ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥ १७ ॥
(जो परम पुरुष परमात्मा) सर्वेन्द्रियविवर्जितम्=समस्त इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी; सर्वेन्द्रियगुणाभासम्=समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है; (तथा) सर्वस्य=सबका; प्रभुम्=स्वामी; सर्वस्य=सबका; ईशानम्=शासक; (और) बृहत्=सबसे बड़ा; शरणम्=आश्रय है ॥ १७ ॥
व्याख्या—जो सर्वशक्तिमान् परम पुरुष परमात्मा समस्त इन्द्रियोंसे रहित—देहेन्द्रियादि-भेदसे शून्य होनेपर भी समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं तथा सबके स्वामी, परम समर्थ, सबका शासन करनेवाले और जीवके लिये सबसे बड़े आश्रय हैं, मनुष्यको सर्वतोभावसे उन्हीकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। यही मनुष्य-शरीरका अच्छे-से-अच्छा उपयोग है। इस मन्त्रका पूर्वाङ्ग गीतामें ज्यों-का-त्यों आया है (१३।१४) ॥ १७ ॥
नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥ १८ ॥
सर्वस्य=सम्पूर्ण; स्थावरस्य=स्थावर; च=और; चरस्य=जंगम; लोकस्य वशी=जगत्को वशमें रखनेवाला; हंसः=वह प्रकाशमय परमेश्वर; नवद्वारे=नौ द्वारवाले; पुरे=शरीररूपी नगरमें; देही=अन्तर््यामीरूपसे हृदयमें स्थित देही है; (तथा वही) बहिः=बाह्य जगत्में भी; लेलायते=लीला कर रहा है ॥ १८ ॥
व्याख्या—सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम जीवोंके समुदायरूप इस जगत्को अपने वशमें रखनेवाले वे प्रकाशमय परमेश्वर दो आँख, दो कान, दो नासिका, एक मुख, एक गुदा और एक उपस्थ—इस प्रकार नौ दरवाजोंवाले मनुष्य-शरीररूप नगरमें अन्तर््यामीरूपसे स्थित हैं और वे ही इस बाह्य जगत्में भी लीला कर रहे हैं यों समझकर मन जहाँ सुगमतासे स्थिर हो सके, वहीं उनका ध्यान करना चाहिये ॥ १८ ॥
सम्बन्ध—पहले जो यह बात कही थी कि वे समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सब इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं, उसीका स्पष्टीकरण किया जाता है—