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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 548 में से

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पृष्ठ 464

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ३ ]

उसे वे वहीँ भोग लगा सकते हैं। वे सब जगह प्रत्येक वस्तुको एक साथ ग्रहण करनेमें और अपने आश्रित जनोंके संकटका नाश करके उनकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं तथा जहाँ कहीं उनके भक्त उन्हें बुलाना चाहें, वहाँ वे एक साथ पहुँच सकते हैं। संसारमें ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ उनकी ये शक्तियाँ विद्यमान न हों। आकाशसे लेकर पृथ्वीतक समस्त लोकोंकी रचना करनेवाले एक ही परमदेव परमेश्वर मनुष्य आदि प्राणियोंको दो-दो भुजाओंसे और पक्षियोंको पाँखोंसे युक्त करते हैं। भाव यह कि वे समस्त प्राणियोंको आवश्यकतानुसार भिन्न-भिन्न शक्तियों एवं साधनोंसे सम्पन्न करते हैं। यहाँ भुजा और पाँखोंका कथन उपलक्षणमात्र है। इससे यह समझ लेना चाहिये कि समस्त प्राणियोंमें जो कुछ भी शक्ति है, वह सब परमात्माकी ही दी हुई है॥ ३ ॥

यो देवानां प्रभवश्चोद्धवश्च विश्वधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्व स नो बुद्ध्या शुभया संयुक्तु ॥ ४ ॥

यः=जो; रुद्रः=रुद्र; देवानाम्=इन्द्रादि देवताओंकी; प्रभवः=उत्पत्तिका हेतु; च=और; उद्धवः=वृद्धिका हेतु है; च=तथा; (जो) विश्वधिपः=सबका अधिपति; (और) महर्षिः=महान् ज्ञानी (सर्वज्ञ) है; पूर्वम्=(जिसने) पहले; हिरण्यगर्भम्=हिरण्यगर्भको; जनयामास=उत्पन्न किया था; सः=वह परमदेव परमेश्वर; नः=हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या=शुभ बुद्धिसे; संयुक्तु=संयुक्त करें ॥ ४ ॥

व्याख्या—सबको अपने शासनमें रखनेवाले जो रुद्ररूप परमेश्वर इन्द्रादि समस्त देवताओंको उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं तथा जो सबके अधिपति और महान् ज्ञानी—सर्वज्ञ हैं, जिन्होंने सृष्टिके आदिमें हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया था, वे परमदेव परमात्मा हमलोगोंको शुभ बुद्धिसे संयुक्त करें ॥ ४ ॥

या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी । तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥ ५ ॥ *

  • यह यजुर्वेद अध्याय १६का दूसरा मन्त्र है।