भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 453

अध्याय २ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४५१

व्याख्या —जिस स्थितिमें अग्नि प्रकट करनेके लिये अरणियोंद्वारा मन्थन करनेकी भाँति अग्निस्थानीय परमात्माको प्राप्त करनेके लिये पहले अध्याय (१३,१४ मन्त्र)में कहे हुए प्रकारसे शरीरको नीचेकी अरणि और ऊँकारको ऊपरकी अरणि बनाकर उसका जप और उसके अर्थरूप परमात्माका निरन्तर चिन्तनरूप मन्थन किया जाता है, जहाँ प्राणवायुका विधिपूर्वक भलीभाँति निरोध किया जाता है, जहाँ आनन्दरूप सोमरस अधिकतासे प्रकट होता है, उस ध्यानावस्थामें मनुष्यका मन सर्वथा विशुद्ध हो जाता है ॥६॥

सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम्। तत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्वमक्षिपत् ॥७॥

सवित्रा =सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमात्माके द्वारा; प्रसवेन =प्राप्त हुई प्रेरणासे; पूर्व्यम् =सबके आदिकारण; ब्रह्म जुषेत =उस परब्रह्म परमेश्वरकी ही सेवा (आराधना) करनी चाहिये; (तू) तत्र =उस परमात्मामें ही; योनिम् =आश्रय; कृणवसे =प्राप्त कर; हि =क्योंकि; (यों करनेसे) ते =तेरे; पूर्व्यम् =पूर्वसंचित कर्म; न अक्षिपत् =विघ्नकारक नहीं होंगे ॥७॥

व्याख्या —हे साधक! सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक सर्वान्तर््यामी परमेश्वरकी प्रेरणासे अर्थात् ऊपर बताये हुए प्रकारसे परमात्माकी स्तुति करके उनसे अनुमति प्राप्त कर तुम्हें उन सबके आदि परब्रह्म परमात्माकी ही सेवा (समाराधना) करनी चाहिये, उन परमेश्वरमें ही आश्रय प्राप्त करना चाहिये—उन्हींकी शरण ग्रहण करके उन्हींमें अपने-आपको विलीन कर देना चाहिये। यों करनेसे तुम्हारे पहले किये हुए समस्त संचित कर्म विघ्नकारक नहीं होंगे—बन्धनरूप नहीं होंगे ॥७॥

सम्बन्ध —ध्यानयोगका साधन करनेवालेको किस प्रकार बैठकर कैसे ध्यान करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य। ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्वोत्तंसि सर्वाणि भयावहानि ॥८॥