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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 484, कुल 548 में से

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ४ ]

(मनुष्य) अत्यन्तम्-निरन्तर बनी रहनेवाली; इमाम्-इस (मुक्तिरूप); शान्तिम्-परम शान्तिको; एति-प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥

व्याख्या —परब्रह्म परमेश्वर प्रत्येक योनिके एकमात्र अध्यक्ष हैं— जगत्में जितने प्रकारके कारण माने जाते हैं, उन सबके अधिष्ठाता हैं। उनमें किसी कार्यको उत्पन्न करनेकी शक्ति उन्हीं सर्वकारण परमात्माकी है और उन्हींकी अध्यक्षतामें वे उन-उन कार्योंको उत्पन्न करते हैं। वे परमेश्वर ही उन सबपर शासन करते हैं—उनकी यथायोग्य व्यवस्था करते हैं। यह समस्त जगत् प्रलयके समय उनमें विलीन हो जाता है तथा पुनः सृष्टिकालमें उन्हींसे विविध रूपोंमें उत्पन्न हो जाता है। उन सर्वनियन्ता, वरदायक, एकमात्र स्तुति करनेयोग्य परमदेव, सर्वसुहृद, सर्वेश्वर परमात्माको जानकर यह जीव निरन्तर बनी रहनेवाली परमनिर्वाणरूप शान्तिको प्राप्त हो जाता है। गीतामें इसका शाश्वती शान्ति (गीता १।३१), परा शान्ति (गीता १८।६२) आदि नामोंसे भी वर्णन आता है ॥ ११ ॥

यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्ववाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं स नो बुद्ध्या शुभया संयुक्तु ॥ १२ ॥

यः=जो; रुद्रः=रुद्र; देवानाम्=इन्द्रादि देवताओंको; प्रभवः=उत्पन्न करनेवाला; च=और; उद्भवः=बढ़ानेवाला है; च=तथा; (जो) विश्ववाधिपः=सबका अधिपति; महर्षिः=(और) महान् ज्ञानी (सर्वज्ञ) है; (जिसने सबसे पहले) जायमानम्=उत्पन्न हुए; हिरण्यगर्भम्=हिरण्यगर्भको; पश्यत=देखा था; सः=वह परमदेव परमेश्वर; नः=हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या=शुभ बुद्धिसे; संयुक्तु=संयुक्त करें ॥ १२ ॥

व्याख्या —सबको अपने शासनमें रखनेवाले जो रुद्ररूप परमेश्वर इन्द्रादि समस्त देवताओंको उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं तथा जो सबके अधिपति और महान् ज्ञानसम्पन्न (सर्वज्ञ) हैं, जिन्होंने सृष्टिके आदिमें सबसे पहले उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको देखा था, अर्थात् जो ब्रह्माके भी पूर्ववर्ती हैं, वे परमदेव परमात्मा