन्त्र कठ उ० १।२।२० में भी है।