भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

परम अक्षर, परम देव हैं। जिन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमात्माकी दिव्यशक्तिका दर्शन किया था, वे वेदके रहस्यको समझनेवाले ऋषिलोग उन सबके प्रेरक परमात्माको यहाँ—अपने हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान समझकर, उन्हींके परायण होकर अर्थात् सर्वतोभावसे उनकी शरणमें जाकर, उन्हींमें लीन हो गये और सदाके लिये जन्म-मरणरूप योनिसे मुक्त हो गये। उनके मार्गका अनुसरण करके हम सब लोग भी उन्हींकी भाँति जन्म-मरणसे छूटकर परमात्मामें लीन हो सकते हैं ॥७॥

सम्बन्ध— अब उन परमात्माके स्वरूपका वर्णन करके उन्हें जाननेका फल बताया जाता है—

संयुक्तमेतत् क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः । अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावा- ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥८॥

क्षरम्=विनाशशील जडवर्ग; च=एवं; अक्षरम्=अविनाशी जीवात्मा; संयुक्तम्=(इन दोनोंके) संयोगसे बने हुए; व्यक्ताव्यक्तम्=व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप; एतत् विश्वम्=इस विश्वको; ईशः=परमेश्वर ही; भरते=धारण और पोषण करता है; च=तथा; आत्मा=जीवात्मा; भोक्तृभावात्=इस जगत्के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण; अनीशः=प्रकृतिके अधीन असमर्थ हो; बध्यते=इसमें बँध जाता है; (और) देवम्=उस परमदेव परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; सर्वपाशैः=सब प्रकारके बन्धनोंसे; मुच्यते=मुक्त हो जाता है ॥८॥

व्याख्या— विनाशशील जडवर्ग जिसे भगवान्की अपरा प्रकृति तथा क्षरतत्त्व कहा गया है और भगवान्की परा प्रकृतिरूप जीवसमुदाय, जो अक्षरतत्त्वके नामसे पुकारा जाता है—इन दोनोंके संयोगसे बने हुए, प्रकट (स्थूल) और अप्रकट (सूक्ष्म) रूपमें स्थित इस समस्त जगत्का वे परमपुरुष पुरुषोत्तम ही धारण-पोषण करते हैं, जो सबके स्वामी, सबके प्रेरक तथा सबका यथायोग्य संचालन और नियमन करनेवाले परमेश्वर हैं। जीवात्मा इस जगत्के