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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 548 में से

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ४ ]

ये=जो; तत्=उसको; विदुः=जानते हैं; ते=वे तो; इमे=ये; समासते=सम्यक् प्रकारसे उसीमें स्थित हैं ॥ ८ ॥

व्याख्या —परब्रह्म परमेश्वरके जिस अविनाशी दिव्य चेतन परम आकाशस्वरूप परमधामसे समस्त देवगण अर्थात् उन परमात्माके पार्षदगण उन परमेश्वरकी सेवा करते हुए निवास करते हैं, वही समस्त वेद भी पार्षदोंके रूपमें मूर्तिमान् होकर भगवान्की सेवा करते हैं। जो मनुष्य उस परमधाममें रहनेवाले परब्रह्म पुरुषोत्तमको नहीं जानता और इस रहस्यको भी नहीं जानता कि समस्त वेद उन परमात्माकी सेवा करनेवाले उन्हींके अङ्गभूत पार्षद हैं, वह वेदोंके द्वारा अपना क्या प्रयोजन सिद्ध करेगा? अर्थात् कुछ सिद्ध नहीं कर सकेगा। परंतु जो उन परमात्माको तत्त्वसे जान लेते हैं, वे तो उस परमधाममें ही सम्यक् प्रकारसे स्थित रहते हैं, अर्थात् वहाँसे कभी नहीं लौटते ॥ ८ ॥

छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति। अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ९ ॥

छन्दांसि =छन्द; यज्ञाः =यज्ञ; क्रतवः =क्रतु (ज्योतिष्टोम आदि विशेष यज्ञ); व्रतानि =नाना प्रकारके व्रत; =तथा; यत् =और भी जो कुछ; भूतम् =भूत; भव्यम् =भविष्य एवं वर्तमानरूपसे; वेदाः =वेद; वदन्ति =वर्णन करते हैं; एतत् =विश्वम्=इस सम्पूर्ण जगत्को; मायी =प्रकृतिका अधिपति परमेश्वर; अस्मात् =इस (पहले बताये हुए महाभूतादि तत्त्वोंके समुदाय) से; सृजते =रचता है; =तथा; अन्यः =दूसरा (जीवात्मा); तस्मिन् =उस प्रपञ्चमें; मायया =मायाके द्वारा; संनिरुद्धः =भलीभाँति बँधा हुआ है ॥ ९ ॥

व्याख्या —जो समस्त वेदमन्त्र रूप छन्द, यज्ञ, क्रतु अर्थात् ज्योतिष्टोमादि विशेष यज्ञ, नाना प्रकारके व्रत अर्थात् शुभकर्म, सदाचार और उनके नियम हैं तथा और भी जो कुछ भूत, भविष्य, वर्तमान पदार्थ हैं, जिनका वर्णन वेदोंमें पाया जाता है—इन सबको वे प्रकृतिके अधिष्ठाता परमेश्वर ही अपने अंशभूत