ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 471, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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यत्=जो; भूतम्=अबसे पहले हो चुका है; यत्=जो; भव्यम्=भविव्यमें होनेवाला है; च=और; यत्=जो; अत्रेन=खाद्य पदार्थोंसे; अतिरोहति=इस समय बढ़ रहा है; इदम्=यह; सर्वम्=समस्त जगत्; पुरुषः एव=परम पुरुष परमात्मा ही है; उत=और; (वही) अमृतत्वस्य=अमृतस्वरूप मोक्षका; ईशानः=स्वामी है ॥ १५ ॥
व्याख्या —जो अबसे पहले हो चुका है, जो भविव्यमें होनेवाला है और जो वर्तमान कालमें अत्रके द्वारा अर्थात् खाद्य पदार्थोंके द्वारा बढ़ रहा है, वह समस्त जगत् परम पुरुष परमात्माका ही स्वरूप है। वे स्वयं ही अपनी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिसे इस रूपमें प्रकट होते हैं तथा वे ही अमृतस्वरूप मोक्षके स्वामी हैं अर्थात् जीवोंको संसार-बन्धनसे छुड़ाकर अपनी प्राप्ति करा देते हैं। अतएव उनकी प्राप्तिके अभिलाषी साधकोंको उन्हींकी शरणमें जाना चाहिये ॥ १५ ॥
सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १६ ॥
तत्=वह परम पुरुष परमात्मा; सर्वतः पाणिपादम्=सब जगह हाथ-पैरवाला; सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्=सब जगह आँख, सिर और मुखवाला; (तथा) सर्वतः श्रुतिम्=सब जगह कानोंवाला है; (वही) लोके=ब्रह्माण्डमें; सर्वम्=सबको; आवृत्य=सब ओरसे घेरकर; तिष्ठति=स्थित है ॥ १६ ॥
व्याख्या —उन परमात्माके हाथ, पैर, आँखें, सिर, मुख और कान सब जगह हैं। वे सब जगह सब शक्तियोंसे सब कार्य करनेमें समर्थ हैं। उन्होंने सभी जगह अपने भक्तोंकी रक्षा करने तथा उन्हें अपनी ओर खींचनेके लिये हाथ बढ़ा रखा है। उनका भक्त उन्हें जहाँ चाहता है, वहाँ उन्हें पहुँचा हुआ पाता है। वे सब जगह सब जीवोंद्वारा किये जानेवाले कर्मोंको देख रहे हैं। उनका भक्त जहाँ उन्हें प्रणाम करता है, सर्वत्र व्याप्त होनेके कारण उनके चरण और सिर आदि अङ्ग वहाँ मौजूद रहते हैं। अपने भक्तकी प्रार्थना सुननेके लिये उनके कान सर्वत्र हैं और अपने भक्तद्वारा अर्पण की हुई वस्तुका भोग लगानेके लिये उनका मुख भी सर्वत्र विद्यमान है। वे परमेश्वर इस ब्रह्माण्डमें सबको सब ओरसे घेरकर स्थित हैं—इस बातपर विश्वास करके मनुष्यको उनकी सेवामें लग जाना चाहिये। यह मन्त्र गीतामें भी इसी रूपमें आया है (१३।१३) ॥ १६ ॥