ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 444, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
(गीता १५।१६-१७) सम्पूर्ण विश्व उन्हींका स्वरूप—विराट शरीर है। वे सब कुछ करते हुए—सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति, पालन और संहार करते हुए भी वास्तवमें कुछ नहीं करते; क्योंकि वे कर्तापनके अभिमानसे रहित हैं। (गीता ४।१३) मनुष्य जब इस प्रकार इन तीनोंकी विलक्षणता और विभिन्नताको समझते हुए ही इन्हें ब्रह्मरूपमें उपलब्ध कर लेता है अर्थात् प्रकृति और जीव तो उन परमेश्वरकी प्रकृतियाँ हैं और परमेश्वर इनके स्वामी हैं—इस प्रकार प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है॥१॥
सम्बन्ध— पहले, आठवें और नवें मन्त्रमें कहे हुए तीनों तत्त्वोंका स्पष्टीकरण अगले मन्त्रमें किया जाता है—
क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। तस्याभिध्यानाद् योजनात् तत्त्वभावाद् भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः॥१०॥
प्रधानम् =प्रकृति तो; क्षरम् =विनाशशील है; हरः =इनको भोगनेवाला जीवात्मा; अमृताक्षरम् =अमृतस्वरूप अविनाशी है; क्षरात्मानौ =इन विनाशशील जड़-तत्त्व और चेतन आत्मा—दोनोंको; एकः =एक; देवः =ईश्वर; ईशते =अपने शासनमें रखता है; (इस प्रकार जानकर) तस्य =उसका; अभिध्यानात् =निरन्तर ध्यान करनेसे; योजनात् =मनको उसमें लगाये रहनेसे; च =तथा; तत्त्वभावात् =तन्मय हो जानेसे; अन्ते =अन्तमें (उसीको प्राप्त हो जाता है); भूयः =फिर; विश्वमायानिवृत्तिः =समस्त मायाकी निवृत्ति हो जाती है॥१०॥
व्याख्या— प्रकृति तो क्षर अर्थात् परिवर्तन होनेवाली, विनाशशील है और इसको भोगनेवाला जीव-समुदाय अविनाशी अक्षरतत्त्व है। (गीता ७।४-५; १५।१६) इन क्षर और अक्षर (जड़प्रकृति और चेतन जीव-समुदाय)—दोनों तत्वोंपर एक परमदेव परमेश्वर शासन करते हैं, (गीता १५।१७) वे ही प्राप्त करनेके और जाननेके योग्य हैं, उन्हें तत्वोंसे जानना चाहिये—इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उन परमदेव परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे, उन्हींमें रात-दिन