भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अध्याय ३ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४६१

लोकोंपर शासन करते हैं—उनका नियमानुसार संचालन करते हैं, वे रूद्ररूप परमेश्वर एक ही हैं। अर्थात् इस विश्वका नियमन करनेवाली शक्तियाँ अनेक होनेपर भी वे सब एक ही परमेश्वरकी हैं और उनसे अभिन्न हैं। इसी कारण, ज्ञानीजनोंने जगत्के कारणका निश्चय करते समय किसी भी दूसरे तत्त्वका आश्रय नहीं लिया। सबने एक स्वरसे यही निश्चय किया कि एक परब्रह्म ही इस जगत्के कारण हैं। वे परमात्मा सब जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। इन समस्त लोकोंकी रचना करके उनकी रक्षा करनेवाले परमेश्वर प्रलयकालमें स्वयं ही इन सबको समेट लेते हैं, अर्थात् अपनेमें विलीन कर लेते हैं। उस समय इनकी भिन्न-भिन्न रूपोंमें अभिव्यक्ति नहीं रहती ॥ २ ॥

विश्वतश्चक्षुरुत

विश्वतोमुखो

विश्वतोबाहुरुत

विश्वतस्यात् ।

सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रै-

र्घावाभूमी जनयन् देव एकः ॥ ३ ॥ *

विश्वतश्चक्षुः=सब जगह आँखवाला; उत=तथा; विश्वतोमुखः=सब जगह मुखवाला; विश्वतोबाहुः=सब जगह हाथवाला; उत=और; विश्वतस्यात्=सब जगह पैरवाला; घावाभूमी जनयन्=आकाश और पृथ्वीकी सृष्टि करनेवाला; [ सः ]=वह; एकः=एकमात्र; देवः=देव (परमात्मा); बाहुभ्याम्=मनुष्य आदि जीवोंको दो-दो हाथोंसे; संधमति=युक्त करता है (तथा); पतत्रैः=(पक्षी-पतंग आदिको) पाँखोंसे; सं [ धमति ]=युक्त करता है ॥ ३ ॥

व्याख्या—वे परमेश्वर एक हैं; फिर भी उनकी सब जगह आँखें हैं, सब जगह मुख हैं, सब जगह हाथ हैं और सब जगह पैर हैं। भाव यह कि वे सम्पूर्ण लोकोंमें स्थित समस्त जीवोंके कर्म और विचारोंको तथा समस्त घटनाओंको अपनी दिव्य शक्तिद्वारा निरन्तर देखते रहते हैं, कोई भी बात उनसे छिपी नहीं रहती। उनका भक्त उनको जहाँ कहीं भोजनके योग्य वस्तु समर्पित करता है,

  • यजुर्वेद अध्याय १७का उत्तरीसवों और (अथर्व० १३।२६) मन्त्र इसी प्रकार है तथा ऋ० १०।८१।३ भी इसी प्रकार है।