ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 489, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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अन्धकारमय ही; क्योंकि वह इन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है, वहाँ ज्ञान-अज्ञानके भेदकी कल्पनाके लिये स्थान नहीं है। वह न सत् है और न असत् है—उसे न तो 'सत्' कहना बनता है न 'असत्' ही; क्योंकि वह 'सत्' और 'असत्' नामसे समझे जानेवाले पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण है। एकमात्र कल्याणस्वरूप शिव ही वह तत्त्व हैं। वे सर्वथा अविनाशी हैं। सूर्य आदि समस्त देवताओंके उपास्यदेव हैं। उन्हींसे यह सदासे चला आता हुआ अनादि ज्ञान विस्तारित हुआ है अर्थात् परमात्माको जानने और पानेका साधन अधिकारियोंको परम्परासे प्राप्त होता चला आ रहा है॥ १८ ॥
नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्नभत्।
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः॥ १९ ॥
एनम्=इस परमात्माको; (कोई भी) न=न तो; ऊर्ध्वम्=ऊपरसे; न=न; तिर्यञ्चम्=इधर-उधरसे; (और) न=न; मध्ये=बीचमेंसे ही; परिजग्नभत्=भलीभाँति पकड़ सकता है; यस्य=जिसका; महद्यशः=महान् यश; नाम=नाम है; तस्य=उसकी; प्रतिमा=कोई उपमा; न=नहीं; अस्ति=है॥ १९ ॥
व्याख्या —जिसका पहले कई मन्त्रोंमें वर्णन किया गया है, उन परम प्राप्य परब्रह्मको कोई भी मनुष्य न तो ऊपरसे पकड़ सकता है, न नीचेसे पकड़ सकता है और न बीचमें इधर-उधरसे ही पकड़ सकता है; क्योंकि ये सर्वथा अग्राह्य हैं—ग्रहण करनेमें नहीं आते। इन्हें जानने और ग्रहण करनेकी बात जो शास्त्रोंमें पायी जाती है, उसका रहस्य वही समझ सकता है, जो उन्हें पा लेता है। वह भी वाणीद्वारा व्यक्त नहीं कर सकता; क्योंकि मन और वाणीकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे समझने और समझानेमें आनेवाले समस्त पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण हैं। जिनका नाम 'महान् यश' है, जिनका महान् यश सर्वत्र प्रसिद्ध है, उन परात्पर ब्रह्मकी कोई भी उपमा नहीं है, जिसके द्वारा उनको समझा अथवा समझाया जा सके। उनके अतिरिक्त कोई दूसरा उनके समान हो तो उसकी उपमा दी जाय। अतः मनुष्यको उस परम प्राप्य तत्त्वको जानने और