ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 485, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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हम लोगोंको शुभ बुद्धिसे संयुक्त करें, जिससे हम उनकी ओर बढ़कर उन्हें प्राप्त कर सकें। शुभ बुद्धि वही है, जो जीवको परम कल्याणरूप परमात्माकी ओर लगाये। गायत्री-मन्त्रमें भी इसी बुद्धिके लिये प्रार्थना की गयी है। पहले इसी उपनिषद् (३।४) में यह मन्त्र आ चुका है॥१२॥
यो देवानामधिपो यस्मिँल्लोका अधिश्चिन्ताः। य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्यदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ १३ ॥
यः=जो; देवानाम्=समस्त देवोंका; अधिपः=अधिपति है; यस्मिन्=जिसमें; लोकाः=समस्त लोक; अधिश्चिन्ताः=सब प्रकारसे आश्रित हैं; यः=जो; अस्य=इस; द्विपदः=दो पैरवाले; (और) चतुष्यदः=चार पैरवाले समस्त जीवसमुदायका; ईशे=शासन करता है; (उस) कस्मै देवाय=आनन्दस्वरूप परमदेव परमेश्वरकी; (हम) हविषा=हविष्य अर्थात् श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भेंट समर्पण करके; विधेम=पूजा करें॥१३॥
व्याख्या —जो सर्वनियन्ता परमेश्वर समस्त देवोंके अधिपति हैं, जिनमें समस्त लोक सब प्रकारसे आश्रित हैं अर्थात् जो स्थूल, सूक्ष्म और अव्यक्त अवस्थाओंमें सदा ही सब प्रकारसे सबके आश्रय हैं, जो दो पैरवाले और चार पैरवाले अर्थात् सम्पूर्ण जीव-समुदायका अपनी अचिन्त्य शक्तियोंके द्वारा शासन करते हैं, उन आनन्दस्वरूप परमदेव सर्वाधार सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी हम श्रद्धा-भक्तिपूर्वक हविःस्वरूप भेंट समर्पण करके पूजा करें। अर्थात् सब कुछ उन्हें समर्पण करके उन्हींके हो जायें। यही उनकी प्रासिका सहज उपाय है॥१३॥
| सूक्ष्मातिसूक्ष्मं | कलिलस्य | मध्ये |
|---|---|---|
| विश्वस्य | स्रष्टारमनेकरूपम्। | |
| विश्वस्यैकं | परिवेष्टितारं | |
| ज्ञात्वा | शिवं | शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १४ ॥* |
सूक्ष्मातिसूक्ष्मम् -(जो) सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म; कलिलस्य मध्ये =हृदय-
- यह मन्त्र इसी उपनिषद् (५।१३) में आया है, यहाँ थोड़ा भेद है।