ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 465, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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रुद्र=हे रुद्रदेव!; ते=तेरी; या=जो; अघोरा=भयानकतासे शून्य (सौम्य); अपापकाशिनी=पुण्यसे प्रकाशित होनेवाली; (तथा) शिवा=कल्याणमयी; तनू=: मूर्ति है; गिरिशन्त=हे पर्वतपर रहकर सुखका विस्तार करनेवाले शिव!; तया=उस; शन्तमया तनुवा=परम शान्त मूर्तिसे; (तू कृपा करके) न: अभिचाकशीहि=हमलोगोंको देख ॥ ५ ॥
व्याख्या—हे रुद्रदेव! आपकी जो भयानकतासे शून्य तथा पुण्यकर्मोंसे प्रकाशित होनेवाली कल्याणमयी सौम्यमूर्ति है—जिसका दर्शन करके मनुष्य परम आनन्दमें मग्न हो जाता है—हे गिरिशन्त! अर्थात् पर्वतपर निवास करते हुए समस्त लोकोंको सुख पहुँचानेवाले परमेश्वर! उस परम शान्त मूर्तिसे ही कृपा करके आप हमलोगोंकी ओर देखिये। आपकी कृपादृष्टि पड़ते ही हम सर्वथा पवित्र होकर आपकी प्राप्तिसे योग्य बन जायेंगे ॥ ५ ॥
यामिणुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ध्यस्तवे।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसीः पुरुषं जगत् ॥ ६ ॥*
गिरिशन्त=हे गिरिशन्त!; याम्=जिस; इषुम्=बाणको; अस्तवे=फेंकनेके लिये; (तू) हस्ते=हाथमें; विभर्षि=धारण किये हुए है; गिरित्र=हे गिरिराज हिमालयकी रक्षा करनेवाले देव!; ताम्=उस बाणको; शिवाम्=कल्याणमय; कुरु=बना ले; पुरुषम्=जीवसमुदायरूप; जगत्=जगत्को; मा हिंसीः=नष्ट न कर (कष्ट न दे) ॥ ६ ॥
व्याख्या—हे गिरिशन्त—हे कैलासवासी सुखदायक परमेश्वर! जिस बाणको फेंकनेके लिये आपने हाथमें ले रखा है, हे गिरिराज हिमालयकी रक्षा करनेवाले! आप उस बाणको कल्याणमय बना लें—उसकी क्रूरताको नष्ट करके उसे शान्तिमय बना लें। इस जीवसमुदायरूप जगत्का विनाश न करें—इसको कष्ट न दें ॥ ६ ॥
- यह यजुर्वेद अध्याय १६का तीसरा मन्त्र है।