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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 548 में से

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ३ ]

यः=जो; एकः=एक; जालवान्=जगरूप जालका अधिपति; ईशनीभिः=अपनी स्वरूपभूत शासनशक्तियोंद्वारा; ईशते=शासन करता है; ईशनीभिः=उन विविध शासन-शक्तियोंद्वारा; सर्वान्=सम्पूर्ण; लोकान् ईशते=लोकोंपर शासन करता है; यः=(तथा) जो; एकः=अकेला; एव=ही; सम्भवे च उद्भवे=सृष्टि और उसके विस्तारमें (सर्वथा समर्थ है); एतत्=इस ब्रह्मको; ये=जो महापुरुष; विद्=जान लेते हैं; ते=वे; अमृताः=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं ॥ १ ॥

व्याख्या —जो एक—अद्वितीय परमात्मा जगत्-रूप जालकी रचना करके अपनी स्वरूपभूत शासन-शक्तियोंद्वारा उसपर शासन कर रहे हैं तथा उन विविध शासन-शक्तियोंद्वारा समस्त लोकों और लोकपालोंका यथायोग्य संचालन कर रहे हैं—जिनके शासनमें ये सब अपने-अपने कर्तव्योंका नियमपूर्वक पालन कर रहे हैं तथा जो अकेले ही बिना किसी दूसरेकी सहायता लिये समस्त जगत्की उत्पत्ति और उसका विस्तार करनेमें सर्वथा समर्थ हैं, उन परब्रह्म परमेश्वरको जो महापुरुष तत्त्वसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं—जन्म-मृत्युके जालसे सदाके लिये छूट जाते हैं ॥ १ ॥

एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु-

यं इमाल्लोकानीशत ईशनीभिः ।

प्रत्यङ् जनान्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले

संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥ २ ॥

यः=जो; ईशनीभिः=अपनी स्वरूपभूत विविध शासन-शक्तियोंद्वारा; इमान्=इन सब; लोकान् ईशते=लोकोंपर शासन करता है; [ सः ] रुद्रः=वह रुद्र; एकः=हि=एक ही है; (इसीलिये विद्वान् पुरुषोंने जगत्के कारणका निश्चय करते समय) द्वितीयाय न तस्थुः=दूसरेका आश्रय नहीं लिया; [ सः ]=वह परमात्मा; जनान् प्रत्यङ्=समस्त जीवोंके भीतर; तिष्ठति=स्थित हो रहा है; विश्वा=सम्पूर्ण; भुवनानि संसृज्य=लोकोंकी रचना करके; गोपाः=उनकी रक्षा करनेवाला परमेश्वर; अन्तकाले=प्रलयकालमें; संचुकोच=इन सबको समेट लेता है ॥ २ ॥

व्याख्या —जो अपनी स्वरूपभूत विविध शासन-शक्तियोंद्वारा इन सब

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