ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 481, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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भिन्न; ईशम्=परमेश्वरको; (और) अस्य=उसकी; महिमानम्=आश्चर्यमयी महिमाको; पश्यति=प्रत्यक्ष देख लेता है; इति=तब; वीतशोकः=सर्वथा शोकरहित; [ भवति ]=हो जाता है ॥७॥
व्याख्या —पहले बतलाये हुए इस शरीररूप एक ही वृक्षपर हृदयरूप घोंसलेमें परमात्माके साथ रहनेवाला यह जीवात्मा जबतक अपने साथ रहनेवाले परम सुहृद परमेश्वरकी ओर नहीं देखता, इस शरीरमें ही आसक्त होकर मोहमें निमग्न रहता है, अर्थात् शरीरमें अत्यन्त ममता करके उसके द्वारा भोगोंका उपभोग करनेमें ही रचा-पचा रहता है, तबतक असमर्थता और दीनतासे मोहित हुआ नाना प्रकारके दुःखोंको भोगता रहता है। जब कभी इसपर भगवान्की अहेतुकी दया होती है, तब यह अपनेसे भिन्न, अपने ही साथ रहनेवाले, परम सुहृद, परम प्रिय भगवान्को पहचान पाता है। जो भक्तजनोंद्वारा निरन्तर सेवित हैं, उन परमेश्वरको तथा उनकी आश्चर्यमयी महिमाको, जो जगत्में सर्वत्र भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्रकट हो रही है, जब यह देख लेता है, उस समय तत्काल ही सर्वथा शोकरहित हो जाता है। मुण्डक० ३।१।२ में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है ॥७॥
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः। यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत् तद् विदुस्त इमे समासते ॥८॥*
यस्मिन्=जिसमें; विश्वे=समस्त; देवाः=देवगण; अधि=भलीभाँति; निषेदुः=स्थित हैं; [ तस्मिन् ]=उस; अक्षरे=अविनाशी; परमे व्योमन्=परम व्योम (परम धाम)में; ऋचः=सम्पूर्ण वेद स्थित हैं; यः=जो मनुष्य; तम्=उसको; न=नहीं; वेद=जानता; [ सः ]=वह; ऋचा=वेदोंके द्वारा; किम्=क्या; करिष्यति=सिद्ध करेगा; इत्=परंतु;
- यह मन्त्र ऋग्वेद मण्डल १ सू० १६४ का उन्चालीसवॉँ है तथा अथर्ववेद (९।१५।१८) में भी है।