ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 483, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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इस पहले बताये हुए पञ्चभूत आदि तत्त्वसमुदायसे रचते हैं; इस प्रकार रचे हुए उस जगत्में अन्य अर्थात् पहले बताये हुए ज्ञानी महापुरुषोंसे भिन्न जीवसमुदाय मायाके द्वारा बँधा हुआ है। जबतक वह अपने स्वामी परमदेव परमेश्वरको साक्षात् नहीं कर लेता, तबतक उसका इस प्रकृतिसे छुटकारा नहीं हो सकता; अतः मनुष्यको उन परमात्माको जानने और पानेकी उत्कट अभिलाषा रखनी चाहिये ॥ ९ ॥
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्। तस्यावयवभूतैस्तु व्यासं सर्वमिदं जगत् ॥ १० ॥
मायाम्=माया; तु=तो; प्रकृतिम्=प्रकृतिको; विद्यात्=समझना चाहिये; तु=और; मायिनम्=मायापति; महेश्वरम्=महेश्वरको समझना चाहिये; तस्य तु=उसीके; अवयवभूतैः=अङ्गभूत कारण-कार्य-समुदायसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण; जगत्=जगत्; व्यासम्=व्यास हो रहा है ॥ १० ॥
व्याख्या —इस प्रकारणमें जिसका मायाके नामसे वर्णन हुआ है, वह तो भगवान्की शक्तिरूपा प्रकृति है और उस माया नामसे कही जानेवाली शक्तिरूपा प्रकृतिका अधिपति परब्रह्म परमात्मा महेश्वर है; इस प्रकार इन दोनोंको अलग-अलग समझना चाहिये। उस परमेश्वरकी शक्तिरूपा प्रकृतिके ही अङ्गभूत कारण-कार्य-समुदायसे यह सम्पूर्ण जगत् व्यास हो रहा है ॥ १० ॥
यो योनिं योनिमधिष्ठित्युत्प्रेको यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम्। तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाव्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ ११ ॥
यः=जो; एकः=अकेला ही; योनिम् योनिम् अधिष्ठितः=प्रत्येक योनि का अधिष्ठाता हो रहा है; यस्मिन्=जिसमें; इदम्=यह; सर्वम्=समस्त जगत्; समेति=प्रलयकालमें विलीन हो जाता है; च=और; व्येति च=सृष्टिकालमें विविध रूपोंमें प्रकट भी हो जाता है; तम्=उस; ईशानम्=सर्वनिशन्ता; वरदम्=वरदायक; ईड्यम्=स्तुति करनेयोग्य; देवम्=परमदेव परमेश्वरको; निचाव्यम्=तत्त्वसे जानकर;