ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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संग्रह रहनेसे और उन्हींमें तन्मय हो जानेसे अन्तमें यह उन्हींको पा लेता है। फिर इसके सम्पूर्ण मायाकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है, अर्थात् मायामय जगत्से इसका सम्बन्ध सर्वथा छूट जाता है ॥१०॥
सम्बन्ध— उन परमदेवको जाननेका फल पुनः बताया जाता है—
| ज्ञात्वा | देवं | सर्वपाशापहानिः |
|---|---|---|
| क्षीणैः | क्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः। | |
| तस्याभिध्यानात् | तृतीयं | देहभेदे |
| विश्वैश्वर्यं | केवलं | आसकामः ॥ ११ ॥ |
तस्य=उस परमदेवका; अभिध्यानात्=निरन्तर ध्यान करनेसे; देवम्=उस प्रकाशमय परमात्माको; ज्ञात्वा=जान लेनेपर; सर्वपाशापहानिः=समस्त बन्धनोंका नाश हो जाता है; (क्योंकि) क्लेशैः क्षीणैः=क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण; जन्ममृत्युप्रहाणिः=जन्म-मृत्युका सर्वथा अभाव हो जाता है; (अतः वह) देहभेदे=शरीरका नाश होनेपर; तृतीयम्=तीसरे लोक (स्वर्ग) तकके; विश्वैश्वर्यम् [ त्यक्त्वा ]=समस्त ऐश्वर्यका त्याग करके; केवलः=सर्वथा विशुद्ध; आसकामः=पूर्णकाम हो जाता है ॥११॥
व्याख्या— परमपुरुष परमात्माका निरन्तर ध्यान करते-करते जब साधक उन परमदेवको जान लेता है, तब इसके समस्त बन्धनोंका सदाके लिये सर्वथा नाश हो जाता है; क्योंकि अविद्या, अस्मिता (अहंकार) राग, द्वेष और मरणभय—इन पाँचों क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण उसके जन्म-मरणका सदाके लिये अभाव हो जाता है। अतः वह फिर कभी बन्धनमें नहीं पड़ सकता। वह इस शरीरका नाश होनेपर तृतीय लोक अर्थात् स्वर्गके सबसे ऊँचे स्तर—ब्रह्मलोकतकके बड़े-से-बड़े समस्त ऐश्वर्योंका त्याग करके प्रकृतिसे वियुक्त, सर्वथा विशुद्ध कैवल्यपदको प्राप्त हो पूर्णकाम हो जाता है—उसे किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती; क्योंकि वह सम्पूर्ण कामनाओंका फल पा लेता है ॥११॥
सम्बन्ध— जानने योग्य तत्त्वका पुनः वर्णन किया जाता है—