ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 486, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ४ ]
गुह्यरूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित; विश्ववस्य=अखिल विश्वकी; स्वधारम्=रचना करनेवाला; अनेकरूपम्=अनेक रूप धारण करनेवाला; (तथा) विश्ववस्य परिवेष्टितारम्=समस्त जगत्को सब ओरसे घेर रखनेवाला है; (उस) एकम्=एक (अद्वितीय); शिवम्=कल्याणस्वरूप महेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) अत्यन्तम्=सदा रहनेवाली; शान्तिम्=शान्तिको; एति=प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
व्याख्या —जो परब्रह्म परमात्मा सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं—अर्थात् जो बिना उनकी कृपाके जाने नहीं जाते, जो सबकी हृदय-गुह्यरूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित हैं अर्थात् जो हमारे समीप हैं, जो अखिल विश्वकी रचना करते हैं तथा स्वयं विश्वरूप होकर अनेक रूप धारण किये हुए हैं—यही नहीं, जो निराकाररूपसे समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे रहते हैं, उन सर्वोपरि एक—अद्वितीय कल्याणस्वरूप महेश्वरको जानकर मनुष्य सदा रहनेवाली असीम, अविनाशी और अतिशय शान्तिको प्राप्त कर लेता है, क्योंकि वह महापुरुष इस अशान्त जगत्-प्रपञ्चसे सर्वथा सम्बन्धरहित एवं उपरत हो जाता है ॥ १४ ॥
स एव काले भुवनस्य गोसा
विश्वधिपः सर्वभूतेषु गृहः ।
यस्मिन् युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च
तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिन्नन्ति ॥ १५ ॥
सः एव=वही; काले =समयपर; भुवनस्य गोसा =समस्त ब्रह्माण्डोंकी रक्षा करनेवाला; विश्वधिपः =समस्त जगत्का अधिपति; (और) सर्वभूतेषु =समस्त प्राणियोंमें; गृहः =छिपा हुआ है; यस्मिन् =जिसमें; ब्रह्मर्षयः =वेदज्ञ महर्षिगण; च =और; देवताः =देवतालोग भी; युक्ताः =ध्यानद्वारा संलग्न हैं; तम् =उस (परमदेव परमेश्वर) को; एवम् =इस प्रकार; ज्ञात्वा =जानकर; (मनुष्य) मृत्युपाशान् =मृत्युके बन्धनोंको; छिन्नन्ति =काट डालता है ॥ १५ ॥
व्याख्या —जिनका बार-बार वर्णन किया गया है, वे परमदेव परमेश्वर ही समयपर अर्थात् स्थितिकालमें समस्त ब्रह्माण्डोंकी रक्षा करते हैं तथा वे ही