भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ४ ]

सदा=सर्वदा; जनानाम्=सब मनुष्योंके; हृदये=हृदयमें; संनिविष्टः=सम्यक् प्रकारसे स्थित है; (तथा) हृदा=हृदयसे; मनीषा=बुद्धिसे; (और) मनसा=मनसे; अभिक्लृप्तः=ध्यानमें लाया हुआ; [ आविर्भवति= ] प्रत्यक्ष होता है; ये=जो साधक; एतत्=इस रहस्यको; विदुः=जान लेते हैं; ते=वे; अमृताः=अमृतस्वरूप; भवन्ति=हो जाते हैं ॥ १७ ॥

व्याख्या —ये जगत्को उत्पन्न करनेवाले महात्मा अर्थात् सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी परमदेव परमेश्वर सदा ही सभी मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं। उनके गुण-प्रभावको सुनकर द्रवित और विशुद्ध हुए निर्मल हृदयसे, निश्चययुक्त बुद्धिसे तथा एकाग्र मनके द्वारा निरन्तर ध्यान करनेपर वे परमात्मा प्रत्यक्ष होते हैं। जो साधक इस रहस्यको जान लेते हैं, वे उन्हें प्राप्त करके अमृतस्वरूप हो जाते हैं, सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं ॥ १७ ॥

यदातमस्तन्न दिवा न रात्रि- न सन्न चासञ्चिष्व एव केवलः।

तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं

प्रज्ञा च तस्मात् प्रसूता पुराणी ॥ १८ ॥

यदा=जब; अतमः [ स्यात् ]=अज्ञानमय अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है; तत्*=उस समय (अनुभवमें आनेवाला तत्त्व); न=न; दिवा=दिन है; न=न; रात्रिः=रात है; न=न; सन्=सत् है; च=और; न=न; असन्=असत् है; केवलः=एकमात्र, विशुद्ध; शिवः एव=कल्याणमय शिव ही है; तत्=वह; अक्षरम्=सर्वथा अविनाशी है; तत्=वह; सवितुः=सूर्याभिमानी देवताका भी; वरेण्यम्=उपास्य है; च=तथा; तस्मात्=उसीसे; पुराणी=(यह) पुराना; प्रज्ञा=ज्ञान; प्रसूता=फैला है ॥ १८ ॥

व्याख्या —जिस समय अज्ञानरूप अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है, उस समय प्रत्यक्ष होनेवाला तत्त्व न दिन है, न रात है। अर्थात् उसे न तो दिनकी भाँति प्रकाशमय कहा जा सकता है और न रातकी भाँति

  • 'तत्' अव्यय पद है, यहाँ 'तदा'के अर्थमें इसका प्रयोग हुआ है।