ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण प्रकृतिके अधीन हो इसके मोहजालमें फँसा रहता है, उन परमदेव परमात्माकी ओर दृष्टिपात नहीं करता। जब कभी यह उन सर्वसुहृद परमात्माकी अहेतुकी दयासे महापुरुषोंका सङ्ग पाकर उनको जाननेका अभिलाषी होकर पूर्ण चेष्टा करता है, तब उन परमदेव परमेश्वरको जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥
सम्बन्ध— पुनः जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति—इन तीनोंके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन करके, इस तत्त्वको जानकर उपासना करनेका फल दो मन्त्रोंद्वारा बताया जाता है—
| ज्ञाज्ञौ | द्व्रावजावीशनीशा- |
|---|---|
| वजा | होका |
| अनन्तश्चात्मा | विश्वरूपो |
| त्रयं | यदा |
ज्ञाज्ञौ=सर्वज्ञ और अज्ञानी; ईशनीशौ=सर्वसमर्थ और असमर्थ; द्वौ=ये दो; अज्ञौ=अजन्मा आत्मा हैं; हि=तथा इनके सिवा; भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता=भोगनेवाले जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग्य-सामग्रीसे युक्त; अज्ञा=अनादि प्रकृति; एका=एक तीसरी शक्ति है; (इन तीनोंमें जो ईश्वरतत्त्व है, वह शेष दोसे विलक्षण है) हि=क्योंकि; आत्मा=वह परमात्मा; अनन्तः=अनन्त; विश्वरूपः=सम्पूर्ण रूपोंवाला; च=और; अकर्ता=कर्तापनके अभिमानसे रहित है; यदा=जब; (मनुष्य इस प्रकार) एतत् त्रयम्=ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन तीनोंको; ब्रह्मम्=ब्रह्मरूपमें; विन्दते=प्राप्त कर लेता है (तब वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है) ॥ ९ ॥
व्याख्या— ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् हैं, जीव अल्पज्ञ और अल्प शक्तिवाला है; ये दोनों ही अजन्मा हैं। इनके सिवा एक तीसरी शक्ति भी अजन्मा है जिसे प्रकृति कहते हैं; यह भोक्ता जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग-सामग्री प्रस्तुत करती है। यद्यपि ये तीनों ही अजन्मा हैं—अनादि हैं, फिर भी ईश्वर शेष दो तत्त्वोंसे विलक्षण हैं; क्योंकि वे परमात्मा अनन्त हैं।